Why Ayatollah Khamenei appeared: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई शनिवार को एक बार फिर सार्वजनिक तौर पर दुनिया के सामने आए. खामेनेई ने अपने आवास पर एक सभा का आयोजन किया था जिसमें ईरान के वरिष्ठ नेता और सैन्य कमांडर शामिल हुए थे. इस सभा में खामेनेई ने ट्रंप को जमकर ललकारा. 

खामेनेई के शब्द और सभा में गूंजती आवाजें साफ-साफ बता रही हैं कि ईरान पर ट्रंप की धमकियां असर नहीं डाल पाई. आखिर खलीफा पर ट्रंप की चेतावनी का कोई असर क्यों नहीं हुआ. ट्रंप की धमकी उन्हें क्यों नहीं डरा पाई. इस मुद्दे का भी हम विश्लेषण करेंगे लेकिन उससे पहले ये समझना जरूरी है कि ईरान में अयातुल्ला खामेनेई के ऐसे सार्वजनिक आयोजन के क्या मायने होते हैं.

खामेनेई के बाहर आने के मायने

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ईरान में माना जाता है कि जब-जब खामेनेई जीत जाते हैं तो वो देश के लोगों के सामने आते हैं. अक्टूबर 2024 में ईरान ने इजरायल पर बैलेस्टिक मिसाइलों से बड़ा हमला किया था. इस हमले के बाद 4 अक्टूबर को खामेनेई ने जनता के साथ जुमे की नमाज पढ़ी थी. 

इसी तरह इजरायल से 13 दिन तक लगातार लड़ने के बाद 5 जुलाई 2025 को खामेनेई ने सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था. अब ट्रंप ने ईरान पर हमले का प्लान टाल दिया है तो एक बार फिर  खामेनेई सामने आए और अमेरिका को दोषी करार दे दिया. इसका मतलब ये निकाला जा रहा है कि अमेरिका के साथ पैदा हए तनाव में भी खामेनेई को जीत हासिल हुई है.

इस सार्वजनिक सभा के जरिए खामेनेई ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है. माना जा रहा है कि खामेनेई इस वक्त जिन चुनौतियों से जूझ रहे हैं, उनसे निपटने के लिए ऐसा सार्वजनिक संबोधन जरूरी हो गया था. अब हम आपको खामेनेई रिटर्न्स से जुड़े इसी एजेंडा की जानकारी देने जा रहे हैं.

यूएस-इजरायल क्यों नहीं कर पा रहे हमला?

दरअसल खामेनेई ने इस सभा से अपने समर्थकों को ये पैगाम दिया है कि इस्लामिक शासन को खत्म करने की जो कोशिशें हो रही हैं वो कामयाब साबित नहीं हुई हैं. खामेनेई के शब्दों ने ईरान की सेना को ये संदेश दिया है कि उसे किसी सीमित या बड़े टकराव के लिए तैयार रहना होगा. सबसे बड़ा संदेश रजा पहलवी जैसे अमेरिकी कठपुतलियों को दिया गया है. खामेनेई ने ये बता दिया है कि ईरान में बगावत की जो प्लानिंग वॉशिंगटन में की गई. वो उसे कामयाब नहीं होने देंगे.

डिफेंस एक्सपर्टों के मुताबिक, इजरायल जैसे अमेरिका के मित्र देशों के अंदर ईरान की मिसाइल पावर का डर बैठा हुआ है. ये भी एक वजह है जिसके बलबूते खामेनेई सीधे-सीधे ट्रंप को ही दोषी ठहरा रहे हैं. खामेनेई के पास इन मिसाइलों से अलग एक ऐसा तुरुप का इक्का है जो ट्रंप के हितों को बड़े जख्म दे सकता है. खामेनेई का ये हथियार हैं ईरान समर्थित वो हथियारबंद आतंकी गुट जिन्होंने हाल के दिनों में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. ईरान के ये बारूदी प्यादे इन दिनों क्या कर रहे हैं. ये आपको भी बेहद गौर से समझना चाहिए.

इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद की साप्ताहिक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान समर्थित हिज्बुल्ला को  दोबारा हथियारों की खेप मिलनी शुरु हो गई हैं. इजरायली आंकलन के मुताबिक हिज्बुल्ला को हथियारों की जो खेप मिली हैं उनमें बड़ी तादाद में ईरान की फतेह-110 मिसाइल शामिल हैं. अगर हिज्बुल्ला सक्रिय हुआ तो इजरायल की दिक्कतें बढ़ेंगी. 

अपने प्रॉक्सीज को ईरान ने किया एक्टिव

दूसरी तरफ यमन के हूती आतंकियों ने लाल सागर के नजदीक दोबारा सैन्य तैनाती शुरु कर दी है ताकि गाजा युद्ध की ही तरह एक बार फिर समंदर के इस हिस्से को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया जाए. ये तैयारियां बताती हैं कि सिर्फ प्रत्य़क्ष नहीं बल्कि परोक्ष रूप से भी खामेनेई ने ये तय कर लिया है कि वो ट्रंप के आगे झुकेंगे नहीं.

जिस तरह ट्रंप ने ईरान में फैले असंतोष को अपना हथियार बनाया था. ठीक उसी तर्ज पर खामेनेई ने भी अमेरिका में ट्रंप विरोधी लहर को समझ लिया है. यानी ट्रंप के खिलाफ अमेरिका में जो माहौल है उसकी नब्ज भी खामेनेई ने पकड़ ली है. ये भी एक वजह है जिसकी वजह से ट्रंप की धमकियां खामेनेई पर बेअसर साबित हुईं. ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी क्या सोचते हैं. ये आपको भी जानना चाहिए.

ईरान पर हमले पर क्या सोच रहे अमेरिकी?

अमेरिका में हुए एक सर्वे के अनुसार 70 प्रतिशत मतदाता ईरान पर अमेरिकी हमले को सही नहीं मानते हैं.सिर्फ 18 प्रतिशत ऐसे हैं जो ऐसी सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं. अगर ट्रंप के समर्थक यानी रिपब्लिकन मतदाताओं की बात करें तो इनमें भी 53 प्रतिशत ट्रंप के बैटल प्लान से सहमत  नहीं  हैं. 35 प्रतिशत रिपब्लिकंस का कहना है कि ईरान पर संभावित हमला सही है.

ट्रंप ने खामेनेई पर दबाव बनाने के लिए दोहरी रणनीति बनाई थी. एक तरफ वो मिडिल ईस्ट में ईरान विरोधी देशों को भड़का रहे थे. दूसरी तरफ ट्रंप ईरान के बागियों को उकसा रहे थे लेकिन यहां भी ट्रंप का दांव चल नहीं पाया.

सऊदी-यूएई भी ट्रंप के प्लान से सहमत नहीं 

सऊदी अरब और UAE जैसे ईरान विरोधी अरब देशों ने ही अमेरिका को खामेनेई की सरकार और सिस्टम पर हमला ना करने की नसीहत दे दी थी. सऊदी अरब ने तो ईरान को ये आश्वासन तक दे दिया था कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो सऊदी अरब हमलों के लिए अपने हवाई अड्डे नहीं देगा.

यानी जिस अरब जगत में ट्रंप फूट डालने की सोच रहे थे वो अरब जगत भी ट्रंप के सामने बिखरा नहीं. एक कहावत है…मियां का जूता मियां के सर..शायद ईरान के मामले में ट्रंप के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है.