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प्रमोद सिन्हा/ खंडवा: भारतीय फिल्म उद्योग के हरफनमौला कलाकार किशोर कुमार का पुश्तैनी मकान जर्जर हालत में है. खंडवा नगर निगम हर साल मानसून से पहले शहर के खस्ताहाल मकानों के मालिकों को नोटिस देता है. 4 साल पहले किशोर कुमार के इस पुश्तैनी मकान को भी खस्ताहाल और जर्जर अवस्था में मानते हुए नगर निगम ने नोटिस चस्पा किया था. लेकिन इस मकान में कोई नहीं रहता है. यही समझ कर नगर निगम ने भी इसे अपने हाल पर छोड़ दिया है.

यादें मलबे में दबने का डर
खंडवा के लोगों और किशोर कुमार के प्रशंसकों को इस बात का डर है कि यह खस्ताहाल मकान कभी भी गिर जाएगा. और इसके गिरते की किशोर कुमार की यादें भी उसके मलबे में दब जाएंगी. वहीं दूसरी ओर किशोर प्रेमी प्रदेश सरकार से इस मकान को अधिग्रहित करते हुए म्यूजियम बनाने की मांग कर रहे हैं.

बचपन यहीं बीता
खंडवा के बॉम्बे बाजार मेन रोड पर गांगुली हाउस नाम का घर भारतीय फिल्म उद्योग के हरफनमौला कलाकार किशोर कुमार का पुश्तैनी मकान है. इसे गौरी कुंज भी कहा जाता है. किशोर कुमार के पिता खंडवा के प्रतिष्ठित वकील थे. इसी मकान में अशोक कुमार, किशोर कुमार और अनूप कुमार तीनों भाइयों का बचपन बीता था. खंडवा में ही किशोर कुमार की प्राथमिक शिक्षा हुई. किशोर कुमार ने इसी मकान के आंगन से होते हुए मुंबई महानगर तक का सफर तय किया.

प्रशंसकों को सता रही चिंता
आज यह मकान जर्जर हालत में है. कभी भी गिर सकता है. खंडवा के संस्कृति प्रेमियों को इस बात का डर है कि रखरखाव के अभाव में जर्जर हो चुका यह मकान कभी भी ढह सकता है. स्थानीय कलाकार निमिष भंसाली का कहना है कि इसके गिरते ही न केवल किशोर की यादें बल्कि किशोर कुमार के चाहने वाले लाखों प्रशंसकों के अरमान भी इस मकान के मलबे में दब जाएंगे.

आखिर कौन है मालिक स्थिति साफ नहीं
लगभग 4 साल पहले नगर निगम खंडवा ने जर्जर हो चुके इस मकान पर नोटिस चस्पा किया था. हालांकि इस मकान में कोई नहीं रहता और इसके स्वामित्व के बारे में भी स्थिति साफ नहीं है. यही कारण है कि नगर निगम भी इस मकान को नोटिस देकर भूल गया. कुछ करीबी सूत्रों का कहना है कि पारिवारिक बंटवारे में यह मकान अनूप कुमार के हिस्से में आया था. उनकी मौत के बाद उनके बेटे अर्जुन इसके मालिक है लेकिन वह खंडवां नहीं आते है. बीच में इसके बिकने की खबर भी आई थी लेकिन उस पर भी विराम लगा हुआ है.

संस्कृति संग्रहालय बनाने की मांग
समाजसेवी सुनिल जैन कहते है कि इसका रखरखाव बहुत जरूरी है. खंडवा शहर के संस्कृति प्रेमियों की इच्छा है कि राज्य सरकार इसे अधिग्रहित कर यहां किशोर की याद में संस्कृति संग्रहालय बना दे. जहां नई पीढ़ी के लोग किशोर की हरफनमौला विधा को आगे बढ़ा सके.

अंतिम संस्कार खंडवा में हुआ
अगस्त 1929 को किशोर कुमार का जन्म इसी मकान में हुआ था. किशोर कुमार जब तक जिंदा थे अक्सर खंडवा के इस पैतृक मकान में आते रहते थे. आखिरी बार वह 1987 में खंडवां आए थे. 1989 में उनकी मृत्यु हो गई. उनकी दिली इच्छा थी कि वह जीवन के अंतिम समय में खंडवा में ही आकर रहे. इसलिए उनकी मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को मुंबई से खंडवा लाया गया और खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया. जिस स्थान पर उन्हें पंचतत्व में विलीन किया गया था. उस श्मशान घाट का नाम भी किशोर कुमार के नाम से है. किशोर प्रेमियों ने इसी स्थान पर उनकी समाधि बना दी. जहां हर साल उनकी जन्म और पुण्य तिथि पर देश भर से उनके प्रशंसक मत्था टेकने आते हैं.

बुजुर्ग चौकीदार करता है चौकीदारी
पिछले 40 सालों से यह मकान वीरान पड़ा है. एक चौकीदार यहां रहता है जो मकान की देखरेख करता है. यह वही चौकीदार है जिसके साथ किशोर कुमार अपने मन की बात शेयर करते थे. उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुका यह बुजुर्ग चौकीदार सीताराम भी किशोर कुमार की यादें अपने दिल में समेटे हुए हैं.

कैसा रहा फिल्मी सफर
किशोर कुमार ने 16 हजार फ़िल्मी गाने गाए. उनको 8 बार फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला. किशोर कुमार के फिल्मी करियर की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में वर्ष 1946 में फिल्म ‘शिकारी’ से हुई थी. किशोर कुमार 1970 से 1987 के बीच सबसे महंगे गायक थे. किशोर कुमार ने अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, जीतेन्द्र जैसे बड़े-बड़े दिग्गज कलाकारों के लिए आवाज दी थी. अब उस आवाज़ और उसके अस्तित्व को बचाये रखने की आवश्यकता है. जिसने कभी खुद की मेहनत से इतना नाम शोहरत कमाई आज उसी के घर की हालत खस्ता हो चुकी है. किशोर प्रेमियों को सरकार से ही उम्मीद बची है.

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