
US-Iran Conflict: इस समय दुनिया के बड़े-बड़े कूटनीतिज्ञ ट्रंप को लेकर अगर किसी को सुझाव दे रहे हैं तो यही कह रहे हैं, कि आप किसी पर भी भरोसा कर सकते हैं, लेकिन ट्रंप पर नहीं कर सकते. ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति पर भरोसा कर लिया था. उन्हें भी लगा था कि अब उनके ऊपर से अमेरिकी हमले का खतरा टल गया है, लेकिन ट्रंप ने अचानक फिर से यूटर्न ले लिया है. उनकी तैयारी ऐसी लग रही है, जैसे ईरान में खलीफा के खिलाफ अमेरिका 48 घंटे में युद्ध छेड़ देगा. एक मीडिया इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा है,’ हमें उम्मीद है कि अब ईरान के खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. हमने जो कहा था ईरान ने उसका पालन किया है. ईरान ने 800 प्रदर्शनकारियों की फांसी को टाल दिया है तो हमला करने की कोई जरूरत नहीं नजर आती.’
हमले का फैसला पलट देगा अमेरिका?
14 जनवरी को ट्रंप ने कहा था कि ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्याएं रुक गई हैं तो हमला टाल दिया गया है. 21 जनवरी को ट्रंप ने दावोस में दोहराया कि अमेरिका को अब ईरान पर हमला करने की जरूरत नहीं नजर आती लेकिन चौबीस घंटों के अंदर यानी 22 जनवरी को ईरान को लेकर अमेरिकी सेना की हलचल बढ़ जाती है और अमेरिका मिडिल ईस्ट में सैन्य तैनाती में इजाफा करने लगता है. खबरों के मुताबिक ट्रंप के आदेश पर डेल्टा फोर्स के 20 हजार जवान UAE, जॉर्डन और कतर भेजे जा रहे हैं. ये सभी ईरान के पड़ोसी देश हैं. इसी वजह से आशंका जताई जा रही है कि खामेनेई के लिए भी ट्रंप ने वेनेजुएला जैसा प्लान तैयार कर लिया है. यानी जिस तरह वेनेजुएला से मादुरो को किडनैप किया गया था ठीक उसी तर्ज पर ट्रंप डेल्टा फोर्स के जरिए खामेनेई या उनके वरिष्ठ सलाहकारों को किडनैप कर सकते हैं. इस आशंका से ईरान में किस तरह की खलबली मची है. अमेरिका के राजनीतिक हलकों में इस नीति को Defence Through Denial कहा जाता है यानी पहले हमले की संभावनाओं से इंकार करते रहो और जब दुश्मन तैयार ना हो तब उसपर अचानक हमला कर दो. 70 के दशक में रिचर्ड निक्सन ने कंबोडिया और लाओस का शांतिपूर्ण समाधान करने की बात कई बार कही थी लेकिन दोनों देशों में बमबारी का ऑर्डर दे दिया था. 1999 में बिल क्लिंटन ने तत्कालीन यूगोस्लाविया में अमेरिकी फौज भेजने से इनकार किया था, लेकिन जब नाटो ने बमबारी की थी तो उसमें अमेरिकी फाइटर जेट भी शामिल थे. इसी तरह वर्ष 2011 में बराक ओबामा ने कहा था कि लीबिया में अमेरिका की कार्रवाई बहुत सीमित स्तर की होगी, लेकिन ओबामा के ऑर्डर पर ही लीबिया में बड़ा सैन्य अभियान चलाया गया जिसने गद्दाफी का तख्तापलट कर दिया था.
