Iran-US Conflict: अमेरिका की एक बड़ी हथियार कंपनी लॉकहीड मार्टिन दावा करती है कि अमेरिकी रक्षा तकनीक दुनिया का मानक तय करती है यानी अमेरिकी हथियारों से बेहतर हथियार बन ही नहीं सकते. वो रक्षा तकनीक जो दुनिया में मानक तय करती है अगर अमेरिका के दुश्मन को मिल जाए और उसे युद्ध क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ इस्तेमाल करने की तैयारी कर ली जाए तो क्या होगा, इसकी कल्पना मात्र से अपने हथियारों पर गर्व करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का तनाव बढ़ सकता है और आज ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के एक दावे ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का तनाव बढ़ा भी दिया है. आखिर अमेरिका की कौनसी एक्सक्लूसिव हथियार तकनीक ईरान के हाथ लग गई है. इस तकनीक के हाथ लगने के ठीक 7 महीने बाद ही ईरान ने इस बात का खुलासा क्यों किया है और अमेरिका-इजरायल के साथ संभावित युद्ध में ये हथियार किस तरह अमेरिका के लिए भस्मासुर साबित हो सकते हैं.
अमेरिका के खिलाफ ईरान की तैयारी
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया ईरान के परमाणु ठिकानों पर अब भी अमेरिका द्वारा गिराए गए बिना फटे बम मौजूद हैं. यानी ईरान के पास वो अमेरिकी बम मौजूद हैं, जिनसे अमेरिका ने 12 दिन के इजरायल ईरान युद्ध के आखिरी चरण में ईरान के परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया था. अराघची ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी के प्रमुख रफाएल ग्रोसी को ये जानकारी देते हुए पूछा क्या ऐसे ठिकानों के निरीक्षण का कोई अंतरराष्ट्रीय नियम है. ग्रॉसी ने जवाब दिया, ऐसा कोई तय कानून या प्रोटोकॉल मौजूद नहीं है. जवाब में अराघची ने कहा कि जब तक सुरक्षा प्रोटोकॉल तय नहीं होता, निरीक्षण की इजाजत नहीं दी जाएगी. ये चर्चा ईरान के परमाणु केंद्रों की निगरानी के लिए हो रही थी, लेकिन निगरानी से इंकार करके ईरान ने एक तीर से दो शिकार किए. ईरान ने अपने परमाणु केंद्रों के साथ साथ उन अमेरिकी बमों और मिसाइलों तक दुनिया की पहुंच रोक दी, जो सबसे आधुनिक तकनीक वाले विध्वंसक हथियार हैं, लेकिन ईरान के इस खुलासे के बाद अमेरिकी और इजरायली विशेषज्ञों ने आशंका जाहिर की है. ईरान रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए इन हथियारों का क्लोन तैयार कर रहा है और इसमें चीन उसका मददगार हो सकता है. अमेरिका और इजरायल की इस चिंता को इस खुलासे की टाइमिंग और ईरान का नया नोटम और बढ़ा रहा है. कोई भी देश नोटम युद्ध की परिस्थिति या आसमान में किसी नए हथियार के परीक्षण के दौरान जारी करता है. ईरान ने देश के मध्य हिस्से के ऊपर अपना हवाई क्षेत्र अस्थायी रूप से बंद कर दिया है. मतलब एक तरफ अराघची ने बताया कि उनके पास अमेरिका के बिना फटे बम और मिसाइलें हैं. दूसरी तरफ फौरन किसी बड़े हथियार के परीक्षण की तैयारी कर ली. अब विशेषज्ञ इन दोनों खबरों को एक दूसरे से जुड़ा हुआ बता रहे हैं.
ईरान के हाथ लगी अमेरिका की ताकत?
अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के लिए आपरेशन मिडनाइट हैमर लॉन्च किया था, जिसके तहत 21–22 जून 2025 की रात को ईरान के नतांज फार्डो और इस्फहान परमाणु केंद्रों पर बमबारी की गई थी. अमेरिका ने इस हमले में मुख्य रूप से अपने स्टेल्थ B-2 बॉम्बर से GBU-57 बम गिराए थे और पनडुब्बियों से 30 से अधिक टोमाहॉक मिसाइलें दागी थीं. ईरान के विदेश मंत्री के दावे के मुताबिक अब उनके देश के पास अमेरिका GBU-57 बम और टॉकहॉक मिसाइलों में से कोई एक हथियार या फिर दोनों हो सकते हैं. GBU-57 दुनिया का सबसे ताक़तवर गैर-परमाणु बंकर-बस्टर बम है, यानी बिना न्यूक्लियर हुए भी ज़मीन के बहुत नीचे बने ठिकानों को तोड़ सकता है. इसका भारी वजन और बेहद मजबूत स्टील बॉडी इसे कंक्रीट और चट्टान को चीरते हुए अंदर तक घुसने की ताकत देती है. लगभग 14 टन के इस बम का भार एक अमेरिकी F-35 फाइटर जेट के बराबर होता है. यह बम पहले ज़मीन के अंदर घुसता है और फिर फटता है जिससे अंदरूनी ढांचा तबाह होता है. इसमें GPS और INS गाइडेंस होता है, यानी सैटेलाइट और अंदरूनी सेंसर मिलकर इसे बिल्कुल सही जगह तक पहुंचाते हैं. इसे सिर्फ B-2 स्टील्थ बॉम्बर जैसे रडार से बचने वाले विमान ले जा सकते हैं, ताकि भारी एयर-डिफेन्स के बावजूद लक्ष्य तक पहुंचा जा सके. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पहाड़ के अंदर बने परमाणु ठिकानों जैसे बेहद सुरक्षित लक्ष्यों के लिए खास तौर पर बनाया गया है. ईरान के पास अमेरिका का इतना घातक हथियार आ गया है । और ईरान उसे खोलकर उसकी तकनीक समझ रहा है और उसका क्लोन बनाने की कोशिश कर रहा है. अगर ये कोशिश कामयाब हो गई होगी. या ईरान ने GBU-57 से थोड़ी कम ताकत वाला बम भी तैयार कर लिया होगा. तो ये अमेरिका और इजरायल के लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है. वैसे खतरा सिर्फ GBU-57 बम का नहीं है. अमेरिका की सबसे घातक मिसाइल तकनीक भी ईरान के पास पहुंचने का शक जाहिर किया जा रहा है.
