What will be the impact of dollar collapse on the world: शांति अध्ययन के जनक कहे जाने वाले महान समाजशास्त्री जोहान गाल्टूंग के कहा था कि “अमेरिकी साम्राज्य का पतन 2025 तक हो जाएगा. अमेरिकी शक्ति वैश्विक स्तर पर कम होगी, जिससे देश के भीतर भी बिखराव आ सकता है”.  25 साल पहले जो भविष्यवाणी की गई थी उसकी नींव उसी दिन पड़ गई थी जब 2025 में डॉनल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी. अब उस भविष्यवाणी के सच होने के संकेत साफ-साफ दिखने लगे हैं. ये संकेत कई तरह से दिख रहे हैं. कई जगहों से दिख रहे हैं.

दावोस से दुनिया को चेतावनी, अब होगा ट्रंप बनाम यूरोप

ये संकेत स्विटजरलैंड के दावोस में प्रेसिडेंट ट्रंप के आज दिए गए भाषण से मिल रहे हैं. जिसमें उन्होंने उस यूरोप को धमकाया है, जिसके साथ मिलकर अमेरिका ने कई बड़े युद्ध और कई बड़े ऑपरेशन किए. अमेरिका के पतन के संकेत दावोस समेत दुनिया भर से मिल रहे हैं. सुपर पावर के सुपर लीडर को वैश्विक मंच से अपशब्द कहे जा रहे हैं. सरेआम गालियां दी जा रही हैं.

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जो देश कभी अमेरिका के इशारों पर नाचते थे, वो अब उसके ही दुश्मन को आमंत्रित करने लगे हैं. विस्तारवाद और कब्जे के खिलाफ अब ग्रीनलैंड और कनाडा जैसे देश अमेरिका के खिलाफ लड़ने का मन बना चुके हैं. इन सबके बीच अमेरिका के अंदर से भी ट्रंप के खिलाफ बगावती आवाज़ उठने लगी है. कनाडा को नया स्टेट बनाकर अमेरिका में मिलाने की धमकी देने वाले ट्रंप के सामने अमेरिका के टूटने का खतरा बढ़ गया है.

‘ग्रीनलैंड, कनाडा और विस्तारवाद की खुली घोषणा’

डॉनल्ड ट्रंप ने आज दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम से सीधा वैश्विक संवाद किया. वो ठहरकर बोल रहे थे लेकिन उनके शब्द बेहद सख्त थे. ट्रंप के संवाद में आत्ममुग्धता के साथ-साथ यूरोपीय देशों के लिए चेतावनी और उपदेश दोनों थे. ट्रंप के संवाद के केंद्र में ग्रीनलैंड भी था और कनाडा भी. वेनेजुएला भी था और पूरा यूरोप भी. ट्रंप के दावोस डायलॉग की सबसे बड़ी बात ये है कि उन्होंने यूरोप को सीधे तौर पर धमकी दी है.

ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और यूरोप को धमकी दी. ट्रंप ने कहा कि डेनमार्क को ग्रीनलैंड सौंपना अमेरिका की ऐतिहासिक भूल थी. ट्रंप ने आज पहली बार कहा कि ग्रीनलैंड को जीतने के लिए सेना का प्रयोग नहीं करेंगे. ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका शामिल नहीं होता, तो नाटो नहीं होता. वे इस बात की कद्र नहीं करते कि हम क्या करते हैं.

ट्रंप ने ये भी कहा कि आज भी अमेरिका ही सबसे ज्यादा ताकतवर देश है. अगर विश्वास नहीं है तो दुनिया वेनेजुएला को देख ले. उन्होंने कहा कि अमेरिका सिर्फ ग्रीनलैंड चाहता है. इसे पाने से कोई वैश्विक शक्ति अमेरिका को नहीं रोक पाएगी. लेकिन इसके लिए सैन्य बलों का प्रयोग नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा कि सिर्फ अमेरिका ही ग्रीनलैंड की रक्षा कर सकता है. इसके लिए वो ग्रीनलैंड को पैसा देने के लिए भी तैयार हैं.

ट्रंप ने इससे पहले भी ग्रीनलैंड को खरीदने का ऑफर दिया था. तब उन्होंने कहा था कि ग्रीनलैंड के हर एक निवासी को 8 लाख से 80 लाख  रूपये तक नगद दिया जा सकता है. ग्रीनलैंड ने तब इसका विरोध किया था. ट्रंप ने आज फिर से अमेरिका को वैश्विक शक्ति का एकमात्र केंद्र करार दिया. उन्होंने आज ग्रीनलैंड पर कब्जे का विरोध करने के लिए उन्होंने डेनमार्क को अहसान फरामोश कहा. उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटकर डेनमार्क को चेतावनी दी.

