DNA Analysis: लंबी बीमारी के बाद आज बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का निधन हो गया. ये बांग्लादेश की राजनीति में एक युग का अंत है. लंबे समय तक बांग्लादेश की राजनीति 2 महिलाओं यानी ख़ालिदा ज़िया और शेख़ हसीना के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है. बांग्लादेश की राजनीति में इसे बैटल ऑफ बेगम का नाम दिया गया था. लेकिन इस बार के चुनाव में न तो ख़ालिदा ज़िया रहेंगी, न ही शेख़ हसीना. बेगम ख़ालिदा ज़िया का निधन ऐसे समय में हुआ है जब बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल अपने चरम पर है. 12 फरवरी को बांग्लादेश में चुनाव होने वाले हैं. उससे पहले कट्टरपंथी नेता उस्मान हादी की हत्या के बाद वहां अराजकता के हालात हैं. बांग्लादेश के कट्टरपंथी देश में अस्थिरता पैदा करना चाहते हैं. पाकिस्तान के इशारे पर वहां भारत विरोधी गतिविधियां तेज़ हो गई हैं. हिंदुओं और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ गई है. 

बीएनपी को फायदा  
पाकिस्तान इस हालात का लाभ उठाकर वहां जमात की सरकार बनाने में जुटा हुआ है. ऐसे माहौल में ख़ालिदा ज़िया के निधन से वहां BNP के प्रति राजनीतिक सहानुभूति की लहर जरूर पैदा होगी. इसका असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ेगा. अगर ख़ालिदा के प्रति सहानुभूति लहर के आधार पर लोगों ने मतदान किया तो जमात को सबसे बड़ा झटका लगेगा. मौजूदा समय में जमात को BNP का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बताया जा रहा है. लेकिन BNP को सहानुभूति वोट मिला तो उसकी जीत तय है.  आपको ख़ालिदा ज़िया के निधन से पहले के घटनाक्रम पर भी ध्यान देना चाहिए. ख़ालिदा ज़िया के निधन से केवल 4 दिन पहले उनके बेटे और राजनीतिक उत्तराधिकारी तारिक़ रहमान बांग्लादेश लौटे हैं. 17 साल बाद उनकी बांग्लादेश वापसी हुई है. तारिक़ रहमान के स्वागत में ढाका की सड़कों पर लाखों लोगों की भीड़ जुटी. उनकी रैली में लोगों ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया. इससे BNP की ज़मीनी ताक़त और जनसमर्थन का साफ़ तौर पर संकेत मिलता है. तारिक़ रहमान की वापसी ने संकेत दे दिया था कि इस बार BNP सत्ता की रेस में सबसे आगे है. 

भारत के हित के लिए बेहतर पार्टी 
अब चुनाव से लगभग डेढ़ महीने पहले ख़ालिदा ज़िया का निधन BNP के पक्ष में लोगों को एकजुट करने का काम करेगा. इसकी वजह ये है कि ख़ालिदा ज़िया को बांग्लादेश की राजनीति में पीड़ित के रूप में देखा जाता था. वो लंबे समय तक जेल में रहीं. उनके निधन से BNP के समर्थक भावनात्मक रूप से एकजुट हो सकते हैं. यहां आपको ये भी जानना चाहिए कि बांग्लादेश में 2 ही पार्टियां कैडर आधारित हैं. एक अवामी लीग और दूसरी BNP. अवामी लीग चुनाव से बाहर है जबकि जमात-ए-इस्लामी और उसकी सहयोगी NCP कैडर आधारित पार्टी नहीं हैं. इसका लाभ भी BNP को मिल सकता है. ये सच है कि भारत के साथ BNP के संबंध अच्छे नहीं रहे हैं. लेकिन ये भी सच है कि जमात-ए-इस्लामी की तुलना में BNP भारत के हितों के लिए बेहतर पार्टी है. भारत के लिए असली ख़तरा जमात-ए-इस्लामी है क्योंकि जमात पाकिस्तानी ख़ुफिया एजेंसी ISI के इशारे पर काम करती है. जमात की कट्टर विचारधारा और पाकिस्तान से पुराने संबंध उसे भारत के लिए ख़तरनाक बनाते हैं. यहां आपको दोनों पार्टियों की विचारधारा में अंतर के बारे में भी जानना चाहिए. BNP पाकिस्तान के साथ संबंध तो चाहती है लेकिन वो 1971 की कड़वाहट को भी नहीं भूलती है. दूसरी तरफ़ जमात ने 1971 के युद्ध में खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था और आज भी धर्म के आधार पर पाकिस्तान की समर्थक है. BNP धर्म आधारित राजनीति का विरोध करती है. वहीं जमात की पूरी राजनीति ही कट्टरता पर आधारित है. BNP की राजनीति भारत विरोधी नहीं है लेकिन जमात पूरी तरह से भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक है.

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शेख हसीना
तारिक़ रहमान ने भी मुख्यधारा की राजनीति में अपनी वापसी के बाद से किसी एक देश के पक्ष में नहीं झुकने के संकेत दिए हैं. उन्होंने बांग्लादेश फर्स्ट की राजनीति शुरू की है. इसका मतलब है कि वो भारत और पाकिस्तान- दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहते हैं. यहां आपको ये भी जानना चाहिए कि शेख़ हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद पाकिस्तान मौक़े का भरपूर फायदा उठाने की फिराक में है. पिछले डेढ़ साल के दौरान पाकिस्तान ने बांग्लादेश के साथ संबंधों को मज़बूत बनाया. मोहम्मद यूनुस और शहबाज़ शरीफ के बीच 2 बार मुलाक़ात हुई. 15 साल बाद दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत हुई. 13 साल बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने बांग्लादेश की यात्रा की. 50 साल बाद पहली बार पाकिस्तानी कार्गो जहाज बांग्लादेश के बंदरगाह पर पहुंचा. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 27% की वृद्धि दर्ज की गई. अब पाकिस्तान का अगला क़दम बांग्लादेश के चुनाव में जमात की जीत को सुनिश्चित करना था. उस्मान हादी की हत्या के ज़रिए वो बांग्लादेश में भारत विरोधी और जमात समर्थक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन तारिक रहमान की वापसी और ख़ालिदा ज़िया के निधन से उसे ज़रूर झटका लगा होगा.

चुनावी नतीजे
यहां आपको ये भी जानना चाहिए कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में कभी भी मज़बूत पार्टी नहीं रही है. जमात का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1991 के चुनाव में था जब उसने 300 में से 18 सीटें जीती थीं. 2001 के चुनाव में जमात को सिर्फ 17 सीटें मिलीं. ये उसका दूसरा सबसे अच्छा प्रदर्शन था. 2008 के चुनाव में तो उसे सिर्फ 2 सीट मिली. इसके बाद जमात चुनाव से दूर भागती रही. पिछले डेढ़ साल में यूनुस और पाकिस्तान की मेहरबानी से जमात ने ख़ुद को मज़बूत तो किया है. लेकिन जमात की पाकिस्तान परस्ती से बांग्लादेश की अवाम का एक बड़ा हिस्सा नाराज़गी भी ज़ाहिर करता है. 

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