Why was Dipu Chandra Das killed in Bangladesh: बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की सरपरस्ती में चुन-चुनकर हिंदुओं का कत्लेआम जारी है. एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाला दीपू चंद्र दास भी कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार होने वाला ऐसा ही युवक था. वह ढाका से करीब 140 किमी दूर मयेमेन सिंह पुर में अपने परिवार के साथ टिन शेड वाले कच्चे घर में रहता था और परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था. गरीब होने के बावजूद दीपू जुझारू, मेहनती और नेक रास्ते पर चलने वाला इंसान था. लेकिन उसे पता नहीं था कि उसकी यही खूबियां एक दिन उसकी जान ले लेंगी.
दीपू की हत्या के बाद से सदमे हैं पत्नी
दीपू की बर्बर हत्या के बाद उसके घर में सन्नाटा पसरा है. पत्नी मेघना रानी घटना के बाद से सदमे में है और चुप-चुप रहने लगे हैं. बेटी दीपिका इतनी छोटी है कि वह पिता की मौत का मतलब तक नहीं समझ पा रही है. वहीं माता-पिता भक्त रविदास और शेफाली रविदास बेटे की हत्या के बाद गहरे सदमे में हैं. जबकि दो भाइयों अपू दास और रितिक दास के चेहरे पर दहशत पसरी हुई है.
पिता ने बताया हत्या का पूरा वाकया
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दीपू के पिता ने भारी दुख के साथ पूरे वाकये को विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि दीपू ने ग्रेजुएशन किया हुआ था. इसके बाद वह नौकरी की तलाश में था. गारमेंट फैक्ट्री में नौकरी तो तय पद से ज्यादा आवेदन आ गए. इसके बाद फैक्ट्री मालिक ने लॉटरी के जरिए भर्ती का फैसला किया. इत्तेफाक से दीपू का लॉटरी में नंबर आ गया और उसे नौकरी मिल गई.
बेटे की तरक्की से नाखुश कट्टरपंथियों ने मार डाला
पिता भक्त रविदास ने बताया कि बेटा दीपू अपनी मेहनत की वजह से फैक्ट्री मैनेजमेंट की नजरों में था और इस बार उसे प्रमोशन देने पर विचार हो रहा था. लेकिन इसी बात से नौकरी न पाने वाले लोग चिढ़ गए. उन्होंने पहले उसे नौकरी छोड़ने के लिए धमकाया. जब वह नहीं माना तो उस पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाकर मार डाला. इस काम में फैक्ट्री मैनेजर और पुलिस के लोग भी शामिल थे.
पीड़ित परिवार की मदद के नाम पर किया ढोंग
एक स्थानीय हिंदू व्यक्ति के मुताबिक, जब लोगों ने दीपू की हत्या की बात सुनी तो पूरे समुदाय में डर फैल गया. हमले के बाद जब भारत समेत विश्व समुदाय ने दबाव डाला तो बांग्लादेश सरकार ने मदद का नाटक किया. सरकार के अधिकारियों ने पीड़ित परिवार को महज 25 हजार टका नकद, कंबल, सिलाई मशीन और खान दिया. जब इस खानापूर्ति की आलोचना हुई तो 1 लाख टके का चेक और दिया गया. लेकिन यह पीड़ित परिवार के लिए नाकाफी है.
हालांकि इस मामले में अफसोस की बात ये है कि ईशनिंद का जो आरोप लगाकर दीपू चंद्र दास को मारा गया. जांच में वह फर्जी पाया गया. इस घटना के बाद कट्टरपंथियों में अमृत मंडल नाम के एक और हिंदू युवक को इसी पैटर्न पर पीट-पीटकर मार डाला.