दावोस के मंच से डॉनल्ड ट्रंप ने यूरोप को निशाने पर लिया है . सख्त तेवर और उससे भी ज्यादा अल्फाज. ये हालात बता रहे हैं कि ट्रंप और यूरोपीय देशों का गुट यानी यूरोपियन यूनियन आज आमने-सामने आ गए हैं . अब हम आपके सामने इन दोनों पक्षों की ताकत का विश्लेषण करने जा रहे हैं ताकि आप समझ सकें कि इस टेंशन में कौन किसपर भारी है.

यूएस और यूरोप में सैन्य तुलना

अगर सामरिक शक्ति की बात करें तो अमेरिका और यूरोपियन यूनियन कहीं एक समान है तो कही फर्क बहुत ज्यादा है . अमेरिका के पास 21 लाख जवानों की सेना है तो यूरोपीयन यूनियन के सभी देशों को मिलाकर कुल 24 लाख की फौज मौजूद है. अमेरिका के पास तकरीबन 4600 आधुनिक टैंक हैं तो यूरोपीयन यूनियन के पास ये आंकड़ा 5 हजार है. अगर सैन्य विमानों की बात करें तो अमेरिका के पास तकरीबन 15 हजार लड़ाकू और ट्रांसपोर्ट विमान हैं जबकि इस मोर्चे पर यूरोपियन यूनियन पिछड़ जाती है. EU के सभी सदस्यों की ताकत को मिलाएं तो उनके पास सिर्फ 5 हजार सैन्य विमान हैं.

एक और सैन्य पहलू है जहां यूरोपियन यूनियन की शक्ति अमेरिका के सामने काफी कम है. ये पहलू है एटमी हथियारों का . अमेरिका के पास तकरीबन 5200 एटमी वॉरहेड हैं जबकि यूरोपियन यूनियन के पास सिर्फ 290. कहा जाता है युद्ध की गाड़ी पैसों के पहिए पर चलती है. इसी वजह से सामरिक शक्ति के साथ ही साथ दोनों पक्षों की आर्थिक तुलना करना भी जरूरी है.

अमेरिका की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद तकरीबन 32 ट्रिलियन डॉलर है जबकि यूरोपियन यूनियन की जीडीपी 22.5 ट्रिलियन डॉलर है. अमेरिका की जीडीपी ग्रोथ तकरीबन 2.4 प्रतिशत है जबकि यूरोपीयन यूनियन में ये आंकड़ा 1.4 प्रतिशत है. प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी यूरोपियन यूनियन कमजोर साबित होती है. अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय तकरीबन 92 हजार डॉलर है जबकि यूरोपियन यूनियन की प्रति व्यक्ति आय तकरीबन 67 हजार डॉलर है.

सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर ट्रंप का पलड़ा भारी नजर आता है . शायद यही वो आंकड़े हैं जिनके बलबूते ट्रंप बार-बार यूरोप को धमका रहे हैं. यूरोप का कद छोटा करके दिखाते हैं. 

एक ब्रिटिश इतिहासकार हैं पॉल कैनेडी. उन्होंने एक बार कहा था कि “महाशक्तियां तब गिरती हैं जब उनका विस्तार उनकी वास्तविक शक्ति से आगे निकल जाता है.” सबसे शक्तिशाली देश होने के अहंकार में डूबे डॉनल्ड ट्रंप इसी ओर अग्रसर हैं.

ग्रीनलैंड पर कब्जे का बिछा रहे जाल

एक तरफ उनकी नज़र ग्रीनलैंड पर है तो दूसरी तरफ वो कनाडा को कब्जाने का जाल बिछा रहे हैं. ट्रंप ने मानचित्र पर कनाडा को जैसे ही अमेरिका का हिस्सा बताया, वैसे ही कनाडा की सेना ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. पिछले सौ सालों में पहली बार ऐसा हुआ है जब कनाडा को आक्रमण का डर सता रहा है. वो डर भी अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की ओर से है. इसलिए कनाडाई सेना ने एक काल्पनिक युद्ध के आधार पर मिलिट्री मॉडल तैयार किया है.

विशेषकर यह कि अगर अमेरिका हमला करता है तो क्या होगा और हालात कैसे होंगे? असल में ट्रंप ने कुछ महीने पहले कहा था कि अगर कनाडा अमेरिका से फायदा ले रहा है तो वह 51वां राज्य हो सकता है. ट्रंप की ये उत्कंठा ऐसे ही नहीं है. असल में अमेरिका के DNA में ही विस्तारवाद है. जो अमेरिका आज 50 राज्यों का देश है, वहां कभी सिर्फ 13 राज्य थे. 13 से 50 तक के भूविस्तार की यात्रा साम्राज्यवाद की नीतिशास्त्र की एक पाठ्यपुस्तक जैसी है. आज हम उस पाठ्यपुस्तक के पन्नों को पलटना चाहेंगे.

1803 में अमेरिका ने फ्रांस से 15 मिलियन डॉलर में सवा आठ लाख वर्गमील जमीन की सौदा किया था. ये जमीन खरीदने के बाद अमेरिका का आकार तुरंत दो गुना हो गया. आज का लुइसियाना, आयोवा, मिसौरी उसी का हिस्सा है. इसी डील की तरह ट्रंप ने ग्रीनलैंड को भी खरीदने की एक कोशिश की है, जिसे वहां के लोगों ने नकार दिया.

