Iran violence: ईरान में​ सिर्फ मस्जिदें नहीं जलाई जा रहीं, इबादत करने वालों को भी जलाया जा रहा है. ईरान में मुस्लिमों की हत्या हो जा रही है. अब तक 600 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. कुछ एजेंसियां मौत के आंकड़े को 2000 से भी ज्यादा बता रही हैं. ईरान में 15 दिन से इस्लामिक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी है. सभी मुस्लिम देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान मारे गए. ज्यादातर की मौत सुरक्षा बलों की गोलियों से हुई. मारे गए लोग मुसलमान हैं, उनके साथ किसी की भी सहानुभूति क्यों नहीं दिख रही.

ईरान में मुसलमानों की मौत के बाद गाजा प्रेमी गैंग सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहा है. इन मुसलमानों से एकजुटता क्यों नहीं दिखाई जा रही. आपको समझना चाहिए ईरान में मुसलमानों की मौत पर फतवा क्यों नहीं आया. मुसलमानों के बड़े नेताओं ने बयान क्यों नहीं जारी किया. ईरान में सैकड़ों मुसलमान मर गए. उन मौतों की निंदा करने वाला कोई बयान नहीं आया. 

24 घंटे में ईरान में क्या क्या हुआ?

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इस्लामिक सरकार के विरोध में जारी प्रदर्शन में किस तरह मुसलमान शासकों की सत्ता ने मुसलमानों की लाश गिरा दी. ईरान में पानी की तरह खून बहाया जा रहा है. तेहरान के कहरीजक फोरेंसिक सेंटर में प्रदर्शनकारियों के शवों को रखा गया है.वहां एक बड़े हॉल में नीली चादरों से ढके हुए शव रखे हैं. जिनके परिजन गायब हैं, वो शवों को देखकर उनकी तलाश कर रहे हैं. उन्हे पहचानने की कोशिश कर रहे हैं. सड़कों पर लाशें गिरी हैं. मांओं की गोद उजड़ी, बच्चों ने बाप खो दिए, लेकिन ये सब देखकर इस्लामिक दुनिया चुप है. खुद को मुसलमानों का मसीहा बताने वाले ठेकेदारों की आंखें बंद हैं. न कोई फतवा ना कोई बयानबाजी और ना ही कोई मुस्लिम नेता रोया ना ही विरोध में कोई जुलूस निकला.

गाजा के ‘मुसलमान’ दिखे..ईरान के क्यों नहीं?

कोई गाजा प्रेमी नहीं जानना चाहता जो ईरान में मारे गए, वो मुसलमान कौन थे. लेकिन आपको उनकी पहचान बताएंगे ताकि आप गाजा की हर मौत पर रोने वालों के आंसुओं की असलियत समझ सकें. सिर्फ 17 साल के अमीर अली हैदरी को ईरान में गोली मार दी गई. हैदरी शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहा था. 26 साल के इरफान सुल्तानी की गलती भी सिर्फ इतनी थी कि वो आर्थिक रूप से देश को खस्ताहाल करने वाली सरकार का विरोध कर रहा था. उसे भी गोली मार दी गई. 24 साल की रुबीना अमीनियन को ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शन के दौरान गोली मार दी गई. अकरम पीरगोजी की हत्या भी कर दी गई, क्योंकि वो भी आजादी मांग रही थी.

16 साल की गजल कलंदरी को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के लोग उठा ले गए. तब से उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. फैजा रशीदी को भी ईरान में प्रदर्शन के दौरान गोली लगी थी. लेकिन अब उसके बारे में किसी को नहीं पता वो जिंदा है या मर गईं. वहां चार-पांच नहीं सैकडों तस्वीरें हैं, जिनके साथ उनके परिवार के सपनों को मार दिया गया. आपने हमास के आतंकियों के मारे जाने पर भी दुनिया भर में मुसलमानों की आंखों से बहने वाले आंसू देखे होंगे, उनको शहीद बताया जाता है. लेकिन ईरान में मारे गए ये मुलसमान तो आतंकी भी नहीं थे. युवा थे जो अपना हक मांग रहे थे. लेकिन इस्लामिक जगत का दर्द सिर्फ उन्हीं मुसलमानों के लिए है जो पश्चिमी दुश्मन की गोली से मरते हैं? सवाल तो उठता है कि मुसलमानों को कोई इस्लामी हुकूमत मार दे, तो क्या वो सही है.

प्रदर्शन जारी

ईरान में अब तक 600 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. मरने वालों में 48 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी भी हैं. सरकार की सख्ती से नाराज कुछ प्रदर्शनकारी हिंसा भी कर रहे हैं.  इस हिंसा के बाद सख्ती से हिंसा और भड़क रही है. ईरान में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश हैं. ईरान के राष्ट्रपति ने हिंसा करने वालों को आतंकवादी कहा है. ऐसे लोगों को ईरान सरकार फांसी देने का एलान किया है. 10 हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. ईरान के जेल भी अब भर गए हैं.

किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. क्योंकि मारने वाला और मरने वाले दोनों मुसलमान हैं. सोचिए गाजा में एक मौत होती है तो उम्मा  की बात करने वालों  की रूह कांप जाती है, लेकिन ईरान में 600 से ज़्यादा मुसलमान मारे जाते हैं तो जुबान खामोश क्यों हो जाती है.

भारत में भी गाजा के मुसलमानों की मौत पर इमोशनल होने वाले नेता और मौलाना खामोश हैं. अक्सर किसी शोक की स्थिति में दो मिनट का मौन रखा जाता है. लेकिन लगता है, ईरान में मुसलमानों के नरसंहार पर परमानेंट मौन रख लिया गया है. आप समझिए कैसे जिन नेताओं को ईरान के मुसलमान, मुस्लिम और पीड़ित नहीं लगते, वो गाजा के नाम पर कैसे आंसू बहाते हैं.

असदुद्दीन ओवैसी गाजा में इजरायल के अटैक में मारे गए मुस्लिमों के लिए लगभग रो पड़े. लेकिन ईरान के मुसलमानों के लिए इनके आंसू न निकले. संसद में फिलिस्तीन जिंदाबाद के नारे लगाने वाले ओवैसी को ईरान की तस्वीर नहीं दिख रही या वो देखना नहीं चाहते क्योंकि ईरान में जालिम और जुल्म सहने वाला दोनों एक ही समुदाय से हैं.