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वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बने रहने के लिए कौशल के साथ ‘सोच की क्षमता का विकास’ भी जरूरी: केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह


तेजी से उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए क्षमता निर्माण को सामूहिक और पूरे समाज के दृष्टिकोण में बदलना होगा: डॉ. जितेंद्र सिंह

राष्ट्रीय क्षमता निर्माण के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और समाज को मिलकर काम करना होगा: डॉ. जितेंद्र सिंह

भारत में शोध और नवाचार के लिए परोपकार की संस्कृति विकसित करने की जरूरत: डॉ. जितेंद्र सिंह

प्रविष्टि तिथि: 26 AUG 2026 4:12PM by PIB Delhi

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बनाए रखने के लिए कौशल के साथ-साथ सोच की क्षमता का विकास भी समान रूप से आवश्यक है। डॉ. सिंह ने कहा कि तेजी से बदलते तकनीकी और वैश्विक माहौल से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए क्षमता निर्माण को व्यक्तिगत और कौशल आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर सामूहिक तथा पूरे समाज के प्रयास में बदलना होगा।

क्षमता निर्माण पर आयोजित एक गोलमेज सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि तकनीकी और सामाजिक विकास की गति में काफी तेजी आई है, जिससे निरंतर सीखना बेहद जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि आज सीखी गई कोई चीज कल तक पुरानी हो सकती है। इसलिए लोगों और संस्थानों को लगातार सीखते रहने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता विकसित करनी होगी।

डॉ. सिंह ने उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक क्षमता निर्माण के बढ़ते महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्थानों को एकीकृत तरीके से काम करना और संगठनात्मक सीमाओं से परे समन्वय स्थापित करना सीखना होगा, ताकि नई चुनौतियों पर तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सके और नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत को संस्थागत समन्वय के साथ पूरे समाज के दृष्टिकोण को जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि क्षमता निर्माण केवल कौशल विकसित करने या व्यक्तियों को सौंपे गए कार्यों के लिए तैयार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने ‘सोच की क्षमता का निर्माण’ करने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सही मानसिकता विकसित करना व्यक्तियों और संस्थानों के लिए परिस्थितियों के अनुरूप ढलने, नवाचार करने और प्रासंगिक बने रहने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बने रहने के लिए भारत को वैश्विक मानकों और रणनीतियों के अनुरूप आगे बढ़ना होगा।

मंत्री डॉ. सिंह ने कहा कि सरकार से हर काम अकेले करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती और अन्य हितधारकों की अधिक भागीदारी जरूरी है। अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोले जाने के भारत के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश को विभिन्न क्षेत्रों के बीच मिलकर काम करना सीखना होगा और ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा, जिसमें विभिन्न हितधारक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए योगदान दें।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने शासन में व्यावहारिकता के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियां निभाते समय केवल नियमों तक सीमित रहने के बजाय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना सीखना चाहिए। प्रभावी ढंग से काम करने के लिए उचित स्तर की व्यावहारिकता जरूरी है और इसके लिए सोच में बदलाव आवश्यक है।

मंत्री ने क्षमता निर्माण में निरंतर सीखने वाले प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि iGOT प्लेटफॉर्म पर 40 लाख से अधिक पंजीकृत लोग हैं, जो सरकारी अधिकारियों को निरंतर सीखने का मंच उपलब्ध कराता है। उन्होंने राष्ट्रीय सुशासन केंद्र और भारतीय लोक प्रशासन संस्थान का भी उल्लेख किया और इन्हें शासन तथा क्षमता निर्माण से जुड़े संस्थानों के व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बताया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि क्षमता निर्माण के क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न संस्थानों को एक बड़े पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि कौटिल्य केंद्र भारत के ऐतिहासिक और पारंपरिक ज्ञान को समकालीन राज्य क्षमता से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह का दृष्टिकोण व्यापक वैश्विक दक्षिण के लिए भी क्षमता निर्माण का मंच उपलब्ध करा सकता है।

शोध और नवाचार में गैर-सरकारी भागीदारी बढ़ाने के महत्व पर जोर देते हुए मंत्री ने राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) और एक लाख करोड़ रुपये की आरडीआई फंडिंग पहल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये पहल ऐसा माहौल तैयार करने के प्रयास हैं, जिसमें शोध और नवाचार के क्षेत्र में निजी भागीदारी और संसाधनों की भूमिका बढ़ सके।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत में शोध के लिए मजबूत परोपकार की संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सामाजिक और मानवीय कारणों के लिए परोपकार पहले से किया जाता रहा है, लेकिन पारंपरिक रूप से शोध को उतना महत्व नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि मानवता के कल्याण के लिए शोध को समर्थन देना भी समाज की सेवा और योगदान के एक रूप के तौर पर देखा जाना चाहिए।

मंत्री ने कहा कि आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए भारत को सभी स्रोतों से बड़े निवेश की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश के युवा उद्यमी प्रतिभा को उद्यमिता के साथ जोड़ रहे हैं और उनके लिए सही वातावरण तैयार करने से नवाचार को गति देने तथा उभरते क्षेत्रों में मजबूत क्षमताओं के निर्माण में मदद मिल सकती है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने क्षमता निर्माण और ज्ञान के आदान-प्रदान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को भी रेखांकित किया। वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच बढ़ते सहयोग का उल्लेख करते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसी पहल अधिक देशों को साथ ला सकती हैं और ज्ञान, अनुभव तथा क्षमता निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं को साझा करने के लिए व्यापक नेटवर्क विकसित कर सकती हैं।

अंत में, डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि क्षमता निर्माण का साझा उद्देश्य व्यक्तियों, संस्थानों, सरकार, उद्योग और समाज को भारत की प्रगति और वैश्विक प्रासंगिकता में प्रभावी योगदान देने के योग्य बनाना होना चाहिए।

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फोटो: बुधवार को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में नालंदा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘क्षमता निर्माण पर राउंडटेबल’ के दौरान केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह संबोधित करते हुए।

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पीके / केसी / केजे

(रिलीज़ आईडी: 2303582) आगंतुक पटल : 6