
DNA Analysis: ट्रंप की खीझ सिर्फ भारतीय मूल के वकील नील कात्याल पर ही नहीं फूटी, बल्कि उनके गुस्से का शिकार सुप्रीम कोर्ट के जज भी बने. वो जज जिनमें से ज़्यादातर उनकी पार्टी रिपब्लिकन की विचारधारा के समर्थक हैं और जिनमें से कुछ को ट्रंप प्रशासन के दौरान ही नियुक्त किया गया था. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने ट्रंप के ख़िलाफ़ फ़ैसला दे दिया. एक समय पर जो ट्रंप रिपब्लिकन विचारधारा के जजों की वजह से टैरिफ पर अपनी जीत तय मानकर चल रहे थे, उन्होंने ही ट्रंप को अब तक का सबसे बड़ा झटका दे दिया.
जिस वक़्त टैरिफ को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला आया, उस वक़्त वो व्हाइट हाउस में नेशनल गवर्नर एसोसिएशन की मीटिंग में भाग ले रहे थे. यूएस मीडिया के मुताबिक़ टैरिफ रद्द करने की जानकारी मिलते ही ट्रंप बेकाबू हो गए. वो मीटिंग से बाहर चले गए और उन्होंने तुरंत एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई जिसमें उनका ग़ुस्सा साफ़-साफ दिख रहा था. वो जजों के ख़िलाफ़ अनाप-शनाप बोल रहे थे.
ट्रंप ने जजों को खूब सुनाया
जजों को तो ट्रंप ने भला-बुरा कहा ही, साथ ही ये अकड़ भी दिखाई कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते. इसी वजह से उन्होंने साल 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत दुनिया के सभी देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का एलान किया. यानी 1977 के क़ानून के तहत टैरिफ को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया तो ट्रंप ने उससे भी 3 साल पहले के क़ानून का सहारा लेकर नया टैरिफ लगा दिया.
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज होते हैं.
इन जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है और सीनेट इसकी पुष्टि करती है.
सुप्रीम कोर्ट के जज आजीवन अपने पद पर बने रह सकते हैं, जब तक कि वो ख़ुद रिटायर न हों या महाभियोग चलाकर उन्हें हटाया न जाए
मौजूदा समय में चीफ जस्टिस समेत 6 जज रूढ़िवादी यानी रिपब्लिकन पार्टी की विचारधारा के हैं जबकि 3 जज उदारवादी यानी डेमोक्रेटिक पार्टी की विचारधारा के हैं.
लेकिन जब फ़ैसला आया तो 6 जजों ने टैरिफ के ख़िलाफ़ वोट दिया जबकि 3 ने ही टैरिफ का समर्थन किया. 9 जजों में से 2 जजों यानी नील गोरसुक और एमी कोनी बैरेट की नियुक्ति तो ख़ुद ट्रंप के कार्यकाल में हुई थी.
ट्रंप जब पहली बार राष्ट्रपति बने थे, उस वक्त इन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया था. लेकिन इन्होंने भी ट्रंप के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया. इसके अलावा रिपब्लिकन खेमे के चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने भी टैरिफ को गैर-कानूनी बताया.
#DNAमित्रों | ट्रंप के ‘अपने’..अदालत में कैसे ‘बेगाने’ हो गए? जिन्हें ट्रंप ने ‘जज’ बनाया..उन्होंने कैसे झुकाया?#DNA #DNAWithRahulSinha #DonaldTrump #USA @RahulSinhaTV pic.twitter.com/MAZh1Pm5SN
— Zee News (@ZeeNews) February 21, 2026
ट्रंप को थी पक्ष में फैसले की संभावना
ट्रंप को पूरी उम्मीद थी कि ज़्यादातर जजों के रिपब्लिकन खेमे से होने के कारण टैरिफ लगाने का फ़ैसला बना रहेगा लेकिन ट्रंप का फ़ैसला इतना गैर-क़ानूनी था, उनकी दलीलें इतनी खोखली थीं कि रिपब्लिकन जजों ने भी ट्रंप का साथ नहीं दिया. इसी वजह से वो इसे अपने व्यक्तिगत अपमान के रूप में ले रहे हैं और जजों के ख़िलाफ़ मर्यादाहीन बयान दे रहे हैं.
सबसे बड़ी अदालत में सबसे बड़ी हार के बाद ट्रंप ने अपना ग़ुस्सा मिटाने के लिए भले ही दुनिया भर के देशों पर 10% टैरिफ लगा दिया. लेकिन उनका ये टैरिफ पहले वाले टैरिफ से भी कम दिन टिकेगा. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद 10 महीने में ही पुराना टैरिफ रद्द हो गया लेकिन नया टैरिफ 5 महीने में ही हटाना पड़ेगा. ट्रंप की ये मजबूरी उस क़ानून में छिपी हुई है जिसके तहत उन्होंने नया टैरिफ लगाया है. अमेरिका के ट्रेड एक्ट 1974 की जिस धारा के तहत ट्रंप ने ये टैरिफ लगाया है, उसमें कई शर्तें हैं. इस क़ानून के तहत 15% से ज़्यादा टैरिफ नहीं लगाया जा सकता है. यानी ट्रंप जिस तरह अभी दुनिया भर के देशों पर 25 या 50% टैरिफ लगाते थे, वो नहीं लगा सकेंगे. इस लिमिट को देखते हुए ही उन्होंने 10% टैरिफ लगाया है. अगर ऐसा नहीं होता तो यहां भी वो मनमानी करते. दूसरी शर्त ये है कि ट्रेड एक्ट 1974 के तहत 5 महीने के लिए ही टैरिफ लगाया जा सकता है. यानी जुलाई तक ही ये टैरिफ जारी रहेगा.
5 महीने के बाद अमेरिकी संसद की मंज़ूरी ज़रूरी है. लेकिन जिस तरह कुछ दिन पहले अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव ने कनाडा पर लगाए गए ट्रंप के टैरिफ को रद्द करने का प्रस्ताव पास किया था, उससे इस बात की पूरी संभावना है कि संसद से इसे मंज़ूरी नहीं मिलेगी. यहां तक कि रिपब्लिकन पार्टी के 6 सांसदों ने भी टैरिफ का विरोध किया था. इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर एक्ट की तरह अनिश्चितकाल के लिए ये टैरिफ लागू नहीं किया जा सकता. और ये बात ट्रंप को पता ना हो. ऐसा हो नहीं सकता.
ट्रंप ने किया और टैरिफ लगाने का ऐलान
यही वजह है कि आने वाले समय में उन्होंने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत टैरिफ लगाने का संकेत दिया है. ट्रंप ने चीन के ख़िलाफ़ इस कानून का इस्तेमाल भी किया है. इसके अलावा ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट 1962 की धारा 232 का भी हवाला दिया है. लेकिन ये 1977 के क़ानून की तरह असरदार नहीं है. ट्रंप टैरिफ के नाम पर टेरर फैलाने का जो मंसूबा रखते हैं, वो शायद इससे पूरा नहीं होगा. यही वजह है कि ट्रंप ने इन क़ानूनों का सहारा नहीं लिया था बल्कि ऐसे क़ानून का इस्तेमाल किया था जिसके तहत टैरिफ लगाना गैर-क़ानूनी है.
