News in Brief

नई दिल्ली: तेलों की बढ़ती कीमतों ने यात्रा से लेकर किचन तक अच्छा-खासा बजट बिगाड़ा है. पेट्रोल की कीमतों ने तो सेंचुरी पूरी कर ली है, लेकिन जायका बढ़ाने वाला सरसों का तेल भी कहां पीछे रहने वाला था. सरसों तेल के भाव ने तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों से सौ फीसदी ज्यादा तरक्की की है. पिछले एक साल में सरसों के तेल ने 140 से 240 रुपये की छलांग लगाई है. 

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो आज से ठीक एक महीने पहले 7 मई को कोल्हू पर 180 रुपये लीटर सरसों का तेल मिल रहा था. जिसका रेट अब बढ़कर 240 रुपये तक पहुंच गया है. पिछले साल यानी 2020 में यहां इसका रेट 140 रुपये लीटर था. 

हालांकि केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने 2020-21 में रिकॉर्ड 9.99 मिलियन टन सरसों के उत्पादन (Mustard Production) का अनुमान लगाया है. जोकि अब तक का सर्वाधिक है. साल 2019-20 में यह 9.12 मिलियन टन था. सरकार तो यह भी कह रही है कि 2015-16 से 2019-20 तक का सरसों का औसत सालाना उत्पादन 8.30 मिलियन टन ही रहा है, लेकिन इस बात का जवाब नहीं दे रही कि जब उत्पादन बढ़ा तो फिर भाव आसमान पर कैसे चढ़े हैं. 

फलों की ‘महारानी’ है नूरजहां, एक फल की कीमत इतनी कि खाली हो जाए जेब

समझिए महंगाई का गणित
अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ का तर्क है कि भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने सरसों तेल में किसी भी अन्य तेल को मिलाने (Blending) पर रोक लगा दी है. तेल में तय मात्रा में अन्य खाद्य तेलों को मिलाने की प्रक्रिया को ब्लेंडिंग कहा जाता है, इससे सरसों तेल की ऑफीशियल मिलावट बंद हो गई है. इससे सरसों के शुद्ध तेल की खपत में तेजी से इजाफा हुआ है. एक लीटर तेल में निकालने में पहले की अपेक्षा ज्यादा सरसों लगता है. 
वहीं कुछ का मानना है कि कोरोना की वजह से लोगों ने सेहत से समझौता करना बंद कर दिया है. वह मिलावटी चीजों की बजाय शुद्ध पर फोकस कर रहे हैं. सरसों तेल की गुणवत्ता अच्छी होती है, इसलिए डिमांड बढ़ी है. डिमांड बढ़ने से भाव बढ़ते हैं, जबकि तीसरी वजह इंटरनेशनल मार्केट है. अब पेट्रोल-डीजल की तरह ही खाद्य तेलों का रेट इंटरनेशनल मार्केट में तय हो रहा है. इसलिए इसका दाम बेकाबू हैं.

इसको लेकर सरकार के अपने दावे हैं. सरसों अनुसंधान केंद्र की मानें तो 20-25 साल पहले पूर्वांचल में भी सरसों की खेती (Mustard farming) होती थी. लेकिन अब ज्यादातर किसान गेहूं की फसल पर शिफ्ट हो गए. इससे सरसों का उत्पादन अब कम हो गया है. लेकिन अब सरसों का अच्छा दाम मिल रहा है तो शायद वे गेहूं की बजाय सरसों पर फिर से शिफ्ट हो जाएं.

मोदी सरकार का फोकस
खाद्य तेलों के आयात को कम करने के लिए सरकार ने केंद्र राष्ट्रीय तिलहन मिशन (National Oil Seed Mission) शुरू किया है. इस पर पांच साल में करीब 19,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे. सरकार 14 मिलियन टन सरसों उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने के लिए काम कर रही है. भारत सालाना करीब 70,000 करोड़ रुपए का खाद्य तेल आयात करता है.

क्या है तेल का खेल
– जानकारों की मानें तो एक क्विंटल सरसों में औसतन 36 लीटर तेल निकलता है.
– सरसों का औसत दाम 7500 रुपये क्लिंटल चल रहा है.
– इस तरह शुद्ध तेल का दाम 208 रुपये प्रति लीटर होगा.
– इस पर पेराई करने वाला अपना मुनाफा जोड़ेगा.
– एक क्विंटल सरसों में करीब 60 किलो खली निकलेगी.
– करीब 1320 रुपये की खली होगी.
– इससे कोल्हू, ट्रांसपोर्टेशन और मार्केटिंग का खर्च निकल जाएगा.

WATCH LIVE TV