
US Iran military tension: ईरान की आंखें खुल गई हैं. ईरान समझ गया है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप किसी भी कीमत पर उससे समझौता करने को तैयार नहीं हैं. वार्ता के जरिए सिर्फ बड़े हमले की तैयारी की जा रही है. असल में ईरान से हुई वार्ता के ठीक बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दो ऐसे कदम उठाए. जिसके बाद ईरान और दुनिया के दूसरे देशों का भ्रम टूट गया. आज दोनों पक्ष युद्ध की धमकी दे रहे हैं.
बातचीत के बहाने हमले की तैयारी
डॉनल्ड ट्रंप ईरान को अपमानित करते हुए कह रहे हैं. ईरान, अमेरिका से डील करने के लिए गिड़गिड़ा रहा है. डॉनल्ड ट्रंप ईरान को धमकी दे रहे हैं. एक और नौसैनिक बेड़ा ईरान की तरफ जा रहा है. मतलब ट्रंप कह रहे हैं कि अमेरिका की शर्तों पर ईरान ने डील नहीं की तो अमेरिका हमले के लिए तैयार है.
एक बात जो अमेरिका के राष्ट्रपति ने नहीं बताई. वो ये है कि ईरान के पास मौजूद अमेरिका के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप यूएसएस अब्राहम लिंकन ने कल हुई मीटिंग के बाद अपनी लोकेशन चेंज कर ली है. पहले ईरान पर स्ट्राइक रेंज से काफी पीछे तैर रहा यूएसएस अब्राहम लिंकन अब उस लोकेशन पर आ गया है. जहां से सीधे ईरान पर हमला किया जा सकता है.
इससे पहले 3 फरवरी को अमेरिकी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप ईरान से 500 मील यानी लगभग 800 किलोमीटर दूर अरब सागर में तैनात था. ओमान में हुई मीटिंग के बाद ये बेड़ा ईरान से 100 किलोमीटर और नजदीक आ गया है . यानी इस वक्त ये बेड़ा ईरान से सिर्फ 700 किलोमीटर दूर खड़ा है.
ईरान से 700 किमी दूर खड़ा है एयरक्राफ्ट कैरियर
आपको इस दूरी और ईरान पर अमेरिका की स्ट्राइक की क्षमता के कनेक्शन को भी समझना चाहिए. इस एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप में अमेरिका के F-35 C और F-18 Super Hornet फाइटर जेट्स तैनात हैं. -F-35 C की ऑपरेशनल रेंज लगभग 1100 किलोमीटर है. जबकि अंदर तक स्ट्राइक में माहिर F-18 Super Hornet की ऑपरेशनल रेंज 720 किलोमीटर है.
यानी ईरान से सिर्फ 700 किलोमीटर दूर मौजूद इस एयरक्राफ्ट कैरियर के दोनों ताकतवर फाइटर जेट्स ईरान पर आसानी से हमला कर सकते हैं.
इसके अलावा ट्रंप ने एक और एयरक्राफ्ट कैरियर के ईरान पहुंचने की बात फिर से दोहराई है. इसीलिए ईरान में माना जा रहा है कि अमेरिका बातचीत के बहाने अपनी हमले की तैयारियों को और मजबूत कर रहा है. यानी ये वार्ता सिर्फ एक दिखावा है. जिसके जरिए कुछ और वक्त काटा जा रहा है. ईरान में इस सोच की एक और वजह भी सामने आई है.
ट्रंप ने ईरान पर लगाए नए प्रतिबंध
डोनाल्ड ट्रंप ने ओमान में ईरान से इनडायरेक्ट बातचीत के फौरन बाद एक आदेश पर साइन किया. जिसके मुताबिक अब अमेरिका उन देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा. जो ईरान से व्यापार करेंगे . यानी जिस ईरान की इकोनॉमी अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले ही ध्वस्त थी. अब ट्रंप उसे पूरी तरह तबाह करना चाहते हैं. जिस पेपर पर ट्रंप ने साइन किया. उसका सीधा मतलब है.
जो भी देश ईरान से सीधे या घुमाकर तेल, गैस, पेट्रोकेमिकल या कोई भी सामान खरीदेगा. उसे अमेरिका में अपने सामान पर 25% तक अतरिक्त टैक्स देना होगा. ऐसे टैक्स को द्वितीयक प्रतिबंध कहते हैं. जो सीधे अमेरिका के टारगेट पर मौजूद देश पर नहीं उससे व्यापार करने वाले देश को दंडित करते हैं.
यानी अब दुनिया का कोई भी देश ईरान और अमेरिका से एक साथ व्यापार नहीं कर सकता है. इस समय दुनिया के 100 से ज्यादा देश किसी ना किसी तरह ईरान से व्यापार करते हैं. ट्रंप की नई नीति से सबसे ज्यादा परेशानी चीन, इराक, तुर्किए और यूएई को होगी. ये देश ईरान से सबसे ज्यादा व्यापार कर रहे हैं.
ईरान ने भी अमेरिका को चेताया
अब इन देशों को सोचना पड़ेगा. ईरान से सस्ता तेल लें या अमेरिका का महंगा बाज़ार बचाएं. जबकि ईरान इन प्रतिबंधों से सदमे में है. ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से जर्जर है . खाने-पीने के सामान की महंगाई दर 70% से ज्यादा है. मुद्रा इतिहास में सबसे निचले स्तर पर है. बेरोजगारी की वजह से जनता विद्रोह कर चुकी है. इसीलिए आज अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के उकसावे के बाद ईरान का संयम भी टूट गया.
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— Zee News (@ZeeNews) February 7, 2026
अमेरिका से वार्ता को सकारात्मक बता रहे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अब कहा है कि अमेरिका के साथ बातचीत में ईरान का मिसाइल प्रोग्राम कभी भी बातचीत का विषय नहीं होगा. वॉशिंगटन अगर ईरान पर हमला करता है तो क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा.
ओमान में हुई वार्ता के पहले राउंड में ही ईरान साफ कर चुका है कि वो परमाणु समझौते के अलावा अमेरिका की कोई शर्त मानने को तैयार नहीं है. ऐसे में ट्रंप वाकई ईरान से समझौता करना चाहते. तो उसके सामने नई मुश्किलें नहीं खड़ी करते. मतलब साफ है कि अमेरिका के राष्ट्रति डॉनल्ड ट्रंप सिर्फ ईरान पर हमला करने की परिस्थितियां तैयार कर रहे हैं. अब ईरान को भी ये बात समझ में आ गई है. यानी शांति की उम्मीद से युद्ध की आशंका ज्यादा बढ़ गई है.