ईरान में जंग की तैयारी
इतिहास के ये पन्ने बताते हैं कि ट्रंप भी अमेरिका की पुरानी राजनीतिक परंपरा को ही निभा रहे हैं. यानी पहले हमले से इंकार करो और फिर बारूदी हमला कर दो. ट्रंप के बयानों और अमेरिकी इतिहास के आकलन को देखकर ईरान भी सक्रिय हो चुका है और अगले 48 घंटों के लिए ईरान की सरकार से लेकर सैन्य सिस्टम सब अलर्ट हो गया है. अमेरिकी कार्रवाई की आशंका के बीच ईरान में क्या चल रहा है. ये भी आपको बेहद गौर से देखना और समझना चाहिए. ईरान की सेना को फिंगर ऑन ट्रिगर मोड में जाने के लिए कह दिया गया है. यानी सेना को किसी भी वक्त टकराव के लिए तैयार रहने का ऑर्डर दिया गया है. सेना के वरिष्ठ अफसरों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं और उन्हें 48 घंटों के अंदर अपनी यूनिट से जुड़ने के लिए कहा गया है. 14 जनवरी से ही ईरान की एयरफोर्स भी हाई अलर्ट पर है. ईरान की सेना ने बड़ी तादाद में अटैक ड्रोंस बनाने का एक ऑर्डर भी दे दिया है. अमेरिकी हमले की आशंका के बीच खामेनेई की सरकार ने एक सैन्य कदम भी उठाया है. ईरान ने इराक और सीरिया के बॉर्डर पर स्थित कुर्द लड़ाकों पर मिसाइल अटैक किया है. इन कुर्द लड़ाकों को लंबे वक्त से अमेरिका का समर्थन हासिल है और माना जा रहा है कि इस हमले के जरिए ईरान ने संदेश दिया है संदेश ये कि अमेरिका ने हमला किया तो मिडिल ईस्ट में मौजूद उसके सहयोगियों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. ईरान को लेकर अगले 48 घंटों के अलर्ट की वजह सिर्फ डॉनल्ड ट्रंप की कार्रवाई नहीं है. बल्कि इस अलर्ट के पीछे ईरान का पारंपरिक प्रतिद्वंदी इजरायल है, जो पिछले दो सालों में दो बार ईरान से टकरा चुका है.
इजरायल क्यों पड़ा ईरान के पीछे
इजरायल ने एक बार फिर ईरान विरोधी कार्रवाई को अंजाम देना शुरू कर दिया है. खलीफा जानते हैं कि ट्रंप ज्यादातर मौके पर जुबानी बम फोड़ते हैं, लेकिन इजरायल सचमुच बम गिरा देता है. इजरायली वायुसेना ने दक्षिणी लेबनान में ईरान समर्थित हिज्बुल्ला पर हमले तेज कर दिए हैं. 5 जनवरी से लेकर 20 जनवरी तक इजरायली फौज सिर्फ बारूदी सुरंगों और सुरंगों को तबाह कर रही थी लेकिन उसके बाद इजरायल ने दोबारा हिज्बुल्ला की लीडरशिप यानी उसके आतंकी कमांडरों को मारना शुरू कर दिया है. 21 और 22 जनवरी के दरमियान किए गए हमलों में IRGC और हिज्बुल्ला के बीच की कड़ी अली सालामेह को इजरायल ने मार गिराया है. इजरायली हमले के बाद भले ही ये दावा किया जा रहा हो कि इजरायल का निशाना हिज्बुल्ला का वरिष्ठ कमांडर था लेकिन ये इजरायल की सोची-समझी रणनीति है. इस रणनीति का मकसद है ईरान को उकसाना और उसे युद्ध के मैदान में खींच लाना. इजरायली सेना की इस रणनीति को माबाम कहा जाता है. इस रणनीति के तहत इजरायली फौज सीमित दायरे में लगातार छोटे हमले करती है ताकि दुश्मन पलटवार करने के लिए मजबूर हो जाए. अप्रैल 2024 में इजरायल ने हिज्बुल्ला के ठिकानों पर बमबारी की थी जिसके बाद ईरान ने इजरायल पर 300 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन दागे थे. साल 2025 में मई और जून के महीने में इजरायल ने हिज्बुल्ला आतंकियों के ठिकानों पर मिसाइले दागी थीं. इस स्ट्राइक में 23 महिलाएं और बच्चे भी मारे गए थे. इजरायल को सैन्य कार्रवाई का जवाब देने के लिए ईरान मैदान में उतरा और 12 दिनों तक इजरायल और ईरान का युद्ध चला. एक बार फिर इजरायल ने हमला किया है. एक बार फिर टारगेट ईरान समर्थित हिज्बुल्ला है. इन तारों को जोड़कर देखा जाए तो लगता है कि इस बार इजरायल ही ईरान को जंग के मैदान में उतरने पर मजबूर करेगा और इस मौके का फायदा उठाकर ईरान पर अमेरिका हमला करेगा. पिछली बार अमेरिकी फाइटर जेट्स ने ईरान पर सीधा अटैक किया था लेकिन इस बार ट्रंप सीधे हमला करने की बजाय इजरायल की मदद करने के बहाने से खामेनेई को निशाना बनाएंगे.
