Libya Army Chief Death: लीबिया के प्रधानमंत्री अब्दुल हामिद दबीबा ने कहा कि लीबिया के चीफ ऑफ स्टाफ, मोहम्मद अली अहमद अल-हद्दाद और चार अन्य लोग तुर्की की राजधानी अंकारा के पास एक विमान दुर्घटना में मारे गए. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री दबीबा ने इसे एक दुखद दुर्घटना बताया, जिसमें कहा गया कि यह दुर्घटना मंगलवार को हुई जब अधिकारी तुर्की की यात्रा से लौट रहे थे. उन्होंने बयान में कहा,’यह बड़ी त्रासदी देश, सैन्य प्रतिष्ठान और सभी लोगों के लिए एक बड़ा नुकसान है, क्योंकि हमने ऐसे लोगों को खो दिया है जिन्होंने ईमानदारी और समर्पण के साथ अपने देश की सेवा की और अनुशासन, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का उदाहरण थे.’
उन्होंने कहा कि दुर्घटना में मारे गए अन्य लोग ग्राउंड फोर्सेज के चीफ ऑफ स्टाफ, अल-फितौरी घरिबिल, मिलिट्री मैन्युफैक्चरिंग अथॉरिटी के निदेशक, महमूद अल-कतावी, अल-हद्दाद के सलाहकार, मुहम्मद अल-असावी दियाब और एक सैन्य फोटोग्राफर, मुहम्मद उमर अहमद महजूब थे. एक वरिष्ठ तुर्की अधिकारी ने कहा कि दुर्घटना में तीन चालक दल के सदस्य भी मारे गए और कहा कि विमान ने बिजली की खराबी की सूचना देने के बाद आपातकालीन लैंडिंग का अनुरोध किया था, जैसा कि अल जजीरा ने बताया.

42 साल गद्दाफी ने किया शासन
लीबिया उत्तरी अफ्रीका में भूमध्य सागर के किनारे मौजूद तेल‑समृद्ध देश है, जिसकी राजधानी त्रिपोली है. 1969 से 2011 तक यहां कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की तानाशाही चली, जो लगभग 42 साल तक सत्ता में रहा. हालांकि 2011 में अरब स्प्रिंग की लहर के साथ लीबिया में भी गद्दाफी के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए, जो जल्द ही गृह युद्ध में तबदील हो गए. संयुक्त राष्ट्र के मैनडेट के तहत नाटो देशों ने गद्दाफी की सेना पर हवाई हमले किए, विद्रोहियों ने लड़ाई जारी रखी और अक्टूबर 2011 में गद्दाफी मारा गया और उसकी सरकार खत्म हो गई.
गद्दाफी की मौत के बाद और बिगड़े हालात
गद्दाफी खात्मे के बाद लीबिया में समस्याएं पहले भी ज्यादा खतरनाक होती चली गईं. गद्दाफी के दौर में सारी सत्ता उनके हाथ और कुछ नजदीकी सर्किल में केंद्रिय थी, इसलिए राज्य की संस्थाएं (फौज, प्रशासन, न्याय व्यवस्था) कमजोर और निजी वफादारी पर आधारित थीं. गद्दाफी हटते ही सत्ता का बड़ा खालीपन बना, दर्जनों स्थानीय मिलिशिया, कबीलों और धार्मिक‑राजनीतिक समूहों ने अलग‑अलग इलाकों पर कंट्रोल करना शुरू कर दिया.
लीबिया के दो बड़े पॉवर सेंटर
2014 के बाद से हालात यह हो गए कि पश्चिमी लीबिया में त्रिपोली आधारित सरकार और पूर्वी लीबिया में बेंगाजी/टूब्रुक क्षेत्र से चलने वाली समानांतर सत्ता, दोनों खुद को वैध मानती रहीं. पश्चिम में आज की मुख्य सरकार गवर्नमेंट ऑफ नेशनल यूनिटी (GNU) त्रिपोली से काम करती है, जबकि पूर्व में House of Representatives (HoR), उससे जुड़ा ढांचा, खलीफा हफ्तर और उनकी सेनाओं के प्रभाव में है.
युद्ध रुके लेकिन नहीं बनी आपसी सहमति
2014 में इन दोनों के बीच मौजूद विवाद गृहयुद्ध में बदल गए. 2019 में खलीफा हफ्तर ने त्रिपोली पर चढ़ाई भी की, जिससे भारी तबाही मची और बड़ी तादाद में लोगों को विस्थापन भी झेलना पड़ा. अंतरराष्ट्रीय दबाव और संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों से 2020 में एक देशव्यापी युद्धविराम हुआ, जिसे औपचारिक रूप से आज भी मान्यता है, पर संघर्ष और झड़पें समय‑समय पर भड़कती रहती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव, इकट्ठी सेना और साझा संविधान जैसी चीजों पर सहमति नहीं बन पाई, इसलिए राजनीतिक प्रक्रिया बार‑बार रुक जाती है और शासन एक तरह के ‘लंबे ट्रांज़िशन’ में फंसा है.
आम लोगों को होती है भारी परेशानी
लगातार अस्थिरता के कारण बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसी बुनियादी सेवाएं प्रभावित हैं, जबकि देश की बड़ी आमदनी तेल से आती है जो अक्सर राजनीतिक खींचतान में फंस जाती है. मानवीय स्थिति नाजुक है, कई इलाकों में लोगों को सुरक्षा, इंसाफ और नियमित सेवाए नहीं मिल पातीं और प्रवासी‑शरणार्थी तो खास तौर पर हिंसा, हिरासत और तस्करी का शिकार होते हैं.
तुर्की और पाकिस्तान का दखल
हालांकि बाद सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि लीबिया खुद अंदर से कमजोर है ऐसे में बाहरी ताकतें भी खुद का वर्चस्व वहां जमाने में लगी हुई हैं. इसमें तुर्की और पाकिस्तान का नाम भी शामिल है. तुर्की लीबिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना चाहता है, भूमध्य सागर में ताकत बढ़ाना, तेल और पुनर्निर्माण के ठेके, अपनी पसंद की सरकार को गहरा समर्थन रखता है. इसके अलावा पाकिस्तान लीबिया के एक गुट को अरबों डॉलर के हथियार बेच रहा है. साथ ही अफ्रीका और मिडिल ईस्ट में डिफेंस मार्केट खोलना चाहता है. दिलचस्प बात यह भी है कि जिस समय लीबिया के आर्मी चीफ की हादसे में मृत्यु हुई उस समय पाकिस्तान आर्मी चीफ आसिम मुनीर खुद लीबिया में मौजूद थे.
