अमेरिका में आयोजित ‘Board of Peace’ की पहली बैठक में दुनिया भर से करीब 50 देशों के प्रतिनिधि पहुंचे. भारत की ओर से वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास के चार्ज डी’अफेयर्स नामग्या सी खम्पा ने देश का प्रतिनिधित्व किया. इस बैठक में शामिल देशों में से 27 देश पूर्ण सदस्य के तौर पर जुड़े हैं. इनमें अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजरायल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, यूएई, उज्बेकिस्तान और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं. वहीं भारत और यूरोपीय यूनियन समेत कुछ देशों ने ऑब्जर्वर के रूप में हिस्सा लिया.

दावोस से शुरू हुआ मामला, भारत ने तुरंत नहीं लिया फैसला
भारत को इस मंच में शामिल होने का न्योता पहले ही मिल चुका था, जब इसे दावोस में लॉन्च किया गया था. उस समय भारत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. इसके बाद 12 फरवरी को विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव पर विचार जारी है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा, “अमेरिकी सरकार से हमें बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण मिला है. हम इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि भारत हमेशा पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों का समर्थन करता रहा है और प्रधानमंत्री भी गाजा सहित पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में उठाए गए कदमों का स्वागत करते हैं.

मीटिंग के नतीजे: गाजा के लिए अरबों डॉलर का ऐलान
बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने बड़ा ऐलान किया. उन्होंने बताया कि कजाकिस्तान, अजरबैजान, यूएई, मोरक्को, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, उज्बेकिस्तान और कुवैत समेत नौ देशों ने गाजा के लिए 7 अरब डॉलर के राहत पैकेज का वादा किया है. अमेरिका ने भी 10 अरब डॉलर देने की घोषणा की, हालांकि इस राशि का इस्तेमाल किस तरह होगा, इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दी गई. इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोर्स के कमांडर मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स के अनुसार, मोरक्को, कजाकिस्तान, कोसोवो और अल्बानिया हजारों सैनिक भेजने को तैयार हैं, जबकि मिस्र और जॉर्डन प्रशिक्षण सहायता देंगे.

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यूएन को चुनौती या सहयोग? ट्रंप ने दिया जवाब
इस नए मंच को लेकर चर्चा है कि क्या यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को चुनौती देने के लिए बनाया गया है. इस पर ट्रंप ने कहा कि अमेरिका फिर से United Nations के साथ मिलकर काम करेगा. उनके मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र में बड़ी संभावनाएं हैं, लेकिन उसे और मजबूत करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि ‘Board of Peace’ निगरानी और सहयोग की भूमिका निभा सकता है.

भारत ने क्यों खेला ‘ऑब्जर्वर कार्ड’?
वॉशिंगटन स्थित US Institute of Peace में हुई बैठक में भारत की मौजूदगी ने साफ संकेत दिया कि नई पहल से दूरी भी नहीं और जल्दबाजी भी नहीं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत फिलहाल “वेट एंड वॉच” रणनीति पर चल रहा है यानी पहले पूरी दिशा और असर को समझना, फिर अंतिम फैसला लेना.

‘Board of Peace’ का असली मकसद क्या है?
इस संगठन की घोषणा पिछले महीने World Economic Forum के दौरान की गई थी. शुरुआत में इसका लक्ष्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी और पुनर्निर्माण था, लेकिन अब इसे बड़े वैश्विक शांति मंच के रूप में विकसित करने की कोशिश हो रही है.

भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम?
भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया में संतुलित विदेश नीति अपनाता रहा है. ऐसे में सीधे सदस्य बनने के बजाय ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल होना एक सोच-समझकर उठाया गया कदम माना जा रहा है. इससे भारत ने अपने कूटनीतिक विकल्प खुले रखे हैं और वैश्विक समीकरणों पर नजर भी बनाए रखी है.