
Patna: कोरोना (Corona) काल में जीवन रक्षक माने जाने वाले रेमडेसिवीर (Remdesivir) मेडिसीन पर सवाल उठाते हुए पटना के तीन निजी हॉस्पीटलों ने इसको सैंपल टेस्टिंग के लिए भेजा हैं. बिहार आईएमए (IMA) ने भी माना है कि रेमेडिसिवर कभी जीवन रक्षक दवा नहीं थी और लोगों ने इसके पीछे बेकार पैसे खर्च किए हैं. हलांकि यह दावा नहीं किया गया है कि रेमडेसिवीर की वजह से मौते हुई है.
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कुछ दिन पहले तक बिहार में रेमडेसिवीर मेडिसीन कोरोना मरीजों के लिए संजीवनी बनी हुई थी. आज वहीं, संजीवनी सवालों के घेरे में है. दरअसल पटना के कुछ हॉस्पीटलों ने रेमडेसिवीर मेडिसीन को लेकर ड्रग कंट्रोलर के पास शिकायत की थी. इसके बाद दवा के कुछ बैच के सैंपल सेंट्रल ड्रग लेबोरेटरीज कोलकाता जांच के लिए भेज दिए गए हैं.
पटना के तीन बड़े निजी हॉस्पीटलों ने दवा के साईडइफेक्ट को लेकर अपना कंप्लेन दर्ज कराया था. हॉस्पीटल्स ने ड्रग कंट्रोलर को दवा रिएक्शन के सबूत भी दिए हैं. इसके बाद ड्रग कंट्रोलर ने बिहार में दवा सप्लाई करने वाली सरकारी एजेंसी बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Bihar Medical Services & Infrastructure Corporation Limited) को पत्र लिखा. इसके आधार पर सैंपल जांच के लिए लेबोरेटरी भेज गए हैं.
पटना के एक हॉस्पीटल ने शिकायत की थी कि जाइडस हेल्थ केयर लिमिटेड का 19 वायल इंजेक्शन हॉस्पीटल को मिला था. इसको देने के बाद मरीजों में हाइपर सेंसिटिविटी रिएक्शन देखा गया. उनमें कंपकपी हुई और ऑक्सीजन का स्तर भी गिर गया.
इसके अलावा दूसरे हॉस्पीटल ने भी यही शिकायत की है, दूसरे हॉस्पीटल का दावा है कि उन्होने 8 मरीजों को यही इंजेक्शन दिया. इससे मरीजों में हाइपर सेंसिटिविटी रिएक्शन देखने को मिला और साथ ही तीसरे हॉस्पिटल ने भी सूचना दी कि मरीज में एडवर्स रिएक्शन देखने को मिला है.
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इधर, टीम ने कंप्लेन करनेवाले हॉस्पीटलों से उनके कंप्लेन को लेकर उनकी राय जानने की कोशिश की. लेकिन मामले पर सभी ने चुप्पी साध ली. इस पर बिहार आईएमए के वर्किग प्रेसिडेंट डॉ अजय कुमार कहते हैं कि ‘रेमडेसिवीर मेडिसीन कभी जीवन रक्षक दवा नहीं थी और लोगों ने इस दवा के पीछे कीमत से ज्यादा पैसे बेकार में खर्च किए हैं. आईएमए ने इस बात की पुष्टि काफी पहले कर दी थी.’
डॉ अजय ने कहा कि ‘दवा के जिस साई़़ड इफेक्ट की चर्चा की जा रही है वह स्वाभाविक है. लेकिन मरीज की उससे मौत हो जाए ये संभव नहीं लगता है. हलांकि मामला जांच का विषय है. दवा के किसी बैच में अगर गड़बड़ी आई है, तो यह ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया की गलती है. दवा का हर बैच बिना जांच के बाजार में नहीं आता है. हलांकि यह देखना होगा कि जांच रिपोर्ट में सच क्या आता है.’
अब बड़ा सवाल यह है कि जब रेमडेसिवीर मेडिसीन जीवन रक्षक दवा नहीं थी, तो मरीजों के लिए डाक्टरों ने इसे प्राथमिकता सूची में क्यों रखा. डाक्टरों की डिमांड पर ही मरीजों ने रेमेडिसिवर मेडिसीन को चार गुणी कीमत पर खरीदा. लेकिन अब सबको इंतजार टेस्ट रिपोर्ट का है कि क्या वाकई रेमडेसिवीर मेडिसीन के कारण ही मरीजों को ज्यादा परेशानी हुई है?