क्लोनिंग कर रहा ईरान?
टॉमहॉक मिसाइल को अमेरिका आमतौर पर युद्ध की शुरुआत में एयर-डिफेन्स, रडार और संचार ढांचे को निष्क्रिय करने के लिए इसका इस्तेमाल करता है. इस मिसाइल में बिना पूरे इलाके को नष्ट किए बहुत सटीक हमला करने की क्षमता होती है. क्या ईरान के लिए अमेरिकी हथियारों की जटिल तकनीक को समझना आसान है और दुनिया के विशेषज्ञ जिन हथियारों की क्लोनिंग की आशंका जाहिर कर रहे हैं. क्या वाकई ईरान ऐसा कर सकता है. तो GBU-57 जैसे बम की हूबहू क्लोनिंग ईरान नहीं कर सकता. क्योंकि इतना भारी बम गिराने वाला B-2 जैसा स्टील्थ बॉम्बर उसके पास नहीं है यानी अगर ये बम ईरान बना भी ले. तो भी उसे लॉन्च नहीं कर पाएगा, लेकिन GBU-57 बम के ढांचे से उसकी मज़बूत स्टील बॉडी और अंदर घुसकर फटने की टाइमिंग को आसानी से समझा जा सकता है. इस सीख से ईरान अपने मिसाइल वारहेड्स या छोटे बंकर-बस्टर बम ज्यादा असरदार बना सकता है यानी ईरान अपने बंकर बस्टर बम को काफी अपग्रेड कर सकता है, लेकिन टॉमहॉक मिसाइल का मामला बिल्कुल अलग है. ईरान के पास पहले से ही टॉमहॉक जैसी क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं. टॉमहॉक मिसाइल की रिवर्स इंजीनियरिंग से ईरान इसके गाइडेंस सिस्टम नीची उड़ान और एयर डिफेंस को जाम करने वाली तकनीक को समझ सकता है. इससे वह अपनी मिसाइलों को ज़्यादा सटीक, कम रडार में दिखने वाली और जाम-रोधी बना सकता है यानी और बेहतर मिसाइलें तैयार कर सकता है. अमेरिका को सबसे ज्यादा टेंशन इस बात की है अगर ईरान ने अमेरिका के इन हथियारों की तकनीक को समझने के लिए इसे चीन या रूस से साझा किया तो इनका हूबहू क्लोन भी बन सकता है क्योंकि रूस और चीन के पास ऐसी तकनीक हैं.
रूस और चीन के पास क्लोनिंग की ताकत
सोवियत संघ ने 1944 में अमेरिका के B-29 बॉम्बर की नकल से Tu‑4 बॉम्बर बनाया, जिसकी पहली उड़ान 1947 में हुई. इसे आज तक किसी सैन्य उपकरण का सबसे हूबहू क्लोन माना जाता है. इसके अलावा चीन ने रूस का Su‑27 फाइटर जेट लाइसेंस पर खरीदा बाद में उसे कॉपी करके J‑11 बना दिया. चीन दुनिया में कॉपी पेस्ट का सबसे बड़ा मास्टर है. चीन ने रूसी कैरियर फाइटर Su‑33 के डिज़ाइन से J‑15 विकसित किया ये दोनों घटनाएं चीन-रूस सैन्य रिश्तों में सबसे विवादित रही, जिसके बाद रूस ने चीन पर तकनीक के मामले में भरोसा करना बंद कर दिया. ईरान भी इससे पहले अमेरिकी ड्रोन क्लोन कर चुका है. ईरान ने 2011 में पकड़े गए अमेरिकी RQ‑170 ड्रोन से शाहिद 171 और शाहिद‑191 ड्रोन विकसित किए. इसके अलावा नॉर्थ कोरिया ने सोवियत स्कड-बी मिसाइल..जिसकी रेंज 300 km थी. उसे कॉपी करके ह्वासोंग-5 बनाई और इन्हें ईरान-पाकिस्तान को बेचा.चीन पर रूस के जेट इंजन को कॉपी करने का भी आरोप लगाया यानी क्लोनिंग की दुनिया में चीन सबसे ज्यादा बदनाम है, जिसके पास किसी हथियार पहुंचने का मतलब उसकी कॉपी होने की आशंका काफी ज्यादा बढ़ जाती है और इस बार भी ईरान के रास्ते अमेरिकी हथियार चीन के हाथ लगने की आशंका है
