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यूजर्स के लिए यूपीआई निःशुल्क


व्यापारियों के लिए भी अधिकांश लेन-देन निःशुल्क ही रहेंगे

भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम (पीएसएस अधिनियम) में संशोधन, वित्तीय समावेशन के और अधिक फैलाव, यूपीआई की दीर्घकालिक स्थिरता, तकनीकी तरक्की और उभरते जोखिमों के प्रति लचीलेपन को सुनिश्चित करने के लिए एक सहायक प्रावधान है

प्रविष्टि तिथि: 08 AUG 2026 6:40PM by PIB Delhi

भारत सरकार स्पष्ट रूप से यह घोषणा करती है:

  • यूजर्स के लिए निःशुल्क : भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को किसी भी प्रकार का लेन-देन शुल्क नहीं देना होगा।
  • पी2पी लेन-देन निःशुल्क : सभी पर्सन-टू-पर्सन लेन-देन निःशुल्क रहेंगे।
  • व्यापारियों के लिए मामूली एमडीआर : एमडीआर शुल्क लागू होने पर, यह केवल सीमित संख्या में व्यापारी लेन-देन पर, एक निश्चित सीमा से अधिक, मामूली दर पर लागू होगा, जो डेबिट या क्रेडिट कार्ड एमडीआर से बहुत कम होगा।
  • अधिकांश लेन-देन यूपीआई पर व्यापारियों के लिए निःशुल्क रहेंगे। यदि एमडीआर लागू किया जाता है, तो यह केवल सीमा-आधारित होगा और सभी पर समान रूप से लागू नहीं होगा।
  • संसद की ओर से कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित होने के बाद, जिसमें भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में संशोधन का प्रस्ताव है, एनपीसीआई की अध्यक्षता वाली “यूपीआई और सेवा संचालन समिति” एमडीआर (यदि लागू हो) पर निर्णय लेगी।

भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम में संशोधन क्यों?

भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम (पीएसएस अधिनियम) में हाल ही में किए गए संशोधन से एक संशय पैदा हुआ है, कुछ लोग इसे आम यूजर्स पर शुल्क लगाने की कोशिश के तौर पर गलत व्याख्या कर रहे हैं। वास्तव में, यह संशोधन यूपीआई की दीर्घकालिक स्थिरता, तकनीकी तरक्की और उभरते जोखिमों के प्रति इसके लचीलेपन को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया एक सहायक प्रावधान है।

  • यूपीआई की प्रगति : लेन-देन की मात्रा में तेजी से प्रगति के साथ, सिस्टम को साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम और इंफ्रास्ट्रक्चर में महत्वपूर्ण और लगातार अपग्रेड की आवश्यकता है।
  • बाजार विस्तार : अधिक कंपनियों को अपने कार्यान्वयन का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित करके प्रतिस्पर्धा बढ़ाना जरूरी है, जिसके लिए एक आत्मनिर्भर राजस्व मॉडल की आवश्यकता है।
  • आत्मनिर्भरता : प्रगति के अगले स्तर के लिए केवल सब्सिडी पर निर्भर रहना व्यवहार्य नहीं है। यूपीआई को मजबूत, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बनाए रखने के लिए एक संतुलित फ्रेमवर्क आवश्यक है।

असत्य कहानियों से पैदा हुई चिंता का समाधान

कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह सुझाव दिया गया है कि बाहरी प्रभाव नीतिगत बदलावों पर असर डाल रहे हैं। यह पूरी तरह से निराधार, गलत और भ्रामक है। यदि बाहरी दबाव एक कारक होता, तो सरकार ने वर्ष 2016 में यूपीआई की शुरुआत नहीं की होती और न ही जनवरी 2020 से इसे व्यापारियों और नागरिकों दोनों के लिए निःशुल्क बनाया होता और यह न ही यह सुनिश्चित किया होता कि यह दुनिया की सबसे बड़ी त्वरित समय पर होने वाली अंतरसंचालनीय भुगतान प्रणाली बन जाए।

अतः, इस संशोधन को सरकार के उस व्यापक उद्देश्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसके अंतर्गत भारत के डिजिटल भुगतान अवसंरचना को संपोषित, प्रतिस्पर्धी, नवोन्मेषी और देश की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बनाए रखना है।

सच तो यह है कि यूपीआई भारत का अपना नवाचार है, और सरकार इसे नागरिकों के लिए निःशुल्क बनाए रखने के साथ-साथ आने वाले दशकों तक इसकी स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

प्रगति का अगला कदम

भारत अब डिजिटल भुगतान विकास की अगली लहर के मुहाने पर खड़ा है। यूपीआई को ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में और अधिक विस्तारित करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने के लिए, यूपीआई इकोसिस्टम को आत्मनिर्भर और किफायती होना चाहिए। पीएसएस अधिनियम में संशोधन एक दूरदर्शी कदम है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि यूपीआई एक सुरक्षित, किफायती, समावेशी और विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त भुगतान प्रणाली के रूप में फलता-फूलता रहे।

निष्कर्ष:

भारत सरकार निम्नलिखित बिंदुओं की पुष्टि करती है:

  • यूपीआई नागरिकों के लिए निःशुल्क रहेगा।
  • नागरिकों के दैनिक लेन-देन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।
  • भविष्य में लागू होने वाला कोई भी एमडीआर नाममात्र का होगा और केवल कुछ चुनिंदा व्यापारी लेन-देनों पर ही लागू होगा।
  • यूपीआई भारत का प्रमुख डिजिटल नवाचार बना हुआ है और वैश्विक स्तर पर विस्तार कर रहा है।

वर्ष 2016-17 में लॉन्च होने के बाद से, एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) ने भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को दुनिया के सबसे समावेशी और गतिशील भुगतान प्रणालियों में से एक में बदल दिया है। त्वरित समय पर आपस में संचालन योग्य भुगतान के एक साहसिक प्रयोग के तौर पर शुरू हुई यह व्यवस्था अब एक वैश्विक मानक बन गई है, जो हर महीने बिलियन की संख्या में लेन-देन संसाधित करती है और रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग बन गई है। आज, यूपीआई दुनिया की सबसे बड़ी त्वरित समय वाली भुगतान प्रणाली है, जिसने केवल जुलाई 2026 में ₹29.9 लाख करोड़ के 2,366 करोड़ लेन-देन संसाधित किए। यूपीआई अब 11 विदेशी देशों में भी सक्रिय है, और कई अन्य देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।

यूपीआई भारतीयों की ओर से भारतीयों के लिए बनाई गई एक राष्ट्रीय उपलब्धि है। सरकार ने एक दशक से इसे प्रोत्साहन दिया है, इसके लिए धन उपलब्ध कराया है और इसका विस्तार किया है, और आगे भी ऐसा करती रहेगी। नागरिकों से अनुरोध है कि वे केवल वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक और एनपीसीआई की ओर से जारी की गई आधिकारिक जानकारी पर ही भरोसा करें और असत्यापित जानकारी को आगे न भेजें।

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पीके/केसी/एमएम

(रिलीज़ आईडी: 2296655) आगंतुक पटल : 49