
America To Acquire Greenland: कश्मीर में आतंक की बंदूकें खामोश हो रही हैं लेकिन कश्मीर से हजारों मील दूर अमेरिका और NATO के बीच बंदूकें तानने का सिलसिला शुरु हो गया है. आज जो हालात पैदा हुए हैं उन्हें देखकर कहा जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को ईरान या चीन से लड़ने से पहले NATO से दो-दो हाथ करने पड़ सकते हैं. ट्रंप और नाटो के बीच तलवारें क्यों खिंची है ये समझने के लिए आपको NATO के सदस्यों का एक बड़ा बयान बेहद गौर से समझना चाहिए.
ट्रंप विरोधी बयान जारी
NATO के 6 सदस्य देशों ने एक ट्रंप विरोधी बयान जारी किया है. इन देशों ने कहा है कि ग्रीनलैंड को कब्जाने वाली ट्रंप की नीति का वो विरोध करेंगे और ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता के लिए ठीक उसी तरह लड़ेंगे जिस तरह वो किसी भी देश की संप्रुभता के लिए लड़ते रहे हैं. जिन देशों ने ये बयान जारी किया है उनमें फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, पोलैंड, स्पेन और डेनमार्क शामिल हैं. यानी नाटो के तीन बड़े सदस्य देश इस बयान का समर्थन कर रहे हैं. अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने सात बार ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे से जुड़ी बातें कही हैं. इन सभी बयानों को लेकर ग्रीनलैंड की सरकार खामोश रही थी लेकिन जब NATO से समर्थन का इशारा मिला तो ग्रीनलैंड भी खुलकर सामने आया और ग्रीनलैंड की सरकार ने साफ कह दिया कि ट्रंप की दादागीरी को वो कबूल नहीं करने वाले हैं. ट्रंप को ग्रीनलैंड जैसे छोटे से इलाके ने किन शब्दों में चैलेंज दिया है. ये आपको भी ध्यान से सुनना और समझना चाहिए.
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ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप को मिलेगा सपोर्ट?
ग्रीनलैंड से सैन्य तैयारियों का दावा और NATO से लड़ाई करने का बयान. ये दोनों घटनाएं बताती हैं कि कम से कम ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप को यूरोपीय मित्रों यानी NATO से समर्थन नहीं मिलने वाला है. यहां आपको जानना चाहिए कि ट्रंप पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं जिनकी नजर बर्फ से ढके धरती के इस हिस्से पर पड़ी है. ट्रंप से पहले हैरी ट्रूमैन जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति भी ग्रीनलैंड को खरीदने का ऑफर दे चुके हैं. फर्क इतना है कि ट्रंप सामरिक शक्ति के जरिए ग्रीनलैंड को कब्जाने की धमकी दे रहे हैं. आखिर सालों से अमेरिका ग्रीनलैंड के पीछे क्यों पड़ा है. इस सवाल का जवाब भी हम आपको देंगे लेकिन उससे पहले आपको ये समझना चाहिए कि ग्रीनलैंड के मुद्दे को सामरिक हलकों में SUICIDE OF NATO क्यों कहा जाता है. पिछले 300 सालों से ग्रीनलैंड, डेनमार्क का हिस्सा है. यानी ये डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है. डेनमार्क NATO का सदस्य है और NATO के आर्टिकल 5 के तहत नाटो के किसी भी सदस्य पर हमला पूरे नाटो गुट पर हमला माना जाता है. अगर ट्रंप ग्रीनलैंड पर हमला करते हैं तो इससे NATO में दोफाड़ हो जाएगा और NATO का वजूद खत्म हो जाएगा. इसी वजह से ग्रीनलैंड पर अमेरिका और NATO के आशंकित टकराव को SUICIDE OF NATO कहा जाता है. नाटो जैसे अहम सहयोगी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप का विरोध कर रहे हैं. इसके बावजूद ट्रंप अपनी जिद पर जस के तस अड़े हैं. इसकी वजह है ग्रीनलैंड में छिपे वो हित जिनपर ट्रंप कब्जा करना चाहते हैं.
