Iran-US Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच टकराव का दौर जारी है. अमेरिका ने ईरान को घेर रखा है और किसी भी वक़्त हमला करने के लिए वो तैयार है. ईरान भी अमेरिका की शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन इस टकराव के बावजूद अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर आने वाले हैं. भारतीय समय के मुताबिक कल सुबह 11.30 बजे ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत होगी. लगभग 14 घंटे के बाद अमेरिका और ईरान वार्ता की शुरुआत करेंगे. पूरी दुनिया की नजर इस पर लगी है क्योंकि इसी से तय होगा कि दुनिया में शांति आएगी या युद्ध बढ़ेगा. बातचीत को लेकर असमंजस की स्थिति के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि दोनों देश वार्ता करेंगे. अराघची के मुताबिक अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता शुक्रवार सुबह 10 बजे मस्कट में होगी. अराघची ने ये भी कहा कि सभी जरूरी इंतजाम करने के लिए मैं अपने ओमान के भाइयों का आभारी हूं, लेकिन इस बातचीत से पहले ही धमकियों का दौर भी शुरू हो गया है. ट्रंप ने ईरान के सुप्रीम लीडर को धमकाया है. 

बातचीत होगी या जंग 

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक अमेरिका की तरफ से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर बातचीत में शामिल होंगे जबकि ईरान का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री अब्बास अराघची करेंगे. यानी ट्रंप ने अपने विश्वसनीय स्टीव विटकॉफ के साथ अपने दामाद जेरेड कुशनर को भी टीम में रखा है. हाल के दिनों में ट्रंप के दामाद ही दुनिया में ट्रंप की कूटनीति को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं. बातचीत के लिए दोनों देश भले ही राजी हो गए हैं लेकिन उससे पहले वार्ता की जगह से लेकर विषय तक- कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच विवाद हुआ. अमेरिका के विदेश मंत्री का स्पष्ट रूप से मानना है कि ईरान से बातचीत को लेकर उन्हें कोई उम्मीद नहीं है. वैसे भी बातचीत के विषय को लेकर पहले ही टकराव दिख रहा है. मस्कट में होने वाली बातचीत को अमेरिका व्यापक बनाने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका चाहता है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को भी जोड़ा जाए. साथ ही हिज़्बुल्लाह और हमास जैसे प्रॉक्सी संगठनों को ईरान के समर्थन और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे भी शामिल हों, लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि बातचीत केवल परमाणु मुद्दे और अमेरिकी प्रतिबंधों तक ही सीमित रहेगी. शुरुआत में बातचीत तुर्किए के शहर इस्तांबुल मे होनी थी. इसमें मिडिल ईस्ट के कुछ देश भी ऑब्ज़र्वर के रूप में शामिल होते. लेकिन ईरान इसके लिए तैयार नहीं हुआ. तुर्किए NATO का सदस्य है, जिसकी वजह से ईरान को लगता है कि वो अमेरिका के क़रीब है. साथ ही तुर्किए मुस्लिम देशों की राजनीति में ईरान का विरोधी भी माना जाता है. इसी वजह से ईरान ने ओमान में बातचीत पर जोर दिया.

ओमान में होगी बातचीत 

ईरान को इस बात का भी डर था कि तुर्किए में बातचीत हुई तो परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर भी चर्चा होगी जिसके लिए वो तैयार नहीं है. साथ ही ईरान 2 देशों की बातचीत में किसी तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार नहीं हुआ. ईरान के इस रुख के बाद ये खबरें भी आईं कि बातचीत रद्द हो गई है. लेकिन अरब देशों के दबाव के बाद अमेरिका ने ओमान में बातचीत के लिए सहमति दे दी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मिडिल ईस्ट के 9 देशों ने अमेरिका से बातचीत जारी रखने के लिए संपर्क किया जिसके बाद ओमान में बातचीत के लिए अमेरिका तैयार हुआ. अब आपको ये भी जानना चाहिए कि ईरान ने तुर्किए की जगह ओमान में बातचीत की शर्त क्यों रखी और क्यों अमेरिका भी इसके लिए तैयार हो गया. ईरान ने ओमान को इसलिए पसंद किया क्योंकि ओमान लंबे समय से ईरान और अमेरिका के बीच न्यूट्रल और विश्वसनीय मध्यस्थ रहा है. 2013 से अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की बैक-चैनल न्यूक्लियर बातचीत ओमान में ही हुई है. ओमान को न तो ईरान, न ही अमेरिका का विरोधी माना जाता है. इसके साथ-साथ वो क्षेत्रीय राजनीति में भी शामिल नहीं है. यानी ईरान को तुर्किए में बातचीत से जहां मुद्दों का दायरा बढ़ने का खतरा था, वहीं ओमान में वो अपनी शर्तों पर बात कर सकता है. 

