
Robot lost in Antarctica: अंटार्टिका सदियों से वैज्ञानिकों की खोज का पसंदीदा विषय रहा है. कई देशों के सांटिस्ट यहां दशकों से खोज कर रहे हैं. हाल ही में वैज्ञानिकों की एक टीम ने अंटार्टिका के एक खास ग्लेशियर की स्टडी के लिए तैराकी में माहिर स्विमिंग एक्सपर्ट रोबोट भेजा था. वो रोबोट अपने तय रूट से भटककर ऐसे इलाके में पहुंचा, जिसके बारे में इंसानों ने सोचा भी नहीं होगा. ये ऐसा दुर्लभ इलाका था जिसे पहले किसी ने भी नहीं देखा था. ग्लेशियर की अनंत गहराइयों में तैरते हुए पहुंचना और उसकी खोज-खबर निकालना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI पावर से लैस रोबोट के लिए भी आसान नहीं था. शुरुआत में सिग्नल और तस्वीरें नहीं मिलीं तो रोबोट को लापता मान लिया गया था, जबकि हकीकत में वो किसी दूसरी जगह फंसा था.
अंटार्टिका में अनछुआ पहलू
चांद पर अमेरिका, रूस, चीन और भारत के अंतरिक्ष यात्रियों के कदम पड़ चुके हैं. कई देशों के लैंडर और रोवर चांद की गहराइयों में जीवन तलाश रहे हैं. ऐसे ही एक कटथ्रोट कंपटीशन के बीच भारत, चांद के उस पार यानी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिग करके दुनिया का पहला देश बन गया.
डेनमैन ग्लेशियर के नीचे छिपे रहस्यों से उठा पर्दा
इस बार ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने अंटार्टिका में कुछ ऐसा ही दुर्लभ खुलासा किया है जो पहले किसी और देश ने नहीं किया था. हालांकि ये किसी रणनीति की वजह से नहीं बल्कि एक चूक की वजह से अनजाने में हुआ. वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका के एक ऐसे क्षेत्र की झलक मिली है, जहां पहुंचना लगभग असंभव था. दरअसल ये एक चमत्कार था क्योंकि अतीत में अंटार्टिका की पड़ताल करने गया एक रोबोट अचानक दोबारा सामने आया और उसने डेनमैन ग्लेशियर के नीचे छिपे रहस्यों से पर्दा उठा दिया.
यह रोबोट टॉटन ग्लेशियर से डेटा इकट्ठा करने के लिए भेजा गया था, लेकिन यह भटकते हुए गलती से डेनमैन ग्लेशियर के नीचे जा पहुंचा. दिसंबर 2025 में Science Advances जर्नल में प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, यह रोबोट एक फ्री-फ्लोटिंग डिवाइस था, जिसे समुद्री धाराओं ने अपने तय रास्ते से भटका दिया था.
रोबोट की खासियत
इस रोबोट में खारापन का पता लगाने वाले और टेंपरेचर यानी तापमान मापने वाले सेंसर लगे थे. इसे पानी के नीचे जाकर हर 10 दिन में सतह पर उपर वापस आकर सैटेलाइट्स को डेटा भेजने के लिए डिजाइन किया गया था. दरअसल ये एक पुराना तरीका है जो ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
ऑस्ट्रेलिया की नेशनल साइंस एजेंसी CSIRO चाहती थी कि ये रोबोट टॉटन ग्लेशियर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जानने के लिए पुराने मॉडल पर काम करे. उनके शोध का मुख्य उद्देश्य ये पता लगाना था कि अगर अंटार्कटिका का टॉटन ग्लेशियर पिघलता है तो समुद्र का जलस्तर कितनी ऊंचाई तक बढ़ सकता है, लेकिन रोबोट नेविगेशन में भटक गया और दोबारा कभी सतह पर नहीं लौटा.
9 महीने बाद रोबोट का पुनर्जन्म!
हालांकि रोबोट का रूट भटकने वाली गलती वैज्ञानिकों के लिए वरदान साबित हुई. भटका रोबोट यानी कथित जेम्स बॉन्ड 007 ने अनजाने में रास्ता बदलकर डेनमैन ग्लेशियर से जुड़ा अहम डेटा इकट्ठा कर लिया. करीब नौ महीने बाद जब रोबोट दोबारा सतह पर आया, तो उसके पास इस बर्फीले ढांचे और अंटार्कटिका पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जुड़ी बड़ी जानकारी थी.
रोबोट की खोज में क्या निकला?
अचानक प्रकट हुए रोबोट ने बताया कि पूर्वी अंटार्कटिका कैसे प्रभावित हो सकता है? ये रोबोट डेनमैन ग्लेशियर और शैकलटन आइस शेल्फ के नीचे फंस गया था. इस दौरान उसने वही काम किया, जिसके लिए उसे भेजा गया था. बस लोकेशन अलग थी यानी ग्लेशियर अलग था. फिर भी रोबोट ने अपना काम बखूबी पूरा किया. उसने समुद्र तल से लेकर आइस शेल्फ के निचले हिस्से तक पानी के खारेपन और तापमान को मापा.
रोबोट ने कई बार सतह पर ऊपर आने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह आइस शेल्फ से टकरा जाता. इस प्रक्रिया में उसने अनजाने में आइस शेल्फ की गहराई भी माप ली. जब शोधकर्ताओं ने इस डेटा की तुलना सैटेलाइट से मिले आंकड़ों से की, तो उन्हें यह समझने में मदद मिली कि रोबोट किस दिशा में गया और कहां से डेटा ट्रांसमिट कर रहा था.

