
Patna: बिहार में कोरोना संक्रमण (Coronavirus) के मामले पर सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट (Patna High Court) ने शनिवार को कहा कि सरकारी व निजी अस्पतालों में जरूरतमंदों को समय पर उपचार न दे पाना मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. चीफ जस्टिस संजय करोल व जस्टिस एस कुमार की खंडपीठ ने शिवानी कौशिक व अन्य जनहित मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि सूबे में कोरोना महामारी की विभीषिका को देखते हुए मेडिकल इमरजेंसी लगी है. राज्य सरकार को महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन लगाना पड़ा है. ऐसे में सूबे के सरकारी अस्पताल हों या निजी अस्पताल सबों का कर्तव्य इस समय मरीजों की सेवा करनी है.
साथ ही कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर समेत तमाम मेडिकल कर्मी की जिम्मेदारी भी इस समय काफी अहम हैं, उन्हें भी समर्पित भाव से मरीजों की सेवा करनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि सरकारी एवं निजी अस्पताल द्वारा जरूरतमंद को समय पर चिकित्सा देने में विफलता संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के मौलिक अधिकार) का उल्लंघन माना जाएगा.
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अदालत ने यह भी कहा कि कोरोना की इस विकट घड़ी में चिकित्सक व अन्य कर्मचारी जो चिकित्सा सहायता प्रदान करने में लगे हैं, वे हमारे गार्जियन एंजल (Gaurdian Angel / संरक्षक दूत) हैं. कोर्ट ने एक अपने ही पूर्व के आदेश का जिक्र किया.
पटना हाई कोर्ट ने इससे पहले कोरोना के मामले में शुक्रवार को पंचायती राज विभाग को कहा था कि पंचायत स्तर पर जन प्रतिनिधियों से कोरोना संक्रमण की वजह से होने वाली मौत का आंकड़ा इकट्ठा करें.
हाई कोर्ट ने कहा था कि राज्य में इस महामारी के दौरान मरने वाले लोगों का सही डेटा पंचायती राज विभाग के माध्यम से सरकार जुटा सकती है. सरकार ने इसके लिए विभाग को समय भी दिया और अगली बार सुनवाई में कोर्ट के समक्ष डेटा पेश करने के लिए कहा है.
