Last Newspaper Hawker France: डिजिटल दौर में जब लोग मोबाइल पर खबरें पढ़ते हैं तब भी अली अकबर पिछले 50 साल से ज्यादा समय से पेरिस की सड़कों पर अखबार बेचते रहे. कमाई भले ही घट गई हो लेकिन उनके काम को मिली पहचान और सम्मान आज उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया है. एफिल टावर और सीन नदी के शहर पेरिस में अब अखबार बेचने वालों की आवाज लगभग सुनाई नहीं देती. 73 साल के अली अकबर की आवाज आज भी लोगों को याद है. वे सुबह-सुबह सड़कों और कैफे के बाहर खड़े होकर अखबार बेचते थे. इसी अनोखी पहचान के लिए उन्हें अब राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है.
राष्ट्रपति मैक्रों ने दिया बड़ा सम्मान
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अली अकबर को प्रतिष्ठित नेशनल ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया है. साल 2026 में उन्हें आधिकारिक तौर पर फ्रांस का अंतिम पारंपरिक हॉकर माना गया. राष्ट्रपति ने कहा कि अली सिर्फ अखबार बेचने वाले नहीं बल्कि पेरिस की एक जीवित परंपरा हैं.
पाकिस्तान से पेरिस तक का सफर
अली अकबर मूल रूप से पाकिस्तान के रावलपिंडी के रहने वाले हैं. बेहतर भविष्य की तलाश में वे 1970 के दशक में फ्रांस आए थे. इसके बाद उन्होंने पेरिस के मशहूर सेंट जर्मन-दे-प्रे इलाके में अखबार बेचना शुरू किया. पिछले 50 साल से ज्यादा समय से वे वहीं लोगों को अखबार दे रहे हैं.
आम लोग ही नहीं, VIP भी रहे ग्राहक
अली के ग्राहक सिर्फ आम लोग नहीं रहे हैं, उनके पास फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा मितरां से लेकर खुद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों तक अखबार खरीद चुके हैं. पूर्व प्रधानमंत्री एडुआर फिलिप भी उनसे अखबार खरीद चुके हैं जब वे छात्र थे अली से अखबार लेते थे.
राष्ट्रपति क्यों मानते हैं खास
राष्ट्रपति मैक्रों का कहना है कि अली पेरिस की संस्कृति का हिस्सा हैं. जब लोग सुबह कॉफी पीते हैं और अली मुस्कराते हुए उन्हें ताजा अखबार थमाते हैं, तो यह शहर की एक खूबसूरत और पुरानी परंपरा को दिखाता है.
बता दें, एक समय ऐसा था जब अली रोजाना सैकड़ों अखबार बेचते थे. डिजिटल जमाने में अखबार पढ़ने वाले कम हो गए हैं. अब वे रोज सिर्फ 30 से 40 अखबार ही बेच पाते हैं. वे कियोस्क से अखबार आधी कीमत पर लेते हैं और करीब 340 रुपये में बेचते हैं.
अली बताते हैं, अगर अखबार नहीं बिके तो उन्हें वापस नहीं किया जा सकता है. यानी इससे साफ हो गया कि नुकसान का खतरा हमेशा रहता है. इसके बावजूद वे इस काम से जुड़े रहे हैं. आज इस काम से उनकी महीने की कमाई करीब 10 हजार रुपये के आसपास रह गई है.
कमाई घटी, सम्मान बढ़ा
हांलांकि भले ही अखबार बेचने से होने वाली आमदनी पहले जैसी नहीं रही है, लेकिन अली अकबर का सम्मान कई गुना बढ़ गया है. राष्ट्रपति से मिला यह सम्मान उनके पूरे जीवन की मेहनत और लगन का नतीजा है. हां, लेकिन पेरिस की सड़कों पर अब शायद अखबार ले लो की आवाज कम सुनाई दे पर अली अकबर का नाम पेरिस के इतिहास में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा.
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