1846 के मैक्सिकन वॉर में एक बड़ा हिस्सा कब्जा किया, जहां आज टेक्सास और कैलिफॉर्निया जैसे बड़ी आबादी वाले राज्य हैं. इसके बाद अमेरिका ने मेक्सिको से करीब 30 हजार वर्गमील जमीन खरीदी जहां आज दक्षिणी एरिज़ोनाज है. 1867 में रूस से आलस्का खरीदा. इसके बाद 1898 में अमेरिका ने स्पेन के साथ युद्ध लड़ा और स्पेन के कई उपनिवेशों पर कब्ज़ा कर लिया. आज के प्यूर्टो रिको और गुआम अमेरिका का हिस्सा हैं.

13 से 50 राज्यों पर कैसे पहुंचा यूएस

इसी तरह अमेरिका 13 से 50 राज्य पर पहुंचा गया. जिस तरह अमेरिका ने मैक्सिकन और स्पेन वॉर में जमीन हथियाया था उसी तरह इस बार उसकी नजर कनाडा पर है. अपने पुरखों की तरह ट्रंप भी विस्तारवादी नीति को नया आकार देना चाहते हैं. वो किसी भी कीमत पर कनाडा को अपना 51वां राज्य बनाना चाहता है. इसी विस्तारवादी नीति का डर कनाडा को भी है. इसीलिए वो सैन्य तैयारी कर रहा है. अब हम आपको बताते हैं कि अगर अमेरिका ने हमला कर दिया तो कनाडा उसके सामने कितने दिनों तक टिक सकता है?

अमेरिका के पास 13 लाख 28 हजार एक्टिव सैनिक हैं, जबकि कनाडा के पास 68 हजार. यानी कनाडा के एक सैनिक के मुकाबले अमेरिका के साढ़े 19 सैनिक हैं. अमेरिका वायुसेना के पास 18 सौ लड़ाकू विमान है जबकि कनाडा के पास सिर्फ 79. यानी कनाडा से अमेरिका की वायुसेना सेना 27 गुना ज्यादा शक्तिशाली है. अमेरिका के पास 241 युद्धपोत है जबकि कनाडा के पास सिर्फ 66. अमेरिका के पास 69 पनडुब्बी हैं, जबिक कनाडा के पास चार हैं.

दोनों देशों की सैन्य ताकत का तुलनात्मक अध्ययन करने से पता चलता है कि अमेरिका के सामने कनाडा एक हफ्ते से ज्यादा नहीं टिक सकता है. एक हफ्ते में अमेरिकी सेना कनाडा के मुख्य शहरों और सैन्य ठिकानों पर कब्जा कर सकती है. ये बात कनाडा अभी अच्छी तरह जानता है. यही कारण है कि अमेरिकी हमले की आशंका के बीच वो अफगान स्ट्रैटजी पर काम कर रही है.

कनाडाई सेना के डिफेंस मॉडल में उन तरीकों को भी शामिल किया गया है जो 1979 से 1989 के बीच अफगान मुजाहिदीन ने सोवियत सेना के खिलाफ अपनाए थे. बाद में तालिबान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ इस्तेमाल किए. इस नीति के तहत कनाडा की सेना अमेरिकी सेना के खिलाफ हिट एंड रन की रणनीति अपनाएगी. यहीं नही रूस-यूक्रेन युद्ध से सबक सीखते हुए कनाडा अमेरिकी सेना पर ड्रोन से हमला करने की रणनीति पर भी काम कर रहा है.

सरेंडर के मूड में नहीं कनाडा

कनाडा किसी भी कीमत पर सरेंडर करने के मोड में नहीं दिख रहा है. वो ना सिर्फ सैन्य तैयारी कर रहा है बल्कि कनाडा के प्रधानमंत्री ग्रीनलैंड और वेनेजुएला का नाम लेकर अमेरिका का विरोध भी कर रहे हैं. जो किसी भी कीमत पर जीतना चाहता है, वह अक्सर सबसे बड़ी कीमत खुद चुकाता है. ट्रंप ने इसकी कीमत चुकानी शुरू कर दी है. जो देश दशकों से अमेरिका का साथी रहे हैं. जो देश अमेरिका की हां में हां मिलाते रहे हैं. वही अब अमेरिकी नीति और ट्रंप पर सवाल उठा रहे हैं.