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ईरान और अमेरिका के बीच अविश्वास

अरब देशों के दबाव में अमेरिका भले ही तुर्किए की जगह ओमान में बातचीत के लिए तैयार हो गया लेकिन इस बातचीत को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, उससे तय है कि ये वार्ता सिर्फ दिखावे के लिए है. दोनों देश दुनिया के सामने ये दिखाना चाहते हैं कि युद्ध के लिए वो जिम्मेदार नहीं हैं. अमेरिका कहेगा कि उसने पूरी कोशिश की लेकिन बातचीत टूटने के लिए ईरान जिम्मेदार है. वहीं ईरान की तरफ से बातचीत टूटने के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया जाएगा. ईरान और अमेरिका के बीच अविश्वास की खाई बहुत गहरी और ऐतिहासिक है, जो दशकों से बढ़ती ही जा रही है. दोनों देशों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं है. 1953 में अमेरिका के समर्थन से ईरान में तख्तापलट से लेकर पिछले साल ईरान पर अमेरिकी हमले तक इस अविश्वास में बढ़ोतरी ही हुई है. ओमान में बातचीत ज़रूर हो रही है लेकिन दोनों पक्ष अपने-अपने रुख़ पर अड़े हुए हैं. विश्लेषकों का कहना है कि अविश्वास की खाई इतनी ज़्यादा है कि कूटनीति से भरोसा बनाना मुश्किल है. या तो ईरान झुकेगा या सैन्य टकराव बढ़ेगा. दोनों पक्ष एक-दूसरे को धोखेबाज मानते हैं, जिससे कोई भी समझौता होना बहुत मुश्किल है. अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को खुली धमकी दी है. एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई को बहुत चिंतित होना चाहिए. अगर 2 देश युद्ध टालना चाहते हैं तो बातचीत से पहले ये भाषा नहीं होनी चाहिए. ट्रंप का ये बयान बताता है कि वो ईरान पर अपनी शर्तों को मानने का दबाव बनाना चाहते हैं. सिर्फ ट्रंप ही नहीं बल्कि अमेरिका के विदेश मंत्री भी खामेनेई की सत्ता को ईरान के लोगों के खिलाफ बता रहे हैं. 

ईरान-अमेरिका के बीच हो जाएगी जंग? 

बातचीत का समय इस हिसाब से भी महत्वपूर्ण है कि पिछले कुछ दिनों में इजरायल और अमेरिका के बीच सैन्य समन्वय में तेजी आई है. इज रायल डिफेंस फोर्स के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ईयाल ज़मीर 4 दिन पहले वॉशिंगटन का गुप्त दौरा किया था. उन्होंने पेंटागन में अमेरिकी सेना प्रमुख जनरल डैन केन और दूसरे वरिष्ठ अमेरिकी रक्षा अधिकारियों से मुलाकात की. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक इस दौरे में ईरान पर हमले की रणनीति को अंतिम रूप दिया गया. लेकिन अमेरिका बातचीत होने तक इंतजार करना चाहता है. यानी बातचीत नाकाम होने के बाद हमले पर अमल शुरू होगा. यानी कुल मिलाकर ईरान और अमेरिका के बीच ये बातचीत बारूद के साये में हो रही है. बात भले ही हो जाए लेकिन बारूदी हमला तय है.