Iran Protest: एक तरफ मुस्लिम देश ईरान में प्रदर्शनकारी चुन-चुनकर मस्जिदों में आग लगा रहे हैं और दूसरी ओर हमारे देश में ऐसे वैचारिक कट्टरपंथी हैं, जो दुनिया के तमाम बड़े मुद्दों को छोड़कर हिंदुत्व के खिलाफ एजेंडा चला रहे हैं. ईरान में मौजूदा सरकार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन, और आम ईरानी के आक्रोश की तस्वीरें पूरी दुनिया देख रही है. प्रदर्शनकारी सरकारी इमारतों को आग लगा रहे हैं. सरकारी संपत्ति को स्वाहा कर अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं. अब प्रदर्शनकारियों के आक्रोश का शिकार मस्जिदें भी हो रही हैं. वो मस्जिद जहां प्रदर्शनकारी ही इबादत करने जाते थे. जो इस्लामिक धर्मस्थल हैं. जो मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र जगह है. उन मस्जिदों को जलाया जा रहा है. और वो भी कोई एक मस्जिद नहीं नहीं. शहर-शहर ऐसी घटना हो रही है. 

मस्जिदों में आग लगाई

ईरान इस्लामिक देश है. खामेनेई के मुल्क में करीब 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है. फिर ऐसे देश में मस्जिद में आग क्यों लगाई जा रही है. क्यों प्रदर्शनकारी अपने ही आस्था स्थल को अग्निज्वाला में फूंक रहे हैं. कुरान में कहा गया है कि अल्लाह ने मस्जिदों, गिरजाघरों और अन्य इबादत स्थलों की रक्षा का आदेश दिया है. पैगंबर ने युद्ध में भी इबादतगाहों को नष्ट करने से मना किया है, जिसे कुरान में निषिद्ध किया गया, ईरान में वही हो रहा है. ईरान इस्लामिक वर्ल्ड का खलीफा बनना चाहता था. उस खलीफा के देश में मुसलमान अब तक 30 से ज्यादा मस्जिद फूंक चुके हैं. इस आंदोलन में अब तक 30 से ज्यादा मस्जिदें जलाई जा चुकी हैं. इस्लामिक आक्रांताओं ने भारत में हजारों मंदिरों को तोड़ा, मूर्तियों को खंडित किया, उसकी वजह धार्मिक थी. क्योंकि इस्लामिक अक्रांताओं के लिए हिंदू विधर्मी थे, काफिर थे. लेकिन ईरान में तो मुसलमान ही मस्जिद फूंक रहे हैं. इसलिए वजह धार्मिक तो नहीं हो सकती. फिर वजह क्या है. कट्टरपंथियों के मौलाना शासन से नाराज ईरानी प्रदर्शनकारियों ने इन प्रसिद्ध मस्जिदों को गुस्से की आग में राख कर दिया है. इनमें सबसे प्रमुख मस्जिद है अल रसूल मस्जिद. इस मस्जिद को जलता देख प्रदर्शनकारी ताली बजा रहे हैं, ड्रम बजा रहे हैं और आजादी का नारा लगा रहे हैं. 