यूरोप में 40 देश हैं और उनमें से 30 से ज्यादा देश ऐसे रहे हैं, जिनके राष्ट्र प्रमुख अब तक वही बोलते और कहते रहे हैं जो अमेरिका कहता है. यूरोपीय देश अमेरिका की खींची लकीर पर चलते रहे हैं. लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है जब यूरोपीय देश ना सिर्फ अमेरिका से किनारा कर रहे हैं बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति के लिए अपशब्द तक का प्रयोग कर रहे हैं. यूरोपीय देश के नेताओं ने ट्रंप के लिए कैसे-कैसे शब्दों के प्रयोग किए हैं, इसपर हमने एक शब्दकोश तैयार किया है. उस शब्दकोश के कुछ शब्द आपको बताना चाहेंगे. 

ट्रंप को पूर्व NATO महासचिव और डेनमार्क के पूर्व प्रधानमंत्री एंडर्स फोग रासमुसेन ने गैंगस्टर बताया. ब्रिटेन के डेमोक्रेट सांसद एड डेवी ने ट्रंप को “इंटरनेशनल गैंगस्टर” कहा. ब्रिटेन के ही कंजर्वेटिव पार्टी के सीनियर सांसद साइमन होरे ने “समुद्री डाकू” कहा. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों उन्हें बुली बता चुके हैं.

डेनमार्क के एक सांसद ने वैश्विक मंच पर ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिसे हम आपको सुना भी नहीं सकते हैं.इसके अलावा कई यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप को डकैत, तानाशाह और माफिया जैसे अलांकारों से अलंकृत कर लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है.

सोचिए, दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में शुमार अमेरिका के राष्ट्रपति को ही लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जा रहा है. इसका जिम्मेदार कौन हैं? ट्रंप और उनकी वो महत्वाकांक्षाएं हैं,जिसकी वजह से यूरोपीय देश अब अमेरिका से दूरी बना रहे हैं. कहते हैं कि जहाँ भय बढ़ता है, वहाँ साहस जन्म लेता है. अब यूरोपीय देशों में अमेरिका और ट्रंप के खिलाफ साहस बढ़ रहा है. इसी का नतीजा है कि आर्थिक रूप से जो निर्भरता अमेरिका पर थी वो अब चीन और भारत की ओर शिफ्ट हो रही है. जिस ट्रैरिफ-वेपन से ट्रंप अब यूरोपीय देशों को डरा रहे हैं, उसकी प्रतिक्रिया भी ऐसी आ रही है जो अमेरिका के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.

अमेरिका के दुश्मन को बुला रहा फ्रांस

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने अपने देश में उस चीन को खुला आमंत्रण दिया है जो अमेरिका के कट्टर दुश्मन है. अब तक फ्रांस में अमेरिका सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है. खासकर टेक्नोलॉजी, एयरोस्पेस, फार्मास्यूटिकल्स और ऊर्जा सेक्टर में अमेरिका का दबदबा है. लेकिन मैक्रों अब जिनपिंग को फ्रांस में अपना निवेश बढ़ाने का खुला न्योता दे रहे हैं. इसे आप अमेरिकी पतन के संकेत के तौर देख सकते हैं.  

ट्रंप के इरादे को यूरोप भी समझ रहा है और कनाडा भी. आज कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस के मंच से एक बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि दुनिया उस दौर में पहुंच गई है जहां ताकतवर वही करता है जो वो कर सकता है और कमजोर को सहना पड़ता है. उनकी बात ट्रंप ने सुनी होगी और उन्हें बुरी भी लगी होगी. इसलिए आज ट्रंप ने उन्हें धमकी दी.

फ्रांस की नज़र चीन की ओर है तो यूरोपीय संघ की नज़र भारत पर है. यूरोपीय संघ भारत के साथ एक ऐसी डील करने जा रहा है जिसे मदर ऑफ़ ऑल डील्स कहा जा रहा है. ये एक फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट है, जो 27 जनवरी को होगा. मुक्त व्यापार समझौता होने के बाद भारत के सामान को यूरोपीय संघ के 27 देशों के बाज़ार में कम टैरिफ़ या बिना किसी टैरिफ़ को बेचा जाएगा और भारत के बाजार में भी यूरोपीय संघ का सामान मिलेगा. मदर ऑफ़ ऑल डील्स से अमेरिका को कितना बड़ा झटका लगने वाला है.ये हम आपको बताएंगे. लेकिन उससे पहले सुनिए कि यूरोपीय संघ इस डील को लेकर कितना उत्साहित है?

यूरोपीय संघ की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन और काउंसिल प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा 25 जनवरी को भारत आ रही है. वो गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि भी होंगी. उसके बाद इस सौदे पर मुहर लगेगी. यूरोपीय संघ की अध्यक्ष इसलिए उत्साहित हैं क्योंकि यह दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड पैक्ट होगा, जो दुनिया की आबादी की एक चौथाई यानी 2 अरब लोगों को प्रभावित करेगा. यह ग्लोबल GDP का लगभग 25% कवर करेगा.

