America Policy: क्या अमेरिका वाकई दुनिया का दादा है? क्या ये दुनिया अमेरिका की मर्जी से चलेगी? जहां मन होगा, वहां हमला करेगा..जिसे चाहे, उसे उसके देश में घुसकर किडनैप करेगा. और दुनिया के 195 देश चुपचाप देखते रहेंगे. यूएस एक ऐसा देश है..जिसे दूसरे देश के तानाशाह पसंद नहीं आते और अगर दुनिया में सबकुछ यूएस ही तय करेगा तो फिर यूएन क्या करेगा. क्यों नहीं यूएन में ताला लगा देते, उसे बंद कर देते. अब तानाशाहों को मिटाने वाले अमेरिकी मॉडल का DNA टेस्ट जरूरी है क्योंकि वेनेज़ुएला में अमेरिका की कार्रवाई एक बार फिर साम्राज्यवाद की याद दिलाती है. इसी तरह कई देशों में अमेरिका ने अपना विस्तार किया है.

अमेरिकी साम्राज्यवाद!

अमेरिका के विद्वान नोम चोमस्की अमेरिकी साम्राज्यवाद को छिपा हुआ या नरम साम्राज्यवाद कहते हैं जो लोकतंत्र फैलाने, आतंकवाद से लड़ने या मानवाधिकार जैसे बहानों से छिपा रहता है. लेकिन असल में वैश्विक वर्चस्व, संसाधनों पर कब्जा और आर्थिक नियंत्रण के लिए है. वेनेज़ुएला में जैसा तख्तापलट हुआ वो अमेरिकी साम्राज्यवाद का ऐसा ही रूप है. पिछले 12 साल से निकोलस मादुरो वेनेज़ुएला की सत्ता पर काबिज थे. वो वहां के लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए राष्ट्रपति थे. ये अलग बात है कि उन पर तानाशाह होने के आरोप लगते थे. लेकिन तानाशाही के आरोप तो ट्रंप पर भी लगते हैं. दुनिया के कई देशों में तानाशाह देश चला रहे हैं जिनसे ट्रंप के अच्छे रिश्ते भी हैं.

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ऐ ‘साहब’ ये ठीक नहीं!

इसलिए ये कोई वजह नहीं हो सकती कि तानाशाही का आरोप लगाकर किसी देश के राष्ट्रपति का तख़्ता पलट दिया जाए. ये नहीं हो सकता कि अमेरिका दुनिया के दूसरे देशों से अंतर्राष्ट्रीय नियमों का सम्मान करने की अपील करे लेकिन ख़ुद इन नियमों की धज्जियां उड़ाए. ऐसा करके अमेरिका दुनिया के सामने बार-बार अपनी दादागीरी का प्रदर्शन करता रहा है. ऐसा करके वो संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों को बेकार साबित करने की कोशिश करता है. अमेरिका के आगे संयुक्त राष्ट्र की बेबसी को डिकोड करने से पहले आपको अतीत में अमेरिका की ऐसी दादागीरी के उदाहरणों के बारे में भी जानना चाहिए.

 2003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए इराक पर हमला किया. अमेरिका ने सद्दाम हुसैन पर जनसंहार के हथियार रखने का आरोप लगाया गया जो बाद में झूठा साबित हुआ. अमेरिकी हमले में इराक़ के लाखों लोगों की मौत हुई. इराक अभी तक अमेरिका के इस हमले से उबर नहीं पाया है. इसी तरह 2011 में मुअम्मर गद्दाफी को हटाने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में नाटो ने हमला किया. गद्दाफी को तो हटा दिया गया लेकिन इसके बाद लीबिया अराजकता में डूब गया. वहां गृह युद्ध शुरू हो गया. ISIS ने कई शहरों पर कब्ज़ा कर लिया. 15 साल बाद भी लीबिया अराजकता से उबर नहीं पाया है.

यानी अपनी मनमर्ज़ी के आधार पर अमेरिका किसी देश को निशाना बनाता है. उसे लगता है कि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष उसकी बात नहीं मान रहा तो उसे सत्ता से हटा देना चाहिए. वेनेज़ुएला में भी यही हुआ है. अमेरिका लंबे समय से मादुरो का विरोध कर रहा था. अब उसने मादुरो को सत्ता से हटाने में कामयाबी हासिल की है. लेकिन मादुरो के बाद वेनेज़ुएला का क्या होगा, इसकी उसे कोई चिंता नहीं है. हो सकता है कि जो हाल इराक़ या लीबिया का हुआ, वहीं हाल वेनेज़ुएला का भी हो जाए.  वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले के बाद कई देशों ने इसका विरोध किया है.

संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक बना रहे ट्रंप?