अल-रसूल मस्जिद को किया आग के हवाले 

अल-रसूल मस्जिद शिया इस्लाम की बड़ी मस्जिद है. इस मस्जिद में अयातुल्लाह अली खामेनेई ने कभी नमाज पढ़ाई थी. इस मस्जिद को ईरान के इस्लामी शासन का प्रतीक माना जाता था. ये आक्रोश की पराकाष्ठा है. ये नाराजगी का शिखर है. ऐसा नहीं होता तो जो मस्जिद इस्लामिक शासन का प्रतीक है उसे आग के हवाले क्यों किया जाता? वो मस्जिद जहां खामेनेई ने कभी नमाज पढ़ाई थी, उसे जला दिया गया. ये गुस्सा, ये आक्रोश इस्लाम के खिलाफ नहीं है. ये गुस्सा उस कट्टरपंथी इस्लामिक तंत्र के खिलाफ है जिसे खामनेई और उनकी मौलाना मंडली ने बनाया है. ये गुस्सा पवित्र इस्लाम के उस वीभत्स रूप के खिलाफ है जिसे खामनेई और उनकी मौलाना मंडली ने ईरान के लोगों पर थोपा है. ये गुस्सा उस कथित इस्लामिक शासन के खिलाफ है जिसने महिलाओं को बुर्के और हिजाब में कैद कर दिया. जिसने ईरान के लोगों को कट्टरपंथ की पिछड़ी सोच में बंद कर दिया. कुरान के सूरह अल हज में कहा गया है कि जो लोग कुफ्र करते हैं, उनके लिए आग के कपड़े काटे जाएंगे. उनके सिर पर उबलता पानी डाला जाएगा, जो उनके पेट और चमड़ी को जला देगा. हदीस में कहा गया है कि जहन्नुम में सबसे हल्की सजा वाला व्यक्ति वह है जिसके पैरों के नीचे दो कोयले रखे जाते हैं, जिससे उसका दिमाग उबलने लगता है. इस्लाम में, आग में जलाने को जहन्नुम यानी नरक की सबसे भयानक सजा माना जाता है और यहां तो मस्जिदों में आग लगाई जा रही है. यानी अब खामेनेई और उनकी मौलाना मंडली के खिलाफ ईरान के आम लोगों के आक्रोश को समझा जा सकता है. 

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मस्जिदों को क्यों फूंक रहे प्रदर्शनकारी? 

मस्जिदों में आग लगाकर प्रदर्शनकारी ये बताना चाहते हैं कि मौलाना मंडली ने ईरान में कुफ्र यानी सबसे घृणित अपराध  किया है. उन्हें जहन्नुम की सबसे कठोर सजा दी जानी चाहिए. प्रदर्शनकारियों ने तेहरान के फलाह जिले की अबूजर मस्जिद को भी गुस्से की आग में स्वाहा कर दिया है. ये मस्जिद  पैगंबर मुहम्मद के साथी अबू धर अल-गिफारी के नाम पर बनाई गई थी. अबू धर अल-गिफारी शिया परंपरा में न्याय और सादगी के प्रतीक है. शायद इस मस्जिद को आग लगाकर प्रदर्शनकारी ये बताना चाहते हैं कि हमने खामेनेई के कट्टरपंथी शासन के खिलाफ न्याय किया है. 1981 में इसी मस्जिद में अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या का असफल प्रयास हुआ था. यानी ये मस्जिद खामेनेई के इस्लामिक शासन से जुड़ी हुई थी. 

मौलाना मंडली को संदेश दे रहे कट्टरपंथी 

तेहरान के शेमिरान की इमामज़ादे सालेह मस्जिद को भी प्रदर्शनकारियों ने नुकसान पहुंचाया है. ये मस्जिद इमामज़ादे सालेह की कब्रस्थल है, जो सातवें शिया इमाम मुसा अल-काज़िम के पुत्र थे. यह तेहरान के सबसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में शामिल था. खामेनेई के इस्लामिक शासन से जुड़े मौलानाओं का इस मस्जिद से बहुत लगाव था. प्रदर्शनकारी हर उस मस्जिद को निशाना बना रहे हैं जो खामेनेई और उनकी मौलाना मंडली से जुड़ी है. प्रदर्शनकारियों की नजर में ईरान में मौलाना मंडली से जुड़े मस्जिदे धर्म का नहीं कट्टरपंथ का प्रतीक बन गई थी. प्रदर्शनकारी मस्जिदों में आग लगाकर कट्टरपंथी मौलाना मंडली को संदेश दे रहे हैं की तुम्हारा डेथ वारंट निकल चुका है. प्रदर्शनकारी जैसे कह रहे हैं कि आज तुम्हारे कट्टरपंथ की निशानी को आग के हवाले किया जा रहा है. अगला नंबर तुम्हारा होगा. समझिए ये मजहब के खिलाफ नहीं मजहब के उस कट्टरपंथी स्वरूप के खिलाफ विद्रोह है जिसे खामेनेई और उनकी मौलाना मंडली ने तैयार किया था. जिसे ईरान के आम लोग पिछले 46 साल से झेल रहे थे.