भारत और यूरोपीय संग के बीच ये डील ऐसे वक्त में हो रही है, जब अमेरिका का दबाव पूरी दुनिया में बढ़ता जा रहा है. जब ट्रंप ने ये तय कर लिया है कि समूची दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल हो. जब वो बिना युद्ध लड़े ही समूची दुनिया को सरेंडर कराना चाहते हैं, तब यूरोप के 27 देश उस भारत के आगे हाथ बढ़ रहा है जिस पर ट्रंप 50 प्रतिशत टैरिफ लगा चुके हैं. अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील नहीं हो पाई है. ट्रंप अपनी शर्तें थोप रहे हैं. तब ट्रंप की नीतियों के कारण भारी दबाव झेल रहा यूरोपीय संघ भारत के साथ ऐसी डील करना चाहता है जिसके बाद अमेरिका की जरूरत बहुत कम हो जाए.

मदर ऑफ ऑल डील्स से क्या-क्या बदल जाएगा

इस मदर ऑफ ऑल डील्स  से टेक्सटाइल्स, लेदर, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स, मरीन प्रोडक्ट्स जैसे सामानों पर टैरीफ शून्य हो जाएंगा. अमेरिका में टैरिफ के कारण जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई होगी. US टैरिफ्स और ग्रीनलैंड विवाद के बीच यूरोपीय संघ को भी नया मार्केट मिलेगा. इस मदर ऑफ ऑल डील्स  के बाद भारत और यूरोपीय संघ के बीच करीब 25-33 लाख करोड़ तक का कारोबार हो सकता है.  

भारत और यूरोपीय संघ को फायदे के बीच सीधा नुकसान अमेरिका को होगा. भारत की अमेरिका पर निर्भरता 10-15% तक कम हो सकती है. अमेरिका जो सामान भेजा जाता है उनमें से  8 से 12 लाख करोड़ रूपये का सामान यूरोपीय संघ के देशों में बेचा जा सकता है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच जो  मदर ऑफ़ ऑल डील्स हो रही है ये ट्रंप की ट्रैरिफ वेपन के खिलाफ एक एयर डिफेंस सिस्टम की तरह तरह काम करेगी.

हमारे देश में एक बहुत पुरानी और प्रचलित कहावत है कि ‘जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसी में गिरता है.’ ट्रंप के साथ भी यही हो रहा है. वो दूसरे देशों को और वहां के नेताओं को धमका रहे हैं, लेकिन अमेरिका के अंदर ही ट्रंप का राष्ट्रीय स्तर का विरोध हो रहा है.

ट्रंप के खिलाफ बगावत जैसी स्थिति है.  पिछले एक साल में अमेरिकियों को ये अहसास हो चुका है कि ट्रंप की नीति अमेरिका के लिए घातक है. यही कारण है कि वॉशिंगटन डीसी, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और अटलांटा में भी लोग ट्रंप के खिलाफ सड़क पर हैं. “Free America Walkout” नाम से ये प्रदर्शन हो रहा है. एक हजार से ज्यादा शहरों में ट्रंप के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे. रेखांकित करने वाली बात ये है कि इसमें बड़ी संख्या में नौजवान भी शामिल हैं. मतलब जेन-जी ने भी ट्रंप के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया है. कोई उन्हें फासीवादी कह रहा है. कोई अधिनायकवादी करार दे रहा है तो किसी का कहना है कि ट्रंप संविधान का खुला उल्लंघन करते हैं. एक साल पहले जिन लोगो ने ट्रंप को चुनकर राष्ट्रपति बनाया था, उन्हीं के खिलाफ अमेरिकियों के विद्रोह के कई कारण हैं.

ट्रंप ने इमिग्रेशन नीति बनाकर जिस तरह लोगों के साथ बर्बरता कर रहे हैं, वो तानाशाह जैसा ही है. ट्रंप ने ट्रांसजेंडर के अधिकारों को सीमित किया है. उन्होंने जिस तरह वॉशिंगटन डीसी और लॉस एंजेल्स में नेशनल गार्ड को उतारा, उससे लोगों को लग रहा है कि वो तानाशाही कर रहे हैं. ट्रंप ने आमलोगों पर जिस तरह निगरानी बढ़ाई है उसके बाद लोगों का कहना है कि ट्रम्प शासन लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार पर हमला कर रहा है. इतना ही नहीं न्यायपालिका पर दबाव बना रहे हैं.

अमेरिका के लिए ईयू का बड़ा संदेश

आंतरिक तानाशाही के साथ-साथ ट्रंप अपनी जिद पूरी करने के लिए जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दादागीरी कर रहे हैं और उस दादागीरी का नतीजा जो यूरोप से आ रहा है, उसको लेकर भी आम अमेरिकी चिंतित हैं. उन्हें ये लग रहा है कि ट्रंप को चुनकर गलती कर दी है. अमेरिकियों को भी लगने लगा है कि ट्रंप के कारण वैश्विक शक्ति का केंद्र अमेरिका अब पतन की ओर जा रहा है.  

