बांग्लादेश में अब बस दो दिन बाकी हैं, 12 फरवरी को लोग संसद के लिए वोट डालेंगे, साथ ही एक रेफरेंडम भी होगा- जहां सिर्फ ‘YES’ या ‘NO’ चुनना है. ये रेफरेंडम ‘जुलाई नेशनल चार्टर 2025’ पर है, जो पिछले साल की छात्र क्रांति (मॉनसून रिवॉल्यूशन या जुलाई अपराइजिंग) के बाद बना. उस क्रांति ने शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार गिराई और मुहम्मद यूनुस को अंतरिम चीफ बना दिया. रेफरेंडम के लिए अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने जनता से खुलकर ‘YES’ वोट देने की अपील की है. सरकार का कहना है कि इससे देश में बड़े सुधारों को जनसमर्थन मिलेगा, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दबाव मान रहा है.

क्या है जनमत संग्रह का मुद्दा?
यह जनमत संग्रह ‘जुलाई नेशनल चार्टर–2025’ नाम के सुधार प्रस्तावों पर आधारित है. इस चार्टर में कुल 84 बिंदुओं के बदलाव शामिल हैं, जिन्हें चार बड़े क्षेत्रों राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक और आर्थिक में बांटा गया है. सरकार चाहती है कि जनता इन सुधारों पर ‘YES’ कहे, ताकि इन्हें आगे लागू किया जा सके.

रिफॉर्म पैकेज क्या है और क्यों है जरूरी?
यूनुस ने इसे 17 अक्टूबर को एक बड़े समारोह में लॉन्च किया था, जहां राजनीतिक पार्टियों और नेशनल कंसेंसस कमीशन के साथ लंबी चर्चा के बाद ये तैयार हुआ. उन्होंने कहा कि ये चार्टर “बर्बरता से सभ्य समाज की ओर कदम” है. रेफरेंडम में सिर्फ एक सवाल है, जो चार मुख्य रिफॉर्म एरिया को कवर करता है. वोटर्स को ‘हां’ या ‘नहीं’ चुनना है. अगर वो ज्यादा सहमत हैं तो ‘हां’, वरना ‘नहीं’. लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये पैकेज इतना जटिल है कि आम वोटर के लिए समझना मुश्किल हो सकता है. कोई बदलाव पसंद आए तो कोई नहीं, लेकिन सबको एक साथ वोट करना पड़ेगा.

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यूनुस की खुली अपील से बढ़ा विवाद
ढाका में एक कार्यक्रम के दौरान यूनुस ने कहा कि अगर ‘YES’ वोट जीतता है, तो बांग्लादेश का भविष्य ज्यादा सकारात्मक दिशा में बढ़ेगा. चुनाव कानून के तहत प्रचार खत्म होने से ठीक पहले दी गई इस अपील को लेकर सवाल उठे कि क्या सरकार को जनमत संग्रह में तटस्थ नहीं रहना चाहिए था.

सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल का आरोप
विपक्ष का आरोप है कि ‘YES’ वोट के समर्थन में सरकारी मशीनरी का खुलकर इस्तेमाल हुआ. बांग्लादेश बैंक के निर्देश पर कई सरकारी दफ्तरों में ‘YES’ समर्थन वाले बैनर लगाए गए. बैंकों से CSR फंड के जरिए NGO अभियानों को सहयोग देने की बातें भी सामने आईं. चुनाव आयोग ने बाद में सरकारी अधिकारियों को ऐसे अभियानों से दूर रहने का आदेश दिया.

संविधान पर उठे सवाल, आलोचना और लीगल सवाल
कई जूरिस्ट्स ने रेफरेंडम की वैधता पर सवाल उठाए हैं. बांग्लादेश के संविधान में ऐसे रेफरेंडम का कोई प्रावधान नहीं है. लीडिंग जूरिस्ट स्वाधीन मलिक ने कहा, “जुलाई चार्टर के ज्यादातर फैसले मौजूदा संविधान के खिलाफ हैं.” उन्होंने ये भी जोड़ा कि प्रेसिडेंट मोहम्मद शाहबुद्दीन ने इसे साइन किया और गजट जारी किया, लेकिन अगर संविधान निलंबित या मार्शल लॉ होता तो ठीक था. “चूंकि ऐसा कुछ नहीं हुआ, सबकुछ मौजूदा संविधान के मुताबिक होना चाहिए,” मलिक ने बताया. आलोचक कहते हैं कि ये रेफरेंडम अगली सरकार को चार्टर लागू करने के लिए बाध्य करेगा और यूनुस रेजीम को वैधता देगा. याद दिला दें, यूनुस की सरकार अगस्त 5, 2026 को स्टूडेंट-लेड जुलाई अपराइजिंग के बाद बनी, जब शेख हसीना की अवामी लीग सरकार गिर गई.

आम मतदाता की उलझन
आलोचकों का कहना है कि बैलेट में एक ही सवाल है, लेकिन उसमें कई जटिल सुधार शामिल हैं. कोई मतदाता कुछ सुधारों से सहमत हो सकता है और कुछ से नहीं ऐसे में सिर्फ ‘YES’ या ‘NO’ का विकल्प भ्रम पैदा करता है.

आगे की तस्वीर
अगर ‘YES’ जीतता है, तो यूनुस सरकार इसे जनता की मंजूरी बताएगी. लेकिन ‘NO’ की स्थिति में अंतरिम सरकार की साख पर सवाल और गहरे हो सकते हैं. चुनावी दिन रेफरेंडम का फैसला आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय करेगा.