
How does F-35 Fighter Plane Fight: अमेरिका के एफ-35 फाइटर जेट की इन दिनों दुनिया में काफी चर्चा हो रही है. अमेरिका का दावा है कि यसिर्फ एक लड़ाकू विमान नहीं बल्कि उड़ता हुआ सुपरकंप्यूटर है. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम लगा होता है. जो दुश्मन की पहचान कर तुरंत बता देता है कि किस लक्ष्य पर कौन-सा हथियार इस्तेमाल करना सबसे बेहतर रहेगा. खास बात यह है कि सिस्टम सुझाव जरूर देता है, लेकिन आखिरी फैसला हमेशा पायलट के हाथ में ही रहता है.
खतरे का करता है आंकलन
सहयोगी वेबसाइट WION के मुताबिक, एफ-35 में एक खास थ्रेट इवैल्यूएशन सिस्टम लगा होता है. वह हवा में उड़ते वक्त हर दुश्मन लक्ष्य को 0 से 1 के बीच एक नंबर देता है. यह नंबर बताता है कि वह लक्ष्य कितना खतरनाक है. जिसका जितना ज्यादा नंबर होता है, वह उतना बड़ा खतरा. यह सिस्टम दुश्मन की रफ्तार, दूरी, ऊंचाई, विमान की तरफ आने की गति और उसकी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता जैसी कई चीजों को ध्यान में रखता है. इसके बाद विमान का कंप्यूटर तय करता है कि सबसे पहले किस खतरे से निपटना जरूरी है.
सभी सेंसरों का एक साथ इस्तेमाल
एफ-35 की सबसे बड़ी ताकत उसका “सेंसर फ्यूजन” सिस्टम है. इसमें रडार, इंफ्रारेड, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से जुड़ी सारी जानकारी मिलकर एक ही स्क्रीन पर आ जाती है. इसका मतलब यह है कि पायलट को अलग-अलग स्क्रीन देखने की जरूरत नहीं पड़ती. AN/APG-81 AESA रडार दुश्मन को दूर से पकड़ लेता है. वहीं डिस्ट्रिब्यूटेड अपर्चर सिस्टम इंफ्रारेड के जरिए चारों तरफ नजर रखता है. इससे पायलट बहुत जल्दी फैसला ले पाता है.
दूर से हमला करने के लिए AMRAAM मिसाइल
अगर दुश्मन काफी दूर है और आंखों से दिखाई नहीं दे रहा तो एफ-35 आमतौर पर AIM-120 AMRAAM मिसाइल चुनता है. यह रडार से निर्देशित मिसाइल होती है और 100 मील से भी ज्यादा दूरी तक मार कर सकती है. एफ-35 में ऐसी चार मिसाइलें अंदर की तरफ लगी होती हैं, जिससे विमान रडार में कम नजर आता है. इन मिसाइलों से तेज रफ्तार और तेजी से मुड़ने वाले दुश्मन विमानों पर भी हमला किया जा सकता है.
नजदीकी लड़ाई में साइडवाइंडर मिसाइल
जब दुश्मन सामने दिखाई देने लगता है और दूरी 20 मील से कम हो जाती है, तब एफ-35 AIM-9X साइडवाइंडर मिसाइल का इस्तेमाल करता है. यह इंफ्रारेड आधारित मिसाइल होती है, जो दुश्मन के इंजन की गर्मी पकड़कर उसे निशाना बनाती है. बादल हों या इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, इस पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. ये मिसाइलें विमान के पंखों पर लगी होती हैं.
आखिरी विकल्प के रूप में तोप का इस्तेमाल
अगर सारी मिसाइलें खत्म हो जाएं या लड़ाई बेहद नज़दीक पहुंच जाए, तो एफ-35 अपनी 25 मिमी की तोप का इस्तेमाल करता है. इसमें 182 गोलियां होती हैं. यह विकल्प सिर्फ बेहद जरूरी हालात में ही अपनाया जाता है और इसे पूरी तरह पायलट कंट्रोल करता है.
दुश्मन नजदीक हो तो देता है ये सलाह
सिस्टम यह भी देखता है कि कोई दुश्मन इतना नज़दीक तो नहीं आ गया कि उससे बच पाना मुश्किल हो जाए. अगर ऐसा है, तो विमान पहले बचाव की सलाह देता है, जैसे दिशा बदलना या तेज मोड़ लेना. अगर खतरा कम हो, तो सिस्टम अनावश्यक हरकतों से बचने को कहता है.
दुश्मन को जेट लॉक नहीं करने देता
कई बार मिसाइल चलाने से बेहतर होता है दुश्मन के रडार को जाम करना. एफ-35 का सिस्टम यह तय करता है कि जैमिंग ज्यादा असरदार होगी या हथियार. इसका AESA रडार अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बदलकर दुश्मन को लॉक-ऑन नहीं करने देता.
दुश्मन को नहीं देता संभलने का मौका
पायलट के हेलमेट पर ही लक्ष्य की जानकारी, खतरे की रैंकिंग और सुझाया गया हथियार दिख जाता है. फिर भी फायर करने का अधिकार पूरी तरह पायलट के पास रहता है. वह चाहें तो सिस्टम की सलाह को बदल भी सकता हैं. एफ-35 ‘खोजो, पहचानो, ट्रैक करो, निशाना लगाओ और असर देखो’ की पूरी प्रक्रिया कुछ ही मिनटों में पूरी कर लेता है. इससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता.