रूस ने वेनेज़ुएला पर हमले को चिंताजनक बताया. ईरान ने अमेरिकी हमले को यूएन चार्टर का स्पष्ट उल्लंघन बताया. क्यूबा ने इसे आतंकवादी हमला कहा है. कोलंबिया ने अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने की याद दिलाई. वेनेजुएला पर हमले के बाद यूएन चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की याद दिलाई जा रही है. आपको भी इसके बारे में जानना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र चार्टर अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का आधार है. ये किसी भी देश पर सैन्य हमले या बल प्रयोग को सख्ती से नियंत्रित करता है.

अनुच्छेद 2 की धारा 4 बल प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है. इसमें कहा गया है कि सभी सदस्य देश किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ ताक़त की धमकी या प्रयोग से बचें. चार्टर में बल प्रयोग केवल 2 परिस्थितियों में वैध है. पहला है अपनी रक्षा के लिए यानी हमला होने पर किसी देश को अपनी रक्षा करने का अधिकार है और दूसरा है सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी. अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अधिकृत करे तो बल प्रयोग वैध है.

लेकिन वेनेजुएला के मामले में दोनों में से कोई भी शर्त लागू नहीं होती. न तो अमेरिका पर वेनेज़ुएला ने कोई हमला किया है. न ही सुरक्षा परिषद ने किसी प्रस्ताव के ज़रिए अमेरिकी हमलों को मंज़ूरी दी है. सोचिए, दुनिया को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के बारे में ज्ञान देने वाले अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की कोई परवाह नहीं है. जब उसे अपनी मर्ज़ी चलानी होती है तो वो किसी भी नियम या क़ानून को नहीं मानता. अमेरिकी हमले के बाद वेनेज़ुएला ने सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की है. लेकिन सबको पता है कि अमेरिका के पास वीटो नाम की ऐसी शक्ति है जिससे उसका कुछ नहीं होगा. इस हमले की निंदा भी नहीं की जा सकेगी.

जिस अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को लागू करने के नाम पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी, वो अब दम तोड़ रहा है. UN के निर्देशों को कथित शक्तिशाली देश बिल्कुल नहीं मानते. UN के होते हुए भी पिछले 4 साल से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है. गाज़ा को लेकर UN के कई प्रस्तावों को अनदेखा किया गया. और अब अमेरिका ने UN चार्टर की कोई परवाह किए बिना एक देश में तख्तापलट कर दिया.

ऐसे ऑपरेशन के ज़रिए अमेरिका UN के सिस्टम को पूरी तरह ख़त्म कर रहा है. जब उसे अपनी ही मर्ज़ी चलानी है तो फिर UN की क्या ज़रूरत है. जब तानाशाह बताकर वो किसी का भी तख्तापलट कर सकता है तो सुरक्षा परिषद की क्या भूमिका है. जब अमेरिका ख़ुद नियम बनाता है, और ख़ुद सज़ा देता है तो UN पर ताला क्यों नहीं लगा देना चाहिए.

मादुरो को गिरफ़्त में लेने के बाद वेनेज़ुएला पर अमेरिका का कब्जा होना तय माना जा रहा है. उन्होंने चेतावनी दी है कि मादुरो के साथ वफादारी निभाने वालों का अंजाम बहुत बुरा होगा. जल्द ही वेनेज़ुएला में अमेरिका समर्थित सरकार बनेगी. खुद ट्रंप ने अब से कुछ देर पहले ये बात कही भी है.

ये सरकार मादुरो की तरह अमेरिका के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अमेरिका के इशारे पर काम करेगी. इससे वेनेज़ुएला में ट्रंप का असली मक़सद पूरा हो जाएगा.  ट्रंप ने भले ही मादुरो पर नार्को-टेररिज़्म और तानाशाही का आरोप लगाकर उन्हें सत्ता से बाहर किया.

लेकिन कई विश्लेषकों का दावा है कि ट्रंप का असली मक़सद वेनेज़ुएला के तेल और खनिज पर कब्ज़ा है. वेनेजुएला के पास दुनिया में तेल का सबसे बड़ा भंडार है. उसके पास 303 अरब बैरल तेल है जो सऊदी अरब से भी ज़्यादा है.

अमेरिकी तेल कंपनियां 70 के दशक तक वेनेज़ुएला में बहुत सक्रिय थीं. लेकिन मादुरो के गुरु ह्यूगो शावेज के सत्ता में आने के बाद अमेरिकी तेल कंपनियों को बाहर जाना पड़ा. अब वेनेज़ुएला में अमेरिका समर्थित सरकार बनी तो तेल के इस भंडार तक अमेरिकी कंपनियों की पहुंच आसान हो जाएगी. ट्रंप ने आज अपने इस इरादे को जताया भी है.

इसी तरह ईरान में खामेनेई की सत्ता जाने से भी वहां के तेल भंडार का लाभ अमेरिका को मिलेगा. ईरान के पास दुनिया का चौथे सबसे बड़ा तेल भंडार है. साथ ही हॉर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण है, जहां से दुनिया का 20-30% तेल गुजरता है. इस तरह दुनिया के तेल व्यापार पर अमेरिका का एकछत्र राज हो जाएगा.