Pakistan-Saudi Arabia defense ties: पाकिस्तान और सऊदी अरब के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच हाल ही में हुई कुछ मुलाकातों ने रक्षा सहयोग को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने के संकेत दिए हैं. इस पहल को मध्य पूर्व और उससे बाहर बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के नजरिए से देखा जा रहा है. जानकारों का मानना है कि पहली नजर में यह कदम एक साधारण हथियार सौदे जैसा दिख सकता है, लेकिन हकीकत में ये माजरा  कुछ और है. ये किसी और देश के रणनीतिक गठबंधनों के व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा है. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक रियाद पाकिस्तान को दिए गए करीब 2 अरब डॉलर के ऋण को हथियार सौदे में बदलने पर विचार कर रहा है, जिसका केंद्र संयुक्त रूप से पाकिस्तान और चीन द्वारा विकसित JF-17 फाइटर जेट हो सकता है.

ड्रैगन की रणनीति

कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह सौदा चीन की बड़ी रणनीति को भी दर्शाता है. बीजिंग उन बाजारों में फिर से एंट्री लेना चाहता है, जहां पहले उसके रक्षा निर्यात को खास सफलता नहीं मिली. बीजिंग की इस मुहिम में पाकिस्तान को एक पॉलिटिकली रूप से स्वीकार्य डीलर के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. एशियाई मीडिया में इसे ‘कर्ज के बदले हथियार’ (डेट-फॉर-आर्म्स) मॉडल के रूप में देखा जा रहा है.

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पारंपरिक कर्ज-बदले-डिफेंस डील

यूरोपीयन मीडिया आउटलेट ईयू रिपोर्टर के मुताबिक, ‘पहली नजर में यह समझौता एक पारंपरिक कर्ज-बदले-हथियार सौदे जैसा लगता है, लेकिन जेएफ-17 का निर्यात इतिहास गंभीर सवाल खड़े करता है. करीब एक दशक पहले चीन ने इस विमान को कम लागत वाले बहुउद्देश्यीय फाइटर के तौर पर बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार और सऊदी अरब जैसे देशों को आक्रामक तरीके से पेश किया था.

इनमें से अधिकांश देशों ने अंततः सौदे से दूरी बना ली. म्यांमार ही इसका एकमात्र खरीदार बना, लेकिन 2023 तक उसके ज्यादातर विमान इंजन, एवियोनिक्स, रडार और ढांचागत थकान जैसी पुरानी समस्याओं के कारण ग्राउंडेड बताए गए, जिससे इसकी परिचालन क्षमता पर गंभीर सवाल उठे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने लीबिया, बांग्लादेश और अब सऊदी अरब के साथ संभावित रक्षा निर्यात सौदों को आगे बढ़ाया है. पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह एक सुनियोजित रणनीति है, जिसके तहत पाकिस्तान खुद को मुस्लिम बहुल देशों के लिए एक रक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है और जेएफ-17 को चीन या रूस पर सीधे निर्भर हुए बिना एक ‘तटस्थ” विकल्प के रूप में पेश कर रहा है. हालांकि, पाकिस्तान की सीमित औद्योगिक क्षमता को देखते हुए, पर्दे के पीछे चीन की भूमिका- चाहे वह पूर्ण विमान आपूर्ति हो या अहम तकनीकी घटक-अनिवार्य मानी जा रही है.

विश्लेषकों ने इसे चीन की ‘बैकडोर रणनीति’ करार दिया है, जिससे वह राजनीतिक विरोध और प्रतिष्ठा से जुड़े जोखिमों को दरकिनार कर सकता है. यूरोप के लिए इसके निहितार्थ चिंताजनक बताए गए हैं. इस तरह के अप्रत्यक्ष हथियार निर्यात से यूरोपीय संघ की मानवाधिकार सुरक्षा और हथियारों के अंतिम उपयोग की शर्तें लागू कराने की क्षमता कमजोर होती है. इससे वैश्विक हथियार शासन में मानक तय करने वाली संस्था के रूप में ईयू की भूमिका और उसकी सॉफ्ट पावर भी प्रभावित होती है.

ईयू रिपोर्टर के मुताबिक, ‘अमेरिका के लिए भी इसके गंभीर परिणाम हैं. पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाकर बीजिंग अपनी रक्षा उपस्थिति का विस्तार कर सकता है, बिना सीधे तौर पर अमेरिकी ‘रेड लाइन्स’ को छुए. इससे प्रतिबंधों, राजनीतिक दबाव और कूटनीतिक रोकथाम की प्रभावशीलता घटती है. खास चिंता यह है कि चीनी तकनीक- भले ही अप्रत्यक्ष रूप से सऊदी अरब जैसे अमेरिका के करीबी सहयोगी देशों की वायु सेनाओं में शामिल हो सकती है. ऐसे में इंटरऑपरेबिलिटी, डेटा सुरक्षा और भविष्य के रणनीतिक गठबंधन जैसे सवाल अहम हो जाते हैं, खासकर उस समय जब अमेरिका हिंद-प्रशांत और मध्य पूर्व दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा गुटों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.’ (IANS)