
Europe news today: एक तरफ ट्रंप की वजह से एक युद्ध छिड़ने वाला है तो दूसरी तरफ ट्रंप के बीते कुछ फैसलों ने एक यूरोपीय देश को अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है. ये देश है जर्मनी, जी हां वही जर्मनी जिसकी सत्ता हासिल करने के बाद एडॉल्फ हिटलर ने दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही को जन्म दिया था. अब इसी जर्मनी ने ठान लिया है कि वो एक बार फिर हिटलर जैसी ही शक्तिशाली सेना खड़ी करेगा. यानी जिस अमेरिका ने जर्मनी की ताकतवर सेना को मिटाने में अहम भूमिका निभाई. अब उसी अमेरिका की वजह से जर्मनी एक बार फिर बड़ी सैन्य शक्ति बनने जा रहा है.
जर्मनी का ब्लूप्रिंट
जर्मनी के मिलिट्री प्लान का विश्लेषण आपको बताएगा कि आज के जर्मनी को हिटलर जैसी फौज क्यों याद आ रही है. आपको ये भी पता चलेगा कि जिस अमेरिका ने हिटलर का अंत किया था वही अमेरिका इस हिटलर जैसी सेना के प्लान की वजह क्यों बना है. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुलकर सैन्य ताकत बढ़ाने का ऐलान किया है. जर्मनी ने दोबारा अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए कौन सा ब्लूप्रिंट तैयार किया है.
इसकी जानकारी भी हम आपको देंगे लेकिन उससे पहले आपको वो कारण जानना चाहिए जिसके चलते 80 साल तक युद्ध से दूर रहे इस देश को अचानक दोबारा अपनी ताकत बढ़ाने की जरूरत पड़ गई. इस वजह का नाम है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप. दरअसल दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी ने COLLECTIVE DEFENCE की नीति अपनाई थी. यानी नाटो अपनी सुरक्षा के लिए नाटो पर निर्भऱ था लेकिन हाल के दिनों में ट्रंप ने नाटो को कमजोर करना शुरु कर दिया है जिसकी वजह से जर्मनी में सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं बढ़ गई हैं. मित्रों…ट्रंप ने किस तरह दुनिया के सबसे बड़े सामरिक गठबंधन को कमतर करके आंकना शुरु कर दिया है. ये समझने के लिए आपको चौबीस घंटे पहले स्विट्जरलैंड के दावोस में ट्रंप का बयान बेहद गौर से सुनना चाहिए.
इसे ट्रंप की ईगो कह लीजिए या फिर अमेरिका की एहसानफरामोशी. जिस नाटो ने हर लड़ाई में अमेरिका का साथ दिया. उसी नाटो को ट्रंप ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच से गैर-जरूरी और कमजोर करार दे दिया. नाटो को लेकर ट्रंप का दूसरा कार्यकाल तल्ख बयान और सख्त फैसले लेकर आया है. ट्रंप की जुबान से लेकर उनके फैसलों तक सबकुछ एंटी नाटो ही नजर आता है. ऐसा क्यों कहा जा रहा है, ये समझने के लिए आपको ट्रंप 2.0 में नाटो को लेकर फैसलों को ध्यान से देखना और समझना चाहिए.
सबसे पहले ट्रंप ने नाटो सदस्यों को अपनी जीडीपी का 5 प्रतिशत नाटो के फंड में डालने के लिए दबाव बनाया. जिन देशों ने ट्रंप का हुक्म नहीं माना उनके ऊपर 15 से लेकर 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया गया. इसी महीने ट्रंप ने नाटो की 200 सैन्य चौकियों से अमेरिकी सैनिक भी वापस बुला लिए हैं. ग्रीनलैंड के मुद्दे पर डेनमार्क को धमकाकर भी ट्रंप ने यही साबित किया कि नाटो की एकता या नाटो की चिंताएं ट्रंप की नजरों में कोई मायने नहीं रखतीं.
साफ नजर आता है कि ट्रंप का मकसद नाटो को कमजोर करना है. ऐसे हालात में सिर्फ नाटो के जरिए जर्मनी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता. इसलिए जर्मनी की सरकार ने अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं. अब हम आपको जर्मनी का यही ब्लूप्रिंट दिखाने जा रहे हैं ताकि आप जर्मनी के मिलिट्री प्लान को बेहतर तरीके से समझ पाएं.
