US Supreme Court Strikes Down Trump Tariffs: अमेरिका की सर्वोच्च अदालत संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए भारी टैरिफ को रद्द कर दिया है. ये फैसला छह के मुकाबले तीन मतों से हुआ है. जिसमें 6 जज फैसले के पक्ष में थे, और 3 जज विरोध में थे. अदालत ने साफ कहा है कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकार की सीमा पार कर दी थी. ये फैसला उनकी अंतरराष्ट्रीय ट्रे़ड नीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. अदालत की ओर से बहुमत का फैसला लिखते हुए मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने कहा कि इतने बड़े अधिकार का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब संसद से साफ अनुमति मिली हो, इस मामले में ऐसी अनुमति ट्रंप को नहीं मिली थी. 

ट्रंप के हाथ में मनचाहा टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं
ये पूरा विवाद 1977 में बने एक कानून से जुड़ा था. इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट नाम के कानून का सहारा लेकर ट्रंप सरकार ने लगभग सभी ट्रेड पार्टनर्स देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ लगा दिया था. इसमें कनाडा से लेकर भारत तक शामिल थे. भारत पर एक समय लगभग पचास प्रतिशत तक शुल्क लगाया गया था. बाद में बातचीत के बाद इसे पच्चीस प्रतिशत किया गया है. आगे चलकर इसे अठारह प्रतिशत तक घटाने की बात कही गई है. अदालत ने कहा कि अमेरिका के संविधान के अनुसार टैक्स और शुल्क लगाने का अधिकार संसद के पास है. राष्ट्रपति को यह अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता है.

क्या पैसे मिलेंगे वापस? 
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पहले वसूले गए पैसे व्यापारिक संस्थानों को वापस मिलेंगे. यह याचिका अमेरिका के बारह राज्यों और कई व्यापारिक संस्थानों ने मिलकर दायर की थी. उनका कहना था कि सरकार ने अपनी शक्ति से आगे बढ़कर फैसला लिया है. अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि सरकार को लगभग एक सौ पचहत्तर अरब की रकम लौटानी पड़ सकती है. लॉर्ज रिटेल ट्रेड ग्रुप कॉस्टको जैसे संस्थान पहले ही अदालत में राशि वापसी की मांग कर चुके हैं. हालांकि अदालत ने अपने आदेश में यह साफ नहीं किया है कि यह राशि किस प्रक्रिया से लौटाई जाएगी.

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कदम नहीं उठाएंगे तो, दुनिया कमजोर समझेगी
ट्रंप पहले यह कहते रहे थे कि यह टैरिफ देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. उनका तर्क था कि इससे व्यापार घाटा कम किया जा सकता है. साथ ही दूसरे देशों पर अवैध मादक पदार्थों जैसे मुद्दों को लेकर दबाव बनाया जा सकता है. उनका यह भी कहना था कि अगर ऐसे कदम नहीं उठाए गए, तो दुनिया अमेरिका को कमजोर समझेगी.

ट्रंप खोज रहे हैं नए रास्ते
 लेकिन अब अदालत के फैसले के बाद उनका प्रशासन नए कानूनी रास्तों पर विचार कर रहा है. अधिकारियों के मुताबिक वे सुरक्षा से जुड़े कानूनों या अनुचित व्यापार व्यवहार के आधार पर कुछ शुल्क बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था रॉयटर्स के अनुसार, नए विकल्प पहले जितने आसान नहीं होंगे.

इस फैसले में न्यायाधीशों के मत बंटे हुए नजर आए हैं. कुछ उदार और कुछ परंपरावादी न्यायाधीशों ने मिलकर शुल्क रद्द करने के पक्ष में मतदान किया. वहीं तीन न्यायाधीशों ने इसका विरोध किया. असहमति जताने वाले न्यायाधीश ब्रेट कैवनॉ ने कहा कि यह नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग विषय है. लेकिन कानून की भाषा और पुराने फैसलों के आधार पर इसे वैध माना जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार को अब अरबों की राशि लौटानी पड़ी, तो यह प्रक्रिया बेहद जटिल और उलझन भरी साबित हो सकती है. कुल मिलाकर यह फैसला राष्ट्रपति द्वारा आपात अधिकारों के सहारे व्यापार नीति चलाने की क्षमता को काफी हद तक सीमित करता है.

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