भारत के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते की तरफ कदम बढ़ाकर…यूरोपीयन यूनियन ने ये संकेत दे दिया है कि आज दुनिया अमेरिका के बिना भी चल सकती है. अमेरिका के पड़ोसी देश कनाडा के पीएम मार्क कार्नी का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की डायानसोर डिप्लोमेसी यानी दादागीरी अब दुनिया के किसी भी हिस्से को कबूल नहीं है .

अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी आज अमेरिका से ही अलगाव की बात कर रहे हैं . अगर ये अलगाव हुआ तो वाकई संसार पर अमेरिका का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाएगा. बहुत संभव है कि आने वाले वक्त में ये प्रभाव शून्य भी हो जाए. अगर वाकई अमेरिकी प्रभाव का मीटर नीचे आया तो इसका सबसे बड़ा असर अमेरिकी डॉलर पर पड़ेगा. आपको  भी गौर से देखना और समझना चाहिए कि जब संसार अमेरिका से दूरी बनाकर चलेगा तो डॉलर का क्या हश्र होगा.

अमेरिका से दूरी बनाने पर सभी देश अपनी करेंसी में ही लेन-देन करेंगे. मिसाल के लिए यूरोपीय देश यूरो में व्यापार कर सकते हैं. ब्रिक्स के सदस्य देश कोई नई करेंसी बना सकते हैं या फिर आपसी सहमति से वर्तमान करेंसी का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस किस्म के कदमों का असर ये होगा कि यूरोप से लेकर एशिया तक बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में डॉलर की डिमांड कम हो जाएगी. डिमांड कम होने की वजह से डॉलर की वैल्यू भी तेजी से कम होगी. अगर डॉलर कमजोर हुआ तो इससे अमेरिका के लिए आयात महंगे हो जाएंगे जो आगे चलकर अमेरिका में महंगाई को तेजी से बढ़ा देगा. यानी अमेरिकी प्रभाव से मुक्त संसार की सबसे बड़ी कीमत अमेरिका के नागरिक ही चुकाएंगे.

डॉलर के कमजोर होने से दुनिया पर क्या असर पड़ेगा

डॉलर के कमजोर होने का असर सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर ही नहीं पड़ेगा. बल्कि इससे दुनिया को लेकर फैसले लेने की अमेरिकी क्षमता भी नगण्य हो जाएगी . ये डॉलर का डॉमिनेंस यानी दबदबा ही जिसकी वजह से ट्रंप जैसे किरदार किसी भी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगा देते हैं. अगर डॉलर में ही दम नहीं बचा तो ट्रंप या भावी अमेरिकी राष्ट्रपतियों के पास किसी देश, शख्स या संगठन पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाने की पावर नहीं बचेगी. मित्रों…आज दुनिया के बड़े देश जिस तरह से अमेरिका से फासला बना रहे हैं उसे आप THEORY OF CREATIVE DESTRUCTION के नजरिए से भी देख सकते हैं. अब हम आपको इसी थ्योरी के बारे में बताने जा रहे हैं ताकि आप अमेरिका मुक्त संसार के इस विचार को बेहतर तरीके से समझ सकें.

ये थ्योरी अमेरिका के ही समाजशास्त्री जोसफ शंपटर के दिमाग की ईजाद है. इस थ्योरी में जोसफ शंपटर कहते हैं जब कोई पुरानी व्यवस्था इतनी दुखदायी हो जाती है कि उसके साथ जीना मुश्किल हो जाता है. तो नई व्यवस्था को खड़ा करने के लिए पुरानी को पूरी तरह नष्ट करना पड़ता है. नई व्यवस्थाओं में त्वरित न्याय और निष्पक्ष अवसरों की आशा ज्यादा रहती है.

इसे इत्तेफाक मानिए या फिर दूरदर्शी सोच . इस थ्योरी को लिखने वाले जोसफ शंपटर ने आज से 75 साल पहले ये बता दिया था कि एक दिन अमेरिकी पूंजीवाद से पैदा हुआ दुनिया को डराने और धमकाने वाला सिस्टम खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा. आज इसी थ्योरी पर चलकर अमेरिकी प्रभाव से मुक्त संसार बनाने की तरफ कदम बढ़ाए जा रहे हैं. अमेरिका मुक्त संसार की इस परिकल्पना में एक महत्वपूर्ण बिंदु दुनिया का सामरिक समीकरण भी है . आज तक पश्चिमी जगत अमेरिका की ही कमान तले सामरिक सुरक्षा के फैसले लेता था. अगर पश्चिमी जगत ने इस मुद्दे पर भी अमेरिका से दूरी बनाई तो एक नई तस्वीर उभरेगी. अब हम आपको इसी तस्वीर से जुड़ी घटनाएं और आकलन बताने जा रहे हैं.

