Iran protest: खामेनेई बगावत की आग को बुझाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब हम बात उस आग की करने वाले हैं जो खलीफा के अगले कदम के बाद धधकने वाली है.. खामेनेई ने अब क्रांति की आवाज उठाने वालों को फांसी देना शुरू कर दिया है. कल 14 जनवरी 2026 को इस क्रांति के बीच पहली फांसी होने वाली है. ये ईरान की क्रांतिकारी अवाम को डराने की आखिरी कोशिश है, लेकिन सवाल ये कि क्या ये कदम खलीफा के तख्तापलट का आखिरी कदम साबित होगा?

इरफान सुलतानी को दीस जाएगी फांसी 

कल ईरान में 26 साल के इरफान सुलतानी को फांसी दी जाने वाली है. खलीफा की कट्टरपंथी फौज ने उसे 8 जनवरी को गिरफ्तार किया था और तीन दिन के अंदर उनपर आरोप तय कर के कल उन्हें सूली पर चढ़ा दिया जाएगा, लेकिन इरफान को जिस तरह फांसी की सजा दी जा रही है, उससे खलीफा के खिलाफ एक नई बगावत की शुरुआत हो सकती है. इरफान सुल्तानी को मोहरिब कानून के तहत ही फांसी दी जा रही है. उन्हें 8 तारीख को गिरफ्तार किया गया. उनके परिवार को ये तक नहीं बताया गया कि उसे किस एजेंसी ने गिरफ्तार किया. इसके बाद तीन दिन के अंदर सुनवाई पूरी कर के उन्हें 11 जनवरी को मौत की सजा सुना दी गई. दावा किया जा रहा है कि उन्हें न तो वकील दिया गया न ही सुनवाई के दौरान कुछ बोलने का मौका दिया गया. ट्रायल के बाद उन्हें परिवार से सिर्फ 10 मिनट के लिए मिलने दिया गया. परिवार को यह भी बताया गया कि सजा अंतिम है और तय समय पर दी जाएगी. सुल्तानी की बहन खुद मान्यता प्राप्त वकील हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें केस की फाइल देखने या अपने भाई की पैरवी करने की अनुमति तक नहीं दी गई.

 बीच चौराहे पर दे सकते हैं फांसी

दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि प्रदर्शनकारियों के सामने मिसाल पेश करने के लिए इरफान को बीच चौराहे पर क्रेन से लटकाकर फांसी की सजा दी जा सकती है. ईरान में इस तरह से फांसी देने का प्रावधान भी है. खलीफा को लग रहा है कि वो ऐसा कर के प्रदर्शनकारियों के अंदर खौफ पैदा कर देंगे, लेकिन माना जा रहा है कि जिस तरह से जल्दबाजी में इरफान को सजा सुनाई गई है. उससे ईरान की अवाम में खलीफा के खिलाफ क्रोध और बढ़ सकता है. ये कदम खामेनेई के लिए उलटा पड़ सकता है क्योंकि इतिहास गवाह रहा है कि ऐसी फांसियां जनता को डराने से ज्यादा और भड़काती हैं. 1970 के दशक में ईरान में शाह मोहम्मद रेजा पहलवी की तानाशाही चरम पर थी. 1978 में तानाशाही विरोधियों को दबाने के लिए शाह मोहम्मद रेजा पहलवी ने प्रदर्शन को कुचलने के लिए अपने सुरक्षाबलों को खुली छूट दे दी.  8 सितंबर 1978 को तेहरान के जलेह स्क्वार पर सुरक्षाबलों ने सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवाई.. इस दिन को ब्लैक फ्राइडे भी कहा जाता है. इस नरसंहार ने ईरान की अवाम को इतना भड़का दिया कि इसके 156 दिन बाद 11 फरवरी 1979 को शाह मोहम्मद रेजा पहलवी का तख्तापलट हो गया. 

Add Zee News as a Preferred Source

गलती दोहरा रहे खामेनेई? 

1979 में विरोधियों को मरवाना शाह के लिए तख्तापलट की सीढ़ी बना क्योंकि इस दमन ने जन क्रांति को जन्म दिया. आज एक बार फिर खामेनेई वही गलती दोहरा रहे हैं. 2022 से अब तक 1,425 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है. मौजूदा प्रदर्शन में गिरफ्तार 10 हजार लोगों पर फांसी की तलवार लटक रही है. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि इरफान सुल्तानी को फांसी देना खामेनेई की सबसे बड़ी भूल साबित होने वाली है..