Saudi vs UAE Conflict: मध्य-पूर्व एक बार फिर उबाल पर है. कभी एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाल दो शक्तिशाली मुस्लिम देश सऊदी अरल और संयुक्त अरब अमीरात एक दूसरे के आमने सामने हैं. दोनों देशों के बीच छिपे मतभेद अब सामने आ गए हैं. भले ही अब दोनों देशों के बीच तनाव पहले से कुछ कम होता दिख रहा हो लेकन जानकारों का मानना है कि दोनों देशों के बीच यह शांति ज्यादा समय तक रहने वाली नहीं है. लेकिन इन दोनों देशों के बीच टेंशन की सबसे ज्यादा तपती आंच एशिया के उस मुल्क को महसूस हो रही है जिसकी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा इन दोनों देशों की बैसाखियों के ही सहारे है. हम बात कर रहे हैं भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की. क्या अपनी कंगाली से जूझ रहा पाकिस्तान इन दोनों मुस्लिम देशों की लड़ाई में तटस्थ रह पाएगा या फिर उसे किसी एक का पक्ष चुनकर बड़ी कूटनीतिक कीमत चुकानी होगी?
यमन बना टकराव की बड़ी वजह
कुछ दिन पहले ही सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में एक हवाई हमला किया जिसमें यूएई से जुड़े हथियारों और सैन्य वाहनों पर हमला बोला गया, ऐसा दावा किया गया. इसके बाद रियाद ने यूएई से यमन सरकार के अनुरोध पर 24 घंटे के अन्दर अपनी सेना वापस बुलाने की मांग कर दी है. यूएई ने आरोपों से इनकार किया लेकिन तनाव बढ़ता देख अपनी सेनाएं वापस बुलाने का ऐलान भी कर दिया.
क्यों आमने-सामने आ रहे हैं सऊदी और यूएई?
सऊदी अरब अब खुद को मुस्लिम दुनिया का लीडर मानते हुए निवेश और क्षेत्रीय सुरक्षा पर खास ध्यान दे रहा है.
जानकारों के अनुसार बीते कुछ सालों में दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक महत्व अलग-अलग दिशा में बढ़ रहे हैं.
वहीं दूसरी तरफ यूएई अफ्रीका, लाल सागर और अहम समुद्री रास्तों पर अपना प्रभाव बढ़ाने में लगा हुआ है.
यूएई का अब्राहम एकॉर्ड में शामिल होना भी. एक ऐसे समय में जब मुस्लिम देश इसराइल को मान्यता देने के लिए सऊदी अरब की तरफ देख रहे थे तो यूएई ने आगे बढ़कर इसराइल को मान्यता दे दी.
लेकिन इससे पाकिस्तान की कैसे बढ़ी चिंता?
पाकिस्तान के पहले से ही सऊदी अरब और यूएई दोनों से अच्छे और पुराने रिश्ते रहे हैं. दोनों देशों में लाखों पाकिस्तानी काम करते हैं. हाल ही में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक रक्षा करार भी हुआ है. ऐसे में अगर दोनों खाड़ी देशों के बीच मामला आगे बढ़ता है तो पाकिस्तान के लिए तटस्थ रहना सबसे बड़ा काम होगा. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान भले ही सुलह कराने की कोशिश करे लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं तो उसे किसी एक पक्ष का साथ देना पड़ सकता है. जानकारों का मानना है कि यूएई पहले ही कई मामलों में भारत को प्राथमिकता दे चुका है. ऐसे में अगर पाकिस्तान सऊदी के साथ जाता है तो यूएई भारत का साथ और मजबूती से पकड़ सकता है.
क्या पाकिस्तान न्यूट्रल रह पाएगा?
यमन संकट के बीच यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान का मुस्लिम दुनिया की एकमात्र परमाणु शक्ति पाकिस्तान का दौरा और पाक पीएम शहबाज शरीफ से मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है. वहीं पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने सऊदी विदेश मंत्री से भी संपर्क किया. लेकिन आधिकारिक बयानों में यमन का कहीं भी जिक्र नहीं हुआ, लेकिन यह माना जा रहा है कि पाकिस्तान पर्दे के पीछे तनाव कम करने की पूरी कोशिश की गई.
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यमन में यूएई समर्थित गुटों के खिलाफ सऊदी की कार्रवाई तेज होती है तो रक्षा समझौते की वजह से पाकिस्तान पर सऊदी अरब के पक्ष में खड़े होने का दबाव बढ़ सकता है.
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आगे क्या बढ़ेगा तनाव?
जानकारों के अनुसार यमन के साथ ही सूडान, लीबिया और अफ्रीकी देशों में बंदरगाहों और दूसरे ठिकानों को लेकर भी सऊदी अरब और यूएई आमने-सामने हैं. ऑयल पॉलिसी, ओपेक के फैसले और लाल सागर की सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर भी दोनों के रास्ते अलग होते दिखाई दे रहे हैं. लेकिन अमेरिका दोनों देशों को टकराव से रोकने की पूरी कोशिश में है लेकिन जानकारों की मानना है कि विवाग बढ़ता है तो अमेरिकी दखल के बाद भी हालात काबू में रहना मुश्किल हो सकता है.
यमन की लड़ाई सिर्फ एक देश की जंग नहीं रह गई है, बल्कि यह खाड़ी राजनीति की नई दरार बन चुकी है. अगर सऊदी अरब और यूएई के रिश्तों में खटास और बढ़ती है, तो पाकिस्तान जैसे देशों के लिए संतुलन बनाना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.
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