यूरोपियन यूनियन ने अमेरिकी प्रभुत्व में चलने वाले नाटो का विकल्प तैयार करना शुरू कर दिया है . यूरोपीय देश  RAPID DEPLOYMENT CAPACITY नाम के एक सामरिक सहयोग पर सहमति बना चुके हैं . फिलहाल इस फोर्स में 5 हजार सैनिक तैनात किए गए हैं . यूरोपीय देशों का प्लान है कि साल 2030 तक इस फोर्स की तादाद 50 हजार तक कर दी जाए और इस फोर्स के लिए 6.50 बिलियन यूरो यानी तकरीबन 70 हजार करोड़ रुपए का बजट भी तय कर दिया जाए.

यूएस के पतन से रूस को होगा फायदा

यूरोपियन यूनियन अमेरिका से फासला बना रही है लेकिन ट्रंप को शायद इसकी कोई फिक्र नहीं है. यूरोप के साथ डैमेज कंट्रोल करने की बजाय ट्रंप आज भी यूरोपीय देशों को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. वाकई अमेरिका मुक्त संसार बना तो विश्व के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग पावर सेंटर बनने तय हैं. अगर ट्रंप का प्रभाव खत्म होगा तो उनके पारंपरिक प्रतिद्वंदी यानी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का प्रभाव बढ़ेगा. रूस किस तरह और दुनिया के किस हिस्से में पावर सेंटर बना सकता है. अब हम आपके लिए इन्हीं संभावनाओं का विश्लेषण करने जा रहे हैं.

अगर पुतिन को प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने का मौका मिला तो यकीनन उनकी पहली प्राथमिकता ग्रेटर रशिया के सपने को साकार करना होगा. यानी मध्य एशिया में एक ऐसा ब्लॉक बनाना जिसकी जमीन पर भले ही रूस का कब्जा ना हो लेकिन उसपर रूस की मजबूत पकड़ बन जाए. अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान और यूक्रेन जैसे मध्य एशियाई देशों को रूस दोबारा तत्कालीन सोवियत संघ जैसे ढांचे में ला सकता है. इसके लिए पुतिन के पास CSTO यानी COLLECTIVE SECURITY TREATY ORGANISATION का सामरिक ढांचा पहले से मौजूद है. यानी पुतिन मध्य एशिया से पूरी तरह अमेरिका और नाटो का सामरिक प्रभाव हटा पाएंगे और दुनिया का ये हिस्सा रूसी झंडे के तले आगे बढ़ेगा.

 यहां आपको जानना चाहिए कि अमेरिका मुक्त संसार में सामरिक दबदबा कायम करने के साथ ही साथ…पुतिन के पास मध्य एशिया के उस बड़े भूभाग पर भी कंट्रोल होगा जिसे एशिया और यूरोप का व्यापारिक मार्ग भी कहा जाता है. अगर पुतिन इस सेंट्रल एशिया कॉरिडोर को विकसित कर पाए तो ये रूस और उसके गुट के लिए एक इकोनॉमिक बूस्टर साबित होगा. अमेरिकी दबदबे से मुक्त दुनिया में एक और देश अपना प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिश करेगा. ये देश है चीन जिसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विस्तारवाद को रोकने वाले किरदारों में अमेरिका भी शामिल है . नए समीकरणों से जिनपिंग क्या हासिल कर सकते हैं. ये भी आपको बेहद गौर से जानना चाहिए चाहिए.

 लंबे समय से चीन के पड़ोसियों को अमेरिका से मदद मिल रही है . ताइवान से लेकर जापान और दक्षिण कोरिया में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी हटने से दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर इंडो पैसेफिक के मुहाने तक चीन का दबदबा कायम होने के चांस बढ़ जाएंगे. बहुत संभव है कि जिनपिंग को ताइवान और साउथ चाइना सी के विवादित इलाकों पर कब्जा करने का भी मौका मिल जाए. ऐसे में दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के पास दो ही विकल्प रहेंगे या तो वो चीन जैसी शक्ति से लड़ाई लड़ें या फिर चीन के दबदबे को स्वीकार कर लें. दोनों ही सूरतों में चीन  का फायदा ही होगा . ये आंकलन बताते हैं कि अमेरिका मुक्त संसार का विचार जिनपिंग के लिए भी कई अवसर लेकर आएगा.

अमेरिका मुक्त संसार एक ऐसी परिकल्पना है जो वाकई जियो पॉलिटिक्स की दशा और दिशा बदल कर रख देगी . इन्हीं संभावनाओं में से एक हैं इस्लामिक जगत के मुल्क जिनके ऊपर लंबे वक्त से अमेरिका का प्रभाव रहा है. अमेरिकी सरकार के फैसले ही इन देशों की नीयत और नीति तय करते हैं. अमेरिकी प्रभाव से दूर होकर इन देशों ने एक नए सामरिक ब्लॉक की तरफ कदम भी बढ़ा दिए हैं. इस प्रयास को दुनिया ने इस्लामिक नाटो का नाम दिया है. अमेरिका मुक्त संसार में ये इस्लामिक नाटो किस रास्ते पर बढ़ेगा. अब आपको ये भी समझना चाहिए.

