Tarique Rahman Will revenge Sheikh Hasina party: बांग्लादेश की राजनीति में अभी तूफान चल ही रहा है. चुनाव जीत के बाद प्रधानमंत्री बनने जा रहे तारिक रहमान की पहली बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे अहम सवाल अवामी लीग के समर्थकों को लेकर उठा. पत्रकारों ने पूछा कि जो लोग अब भी अवामी लीग के साथ हैं, उनके लिए सरकार का रुख क्या होगा? इस पर रहमान का छोटा लेकिन गहरा जवाब था- “कानून का राज सुनिश्चित करके.” लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि शेख हसीना-खालिदा जिया की पुरानी दुश्मनी खत्म होगी या नई साजिशें शुरू होंगी? खासकर आवामी लीग के समर्थकों के साथ क्या होगा? तारिक रहमान ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कहा, वो सुनकर सब सोच में पड़ गए हैं. समझते हैं पूरी कहानी.

तारिक रहमान का ‘कानून का राज’ वाला जवाब ने मचाया सियासी हल्‍ला
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को ढाका में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जहां एक पत्रकार ने सीधा सवाल किया – “बांग्लादेश में अभी भी बहुत से लोग आवामी लीग के समर्थक हैं. उनके साथ सुलह का क्या रास्ता निकलेगा?” तारिक रहमान, जो कम बोलते हैं उन्होंने बस इतना कहा – “कानून का राज सुनिश्चित करके.” ये छोटा सा जवाब बड़ा मतलब रखता है. यही एक लाइन अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है. क्योंकि सवाल सिर्फ सत्ता बदलने का नहीं, बल्कि राजनीतिक बदले और राष्ट्रीय मेल-मिलाप के बीच संतुलन बनाने का है.

अवामी लीग समर्थकों की मुश्किलें
जुलाई 2024 के विरोध प्रदर्शनों के बाद अवामी लीग से जुड़े कई लोग सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए. पार्टी पर बैन लग गया. शेख हसीना भारत में शरण ले लिया. बड़ी संख्या में नेताओं और समर्थकों पर केस दर्ज हुए, जबकि आरोप है कि कई लोग सिर्फ पार्टी से जुड़े होने की वजह से निशाने पर आ गए. हालांकि सच्चाई यह भी है कि अवामी लीग का वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. चुनाव में पार्टी के बहिष्कार के बावजूद उसके समर्थकों ने बड़ी संख्या में BNP को वोट दिया है.

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चुनाव में कैसे बदला सियासी गणित
2026 के चुनाव नतीजों के शुरुआती विश्लेषण से साफ हुआ कि अवामी लीग के वोट सीधे BNP की झोली में गए. वोटरों के सामने असल विकल्प BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच था, और ज्यादातर लोगों ने BNP को चुना. इसकी एक बड़ी वजह राष्ट्रीय पहचान भी रही. BNP और अवामी लीग दोनों 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत को अहम मानते हैं, जबकि जमात-ए-इस्लामी की पाकिस्तान समर्थक छवि आज भी कई मतदाताओं को असहज करती है.

अल्पसंख्यक और महिला वोटरों ने बदली तस्वीर
इस चुनाव में अल्पसंख्यक समुदायों का झुकाव भी BNP की ओर दिखा. तारिक रहमान ने “समान बांग्लादेश” का वादा किया और अल्पसंख्यकों पर हमले रोकने की बात कही, जिसने भरोसा पैदा किया. महिला वोटरों की भूमिका भी बेहद अहम रही. जमात नेतृत्व के महिलाओं की राजनीति में भूमिका पर दिए गए विवादित बयान और शरीया कानून की चर्चा ने कई महिला मतदाताओं को BNP के करीब ला दिया.

साजिश की थ्योरी और वोटरों का डर
अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर देश में कई तरह की चर्चाएं भी हुईं. कुछ लोगों को लगा कि राजनीतिक सिस्टम में किसी भी पार्टी को बाहर किया जा सकता है. इसी डर ने कई वोटरों को मजबूत और स्थिर सरकार के लिए BNP को स्पष्ट जनादेश देने की तरफ धकेला.

अब सबसे बड़ी चुनौती
नई सरकार के सामने असली परीक्षा यही है कि वह जनता के गुस्से को शांत करते हुए न्याय भी करे और राजनीतिक प्रतिशोध से भी बचे. झूठे मामलों को खत्म करना और हिंसा के असली दोषियों को सजा देना यही संतुलन सरकार की विश्वसनीयता तय करेगा. राजनीतिक टकराव से थके बांग्लादेश में अब उम्मीद यही है कि “कानून का राज” बदले की जगह सुलह का रास्ता बने.