
PM Modi In Ethiopia: पीएम मोदी हाल ही में इथियोपिया की यात्रा पर निकले थे. इस दौरान उन्हें ‘ग्रेट ऑनर निशान’ नाम के सर्वोच्च अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. पीएम मोदी ने अपनी यात्रा में बताया कि भारत और इथियोपिया के बीच लगभग 2,000 साल पुराने संबंध हैं. साल 1941 में भारतीय सैनिकों ने इथियोपिया की स्वतंत्रता के लिए वहां के लोगों के साथ मिलकर जंग लड़ी थी. इस दौरान पीएम ने इथियोपियाई संसद को संबोधित करते हुए मलिक अंबर नाम के एक शख्स का भी जिक्र किया.
कौन थे मलिक अंबर?
मलिक अंबर ओरोमो या विलुप्त जनजाति माया से जुड़े एक जातीय समूह से संबंध रखते थे. उनका जन्म साल 1548 के आसपास इथियोपिया में हुआ था. उस समय इसका नाम अबीसीनिया हुआ करता था. ‘डेक्कन हेरिटेज’ की रिपोर्ट के मुताबिक किशोरावस्था के दौरान ही मलिक अंबर के इलाके में क्षेत्रीय संघर्ष शुरू हो गया. ऐसे में उन्हें भी अरब व्यापारियों ने पकड़कर यमन के व्यापारियों को 20 डुकट में बेंच दिया. यमन से उन्हें बगदाद ले जाकर जबरदस्ती उनसे इस्लाम धर्म कबूल करवाया गया. बाद में मालिक मीर कासिम अल बगदादी ने उनकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उनका नाम अंबर रख दिया.
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बहादुरी के दम पर मिली आजादी
बगदाद में रहने के कुछ समय बाद मलिक अंबर को फिर 1560 या 1570 के दशक में भारत में गुलाम बनाए गए एक पूर्व ‘हब्शी’ चंगेज खान को बेच दिया गया. यहां से कई बार बेचे जाने के बाद वह दक्कन पहुंचे. यहां भी लोग उनकी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता से काफी प्रभावित हुए. बताया जाता है कि अबंर ने इस दौरान अहमदनगर में निजाम शाही के दरबार में कुछ जिम्मेदारियां संभाली. यहां उन्होंने सैन्य रणनीतिस संगठन और कूटनीति के बारे में सीखा. बीजापुर सल्तनत के साथ अपना सैन्य करियर शुरु करने के बाद मलिक अंबर को अपनी बहादुरी के लिए लगभग 1575 में आजाद कर दिया गया.
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रणनीति से अहमदनगर सल्तनत में बनाई जगह
स्वतंत्रता मिलने के बाद मलिक अंबर ने लगभग 150 गुलामों की एक फौज बनाई. इस दौरान दक्कन में मौजूद अहमदनगर, गोलकोण्डा, बीजापुर और मुगल सल्तनत का राज था. सभी राज्यों ने अपने यहां मुगल सल्तनत के विस्तार को रोकने के लिए पैसे देकर अंबर की फौज से युद्ध लड़वाया. इसके बाद मलिक अंबर ने अहमदनगर सल्तनत में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए छत्रपति शिवाजी के पिता शाहजी भोसले और उनके दादा मल्लोजी भोसले जैसे मराठा सरदारों के साथ गठबंधन किया. इस तरह उन्होंने मुगलों के आगे बढ़ने से रोका. साल 1626 में मलिक अंबर के निधन के बाद अहमदनगर की शक्ति धीरे-धीरे कम हुई, हालांकि दक्कन की राजनीति और मराठा-मुगल संघर्ष की दिशा में उनकी रणनीति ने अमिट छाप छोड़ी.