इस्लामिक नाटो के सपने को भी लगेंगे पंख

इस इस्लामिक नाटो की तरफ पहला कदम उस वक्त बढ़ा था जब सऊदी अरब और पाकिस्तान ने सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पारस्परिक सहयोग का समझौता किया था. इस समझौते के बाद तुर्किए के भी गठबंधन से जुड़ने की अटकलें सामने आई हैं. बहुत मुमकिन है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान से जुड़े दूसरे इस्लामिक मुल्क भी सुरक्षा की जरूरतों के लिए कथित इस्लामिक नाटो का हिस्सा बन जाएं. अगर ऐसा हुआ तो मिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभाव शून्य हो जाएगा और स्थानीय ताकतों को अपने फैसले लेने का अधिकार मिल जाएगा.

इस्लामिक नाटो एक सामरिक प्लान है लेकिन अरब जगत के एक्सपर्ट्स लगातार चर्चा कर रहे हैं किस तरह अमेरिकी प्रभाव को दुनिया के इस हिस्से से दूर किया जाए. इन चर्चाओं का मकसद है मिडिल ईस्ट के आर्थिक और सामरिक हितों से विदेशी कंट्रोल को दूर करना. इन चर्चाओं को नजदीक से समझने के लिए आपको सऊदी अरब के बड़े अखबार अरब न्यूज़ का हालिया संपादकीय गौर से पढ़ना और समझना चाहिए.

 इस संपादकीय की हेडलाइन थी AMERICAN MAP VERSUS ARAB UNITY यानी अमेरिकी दबदबा बनाम अरब एकता. संपादकीय में बताया गया है कि अमेरिका फर्स्ट की नीति की वजह से अरब जगत का आर्थिक और सामरिक दोहन किया गया है. संपादकीय लिखने वाले जानकारों ने नसीहत दी है कि वॉशिंगटन के साथ व्यापार करने से बेहतर है कि अरब देश एक दूसरे के विकास में सहयोग करें ताकि क्षेत्रीय एकता और विकास आगे बढ़ सके.

कहने और सुनने में ये बातें बहुत अच्छी लगती हैं लेकिन अरब जगत का एक कटु सत्य रहा है. ये सत्य जुड़ा है ताकत और रसूख हासिल करने के लिए प्रतिद्वंदिता से. इन्हीं महत्वकांक्षाओं की वजह से आज तक अरब जगत में ऐसे गुट और किरदार सक्रिय हैं जो आतंकवाद की दहशत के जरिए सरकारों को धमकाते रहे हैं . इसी वजह से कहा जाता है कि अगर अमेरिका मुक्त संसार हकीकत में तब्दील हो भी गया तब भी अरब जगत में स्थिरता या एकता की कोई गारंटी नहीं है. अमेरिकी दबदबा खत्म होने से अवसरों के रास्ते भारत के लिए भी खुलेंगे . किस तरह भारत विकास और सामरिक प्रभाव की गति हासिल कर सकता है. अब हम आपको यही बताने जा रहे हैं.ॉ

भारत पर क्या पड़ेगा असर

मध्य एशिया से लेकर एशिया पैसेफिक और मिडिल ईस्ट. दुनिया के तकरीबन हर हिस्से में भारत और उस क्षेत्र की बड़ी शक्तियों के अच्छे संबंध स्थापित हो चुके हैं. तेल और ऊर्जा के क्षेत्र में भारत और मिडिल ईस्ट का सहयोग काफी आगे बढ़ सकता है. क्वाड के जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर इंडो-पैसेफिक में भारत की पकड़ मजबूत हो सकती है. इतना ही नहीं जिस यूरोपियन यूनियन के साथ भारत आर्थिक रिश्तों को मजबूत कर रहा है उसके साथ सामरिक रिश्ते बढ़ाने के विकल्प भी तलाशे जा सकते हैं. आज रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. एक डॉलर की कीमत 91 रुपये 69 पैसे हो गए हैं. ट्रंप की नीति और अमेरिका का तानाशाही रवैया..भारत की करंसी के साथ-साथ भारत के विकास के लिए भी खतरनाक साबित हो रहे हैं. इसलिए अगर अमेरिका का पतन होता है तो डॉलर का पतन होगा..और डॉलर का पतन होगा तो भारत समेत दुनिया के ताकतवर होते देशों की करंसी की ताकत बढ़ेगी. और इससे भारत खुद को दुनिया के नये सुपरपावर के तौर पर स्थापित कर सकता है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक शब्द का जन्म हुआ था . ये शब्द था PAX AMERICANA यानी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद का वो दौर जब दुनिया के तकरीबन हर क्षेत्र में अमेरिका का दबदबा या प्रभाव था. आज ट्रंप जिस तरह दुनिया से अदावत मोल ले रहे हैं वो इशारा कर रहा है कि PAX AMERICANA नाम के इस दौर का अंत नजदीक आ रहा है. और भारत-चीन जैसे देश नए सुपरपावर बनकर..दुनिया को आने वाले दिनों में चलाने जा रहे हैं.