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ग्रीनलैंड पर कब्जा कर पाएंगे ट्रंप?
ग्रीनलैंड में अमेरिका के सामरिक और आर्थिक हित छिपे हैं. ट्रंप चाहते हैं कि ग्रीनलैंड में अमेरिकी फौज की तैनाती हो जाए. ट्रंप के आर्थिक हित ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनरल्स के भंडारों से जुड़े हैं जिसकी अमेरिका को जरूरत है. ग्रीनलैंड में सैन्य तैनाती के जरिए ट्रंप को मध्य एशिया यानी रूस पर दबाव बढ़ाने में मदद मिलेगी तो ग्रीनलैंड के महत्वपूर्ण खनिजों पर कब्जा होने से अमेरिका की चीन के ऊपर निर्भरता कम हो जाएगी. ये तथ्य बताते हैं कि ग्रीनलैंड पर कब्जा करके ट्रंप 1 तीर से 2 शिकार करना चाहते हैं. ट्रंप का मकसद ग्रीनलैंड को कब्जाना है, लेकिन इस मुद्दे पर ट्रंप अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं. NATO के बड़े सदस्य ग्रीनलैंड पर लड़ने का दावा कर रहे हैं तो अमेरिका के आम नागरिक भी ट्रंप के प्लान से सहमत नहीं हैं. हाल ही के सर्वे में सामने आया है कि सिर्फ 19 प्रतिशत अमेरिकी चाहते हैं कि ग्रीनलैंड पर उनके देश का कब्जा हो जबकि 49 प्रतिशत इस कब्जे वाले प्लान से असहमत हैं. ग्रीनलैंड के मुद्दे पर सैन्य कार्रवाई पर सिर्फ 7 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक सहमत हैं. तकरीबन 72 प्रतिशत अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ हैं. ट्रंप के समर्थकों की बात करें तो यहां भी ट्रंप को सेटबैक ही लगा है. 56 प्रतिशत रिपब्लिकन समर्थक ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात से सहमत नहीं हैं. सिर्फ घर के बाहर से ही नहीं बल्कि घर के अंदर भी ट्रंप को विरोध का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन ट्रंप के मन में जो आता है वो उसको पूरा करने के लिए हर पैंतरा आजमाते हैं. इसी वजह से कहा जा रहा है ग्रीनलैंड को लेकर भी ट्रंप कुछ ना कुछ पैंतरेबाजी जरूर करेंगे लेकिन ऐसा करने से पहले ट्रंप को ग्रीनलैंड का इतिहास जरूर देख लेना चाहिएय ये वो इतिहास है जो बताता है कि कोई भी आक्रांता बर्फ से ढके इस क्षेत्र पर कब्जा नहीं कर पाया है.
ग्रीनलैंड का इतिहास
13वीं सदी में डेनमार्क के पड़ोसी नॉर्वे ने ग्रीनलैंड को अपना क्षेत्र करार दिया था लेकिन नॉर्वे को कब्जा नहीं मिल पाया. वर्ष 1931 में नॉर्वे ने ग्रीनलैंड के एक द्वीप पर कब्जा कर लिया था लेकिन 2 साल बाद यानी 1933 में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने इस कब्जे को अवैध करार दे दिया था. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाजी जर्मनी ने ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे बना लिए थे लेकिन साल 1944 में हिटलर की फौज को यहां से खदेड़ दिया गया था. कनाडा ने भी ग्रीनलैंड के एक हिस्से पर दावा जताया था लेकिन वर्ष 2022 में कनाडा को ये दावा वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था. इतिहास के पन्ने भी बताते हैं कि बर्फ से ढके इस क्षेत्र की आजादी को कभी कोई छीन नहीं पाया. अगर ट्रंप ये इतिहास पढ़ लेंगे तो शायद वो भी ग्रीनलैंड पर कब्जे पर अपना मिशन या यूं कहें कि अपनी जिद को पीछे छोड़ देंगे.