जर्मनी का डिफेंस बजट
जर्मनी ने वर्ष 2026 के लिए अपना रक्षा बजट बढ़ाकर 11 हजार 664 करोड़ रुपए कर दिया है. ये पिछले बजट की तुलना में तकरीबन 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. जर्मनी की फौज में सैनिकों की तादाद 1 लाख 84 हजार से बढ़ाकर 2 लाख 60 हजार कर दी गई है. जर्मनी का प्लान है कि वर्ष 2030 तक उसकी सेना में तकरीबन 20 लाख सैनिक तैनात हो जाएं. जर्मनी ने अपनी थलसेना के लिए बड़ी संख्या में बख्तरबंद वाहनों और हवाई रक्षा प्रणालियों का ऑर्डर दिया है. इसके साथ ही साथ जर्मनी ने अमेरिका के साथ पांचवीं पीढ़ी के F-35 लड़ाकू विमानों को लेकर डील भी की है.
जर्मनी का प्लान 4-D
यहां आपको जानना चाहिए कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से लेकर अब तक जर्मनी की हर सरकार सैन्य क्षमताओं को सीमित रखने की नीति पर ही चलती थी. दूसरे विश्वयुद्ध में जब हिटलर को मित्र देशों के गठबंधन के हाथों शिकस्त खानी पड़ी थी उसके बाद जर्मनी ने एक फॉर्मूला तय किया था. इस फॉर्मूले को आज इतिहास की किताबों में 4-D कहा जाता है. अब हम आपको उसी 4-D प्लान के बारे में बताने जा रहे हैं जिसका मकसद था पश्चिमी यूरोप में लंबे अर्से तक शांति कायम करना.
इस प्लान के पहले D का मतलब था डिमिलिट्राइज़ेशन यानी जर्मनी ने सैन्य ताकत ना बढ़ाने पर सहमति जताई थी. दूसरे D का अर्थ था डिनाजीफिकेशन यानी जर्मनी ने नाजी विचारधारा के प्रचार प्रसार पर पूरी तरह रोक लगाने का वादा किया था. तीसरे D का मतलब था डिसेंट्रलाइज़ेशन यानी जर्मनी ने शासन के ढांचे में स्थानीय निकायों की भागेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई थी और चौथे D का मतलब था डेमोक्राइज़ेशन यानी जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक परंपराओं को बढ़ावा देना.
कहते हैं काल का चक्र घूमकर अपनी जगह पर वापस आता है. जिस जर्मनी ने दूसरे विश्वयुद्ध के खून खराबे को देखने के बाद विनाशक हथियारों से तौबा कर ली थी. आज वही जर्मनी दोबारा सैन्य क्षमता में इजाफा करने की तरफ बढ़ रहा है. फर्क इतना है कि आज का जर्मनी सैन्य क्षमता बढ़ाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है. इस जर्मनी का मकसद हिटलर जैसा विस्तारवाद या नफरत हासिल करना नहीं है. दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर ने सिर्फ युद्ध नहीं किया था बल्कि उसने नरसंहार किया था. कुछ साल पहले मैं भी उस गैस चैंबर में गया था, जिसमें हिटलर ने हजारों यहूदियों का कत्ल किया था. आज आपको उस रिपोर्ट का एक छोटा सा हिस्सा हम फिर से दिखाना चाहते हैं. ताकि आप मानव इतिहास के उस काले अध्याय को महसूस कर सकें.
पड़ोसी देशों पर हमला करने के बाद हिटलर ने 11 दिसंबर 1941 को एक भाषण दिया था. जिसमें उसने कहा था मैं दूसरा विश्वयुद्ध नहीं चाहता लेकिन कुछ बड़े देशों ने मुझे युद्ध छेड़ने पर मजबूर किया. यह भाषण दरअसल हिटलर के नाजी प्रोपेगेंडा का हिस्सा था लेकिन आज का जर्मनी नाजी विचारधारा से प्रेरित नहीं है. ये तो ट्रंप के नाटो विरोधी फैसलों का पीड़ित है और इन्हीं हालात के चलते जर्मनी अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने या यूं कहें कि हिटलर जैसी सेना खड़ी करने पर मजबूर हुआ है.
