China Cargo Ship: यह कहानी एक बहुत बड़े मालवाहक जहाज की है, जिसने दुनिया के तीन महासागरों का चक्कर लगाकर सिर्फ पांच विशाल क्रेनों की डिलीवरी की. तकरीबन 800 फुट लंबा जहाज 29-30 जून को चीन की शंगाई शहर से रवाना हुआ. इसक काम चीन में बनी क्रेनों को जमैका और अमेरिका के गल्फ कोस्ट के बंदरगाहों पर लगाया जाना था. जहाज पहले दक्षिण चीन सागर से गुजरा, फिर हिंद महासागर पार किया और करीब 37000 किलोमीटर की लंबी दूरी तय की.

पनामा नहर ने दिखाया रेड सिग्नल
तीन महीने से ज्यादा समय समुद्र में रहने के बाद अक्टूबर में यह जहाज जमैका के किंग्स्टन बंदरगाह पहुंचा. आमतौर पर शंघाई से मिसिसिपी तक का सफर एक महीने में हो सकता है, अगर जहाज प्रशांत महासागर और पनामा नहर से जाए लेकिन इस जहाज पर लगी क्रेनों के लंबे हाथ, जिन्हें बूम कहा जाता है, जहाज़ के बाहर निकले हुए थे. पनामा नहर में ऐसे माल की अनुमति नहीं होती, क्योंकि इससे नहर को नुकसान हो सकता है. इसलिए जहाज को अफ्रीका के चारों तरफ से लंबा रास्ता लेना पड़ा.
इस यात्रा का सबसे मुश्किल और खतरनाक हिस्सा था अफ्रीका के दक्षिणी सिरे पर केप ऑफ गुड होप. जहाज के कप्तान टाय मैकमाइकल के मुताबिक तेज लहरों की वजह से को मोजाम्बिक के पास करीब दो हफ्ते और दक्षिण अफ्रीका के पास एक हफ्ते तक रुकना पड़ा. 14 अगस्त को जहाज ने अफ्रीका को पार किया और तीन हफ्तों में अटलांटिक महासागर पार कर 11 सितंबर को अमेरिका के गल्फपोर्ट पहुंचा.
3 दिसंबर को पहुंचा वापस
टेक्सास और जमैका में क्रेन उतारने के बाद जहाज वापस लौटते समय पनामा नहर से गुजर सका और छह महीने का पूरा चक्कर लगाकर 3 दिसंबर को फिर शंघाई पहुंच गया. इतने लंबे सफर ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अल्ट्रा-लॉन्ग शिपिंग रूट्स यानी बेहद लंबी समुद्री यात्राओं की तरफ खींचा. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक यह यात्रा दिखाती है कि वैश्विक व्यापार किस तरह दूर-दराज के देशों पर निर्भर है.
अमेरिका की चिंता
अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही सरकारें चीन में बनी क्रेनों पर चिंता जता चुकी हैं. उनका कहना है कि बंदरगाहों पर चीनी क्रेनों पर निर्भर रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक अमेरिका के बंदरगाहों पर लगी करीब 80 फीसदी क्रेन चीन में बनी हैं. इसी वजह से व्हाइट हाउस अब चाहता है कि अमेरिकी बंदरगाह चीन के अलावा दूसरे देशों से क्रेन लें और देश में ही क्रेन बनाने की क्षमता को दोबारा विकसित किया जाए हालांकि यह आसान नहीं है, क्योंकि बीते 20 सालों से चीनी क्रेन सबसे सस्ती और आसानी से मिलने वाला विकल्प रही हैं.
