
Trump Tariff Case: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी को लेकर आज अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने वाली थी, हालांकि अब इस मामले पर सुनवाई टाल दी गई है. ट्रंप के लिए आज आने वाला फैसला बड़ी अग्निपरीक्षा माना जा रहा था. अदालत को आज यह तय करना था कि ट्रंप प्रशासन की ओर से इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर एक्ट (IEEPA) की तहत लगाए गए टैरिफ कानूनी थे या नहीं. इस फैसले पर केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी और ट्रेड पॉलिसी की भी नजरें टिकी थीं.
ट्रंप के खिलाफ फैसला आने पर क्या होगा?
बता दें कि अगर सुप्रीम कोर्ट की ओर से ट्रंप प्रशासन के खिलाफ फैसला आता है और टैरिफ को अवैध करार दिया जाता है तो इसके बड़े आर्थिक और कानूनी परिणाम होंगे. अमेरिकी सरकार को इस स्थिति में कंपनियों और इंपोर्टर्स से वसूल किए गए टैरिफ की रकम को लौटाना पड़ सकता है. यह 100-150 अरब डॉलर तक हो सकती है. इसके साथ ही ट्रंप भविष्य में बिना कांग्रेस की मंजूरी के इमरजेंसी का हवाला देकर मनमाने तरीके से टैरिफ नहीं लगा पाएंगे. इससे उनके अमेरिका फर्स्ट की टैरिफ पॉलिसी को बड़ा झटका लग सकता है.
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कोर्ट तक क्यों पहुंचा मामला?
ट्रंप प्रशासन ने 1977 के IEEPA कानून के तहत ये टैरिफ लगाए थे. इस कानून के मुताबिक राष्ट्रपति को इमरजेंसी की स्थिति में खास आर्थिक अधिकार मिलता है, हालांकि अब प्रश्न यह उठा है कि क्या इमरजेंसी के नाम पर राष्ट्रपति मन मुताबिक टैरिफ लगा सकते हैं? US कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड का साफ कहना है कि अमेरिकी संविधान की ओर से कांग्रेस को टैरिफ लगाने का अधिकार मिला है. राष्ट्रपति को नहीं. इतना ही नहीं अदालत का यह भी कहना है कि IEEPA राष्ट्रपति को बिना लगाम के टैरिफ की शक्ति नहीं देता है.
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ट्रंप के फेवर में फैसला आने पर क्या होगा?
अगर कोर्ट की ओर से अमनेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में फैसला आता है और अदालत मान लेती है कि राष्ट्रपति के पास IEEPA कानून के तहत पूर्ण रूप से टैरिफ लगाने का अधिकार है तो ट्रंप की ओर से अपने कार्यकाल में लगाए गए टैरिफ कानूनी रूप से सही ठहराए जाएंगे. इस स्थिति में कंपनियों और इंपोटर्स को कोई रिफंड नहीं मिलेगा. वहीं US सरकार का अरबों डालर का रेवेन्यू भी सुरक्षित रहेगा. इस फैसले के बाद ट्रंप टैरिफ को लेकर अन्य बड़े फैसले भी ले सकते हैं. इससे उनकी अमेरिक फर्स्ट और सख्त ट्रेड पॉलिसी को अधिक मजबूती मिलेगी. उन्हें रूस, चीन और भारत जैसे देशों पर दबाव बनाने के लिए खुला समर्थन मिलेगा.
