India-US Trade Deal: भारत ने हाल में कई बड़े व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर किया है. इसमें सबसे बड़ी डील ईयू के साथ हुई. यूरोपीय यूनियन के साथ हुए इस ऐतिहासिक व्यापारिक समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील’ करार दिया गया है. इसके कुछ समय बाद ही भारत के आगे अमेरिका भी झुका और ट्रंप ने न केवल डील को फाइनल किया बल्कि भारत पर थोपे 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया.
हालांकि, हर बार के जैसे ही ट्रंप ने अपने ऐलान के दौरान कुछ ऐसी बातें, जो वास्तव में एग्जिस्ट ही नहीं करती हैं. ट्रंप ने अपने एक पोस्ट में दावा किया आने वाले समय में भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा और वह कच्चा तेल वेनेजुएला और अमेरिका से आयात करेगा. लेकिन ट्रंप के इस पोस्ट का जवाब खुद रूस की ओर दिया जा चुका है.
क्रेमलिन ने कहा कि रूसी तेल खरीद रोकने या इससे जुड़ी कोई भी बात रूस और भारत के बीच नहीं हुई. इसका मतलब साफ है कि भारत रूस से तेल खरीना जारी रखे हुए है. इन सब के बीच कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत को रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने या रोकने के लिए राजी करने में सफल होते हैं, तो रूस को तेल राजस्व में भारी गिरावट का सामना करना पड़ सकता है. अपने आज के इस आर्टिकल में इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे…
अगर भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद किया तो…
वैश्विक मामलों के जानकारों ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए दावा किया है कि अगर ट्रंप की बात वास्तव में सच होती है, तो इसका बहुत बड़ा असर रूस पर देखने को मिलेगा. रूसी तेल राजस्व में भारी गिरावट का भी सामना करना पड़ सकता है. जिससे बहुत हद तक मॉस्को को विकल्प के तौर पर दूसरे खरीदारों को आकर्षित करने के लिए कच्चे तेल की कीमतों को कम करना होगा. हालांकि, इस बात पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए कि भारत ने ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं और सस्ते कच्चे तेल की उपलब्धता के महत्व का हवाला देते हुए आधिकारिक तौर पर खरीद बंद नहीं की है.
रूसी तेल आयात के आंकड़ों में गिरावट?
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट पर असर डालें, तो पता चलता है कि भारत का रूसी तेल आयात नवंबर की तुलना में दिसंबर में 22% घटकर 138 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया, जो जनवरी 2023 के बाद का सबसे निचला स्तर है. भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी घटकर 27.4% रह गई, जबकि ओपेक की हिस्सेदारी बढ़कर 53.2% हो गई. वहीं, वोर्टेक्सा कंसल्टेंसी के डेविड वेच का कहना है कि किसी भी और कमी का पहले से ही महत्व होगा, क्योंकि एकमात्र प्रासंगिक वैकल्पिक खरीदार चीन है, जिसकी प्रतिबंधित कच्चे तेल को लेने में भी अपनी सीमाएं हैं.
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इस बात पर ध्यान केंद्रित करना होगा कि भले ही ट्रंप ने दावा किया हो, कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा; लेकिन ऐसा कोई भी आदेश भारत की ओर से किसी तेल कंपनियों को नहीं दिया गया है. हालांकि, व्यापारियों का कहना है कि इस सा अप्रैल में कच्चे तेल के आयात में गिरावट आ सकती है. जब रूस समर्थित रिफाइनरी नायरा एनर्जी एक महीने के लिए निर्धारित रखरखाव कार्य करेगी. नायरा की क्षमता 400,000 बैरल प्रति दिन है.
ट्रंप के दावे के बाद क्या होगा?
गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप ने सुझाव दिया कि भारत रूसी कच्चे तेल के विकल्प के रूप में अमेरिका या वेनेजुएला से कच्चे तेल को बढ़ा सकता है. हालांकि, ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की एलेक्जेंड्रा हरमन का कहना है कि अमेरिकी कच्चे तेल की गुणवत्ता अलग है और यह सीधे रूसी कच्चे तेल का विकल्प नहीं हो सकता, जबकि वेनेजुएला की निर्यात क्षमता सीमित है. इसके अलावा सऊदी अरब, यूएई और इराक से आने वाला कच्चा तेल अधिक व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभर सकता है. लेकिन इस बीच विश्लेशकों का कहना है कि भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद रूस से मिलने वाली भारी छूट भारतीय खरीदारों के लिए इसे आकर्षिक बनाए रख सकती है.
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