
DNA Analysis: अपने मोहल्ले में या इलाके में किसी ऐसे शख्स को जरूर देखा होगा, जो सबसे लड़ता रहता है. वो सड़क पर निकलता होगा तो किसी को भी धक्का मार देता होगा. दोस्त-दुश्मन सबके साथ उलझना, लड़ना, उसके DNA में शामिल होगा. आजकल अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की स्थिति ऐसी ही है. वो अपने टशन में इतने चूर हैं कि दुश्मनों के साथ-साथ दोस्त को भी धक्का मारने लगे हैं. जो दोस्त अमेरिका के लिए जान छिड़कता है, उससे भी टकराने का बहाना खोजते हैं.
इस बार उन्होंने अपने मित्र देश इजरायल को टक्कर मारी है. इसके बारे में हम आपको आगे विस्तार से बताएंगे, लेकिन पहले समझिए कि कैसे ट्रंप.. अब इजरायल से दुश्मनी मोल ले रहे हैं. और इस दुश्मनी की वजह है आयरन डोम मिसाइल और पाकिस्तान. आपको ट्रंप के उस बयान को बहुत ध्यान से समझना चाहिए, जिसमें उन्होंने इजरायल की लाइफ लाइन माने जाने वाले आयरन डोम पर ऐसा दावा किया, जिसे इजरायल के आत्मसम्मान पर चोट कहा जा रहा है.
डोनाल्ड ट्रंप ने आयरन डोम पर क्या कहा?
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि आयरन डोम इज़रायल की तकनीक नहीं..बल्कि अमेरिका की तकनीक है…जिसे अमेरिका ने इज़रायल के लिए विकसित किया. ट्रंप आरोप लगा रहे हैं… इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू इसे इज़रायल की तकनीक की तरह पेश करते हैं. ट्रंप से सीधे नेतन्याहू से कहा है..इसका क्रेडिट लेना बंद करें. आज से पहले भी आपने कई बार आयरन डोम का जिक्र सुना होगा. 2011 से लेकर 2026 तक इज़रायल पर 10 हजार से ज्यादा रॉकेट इज़रायल की तरफ दागे गए हैं… अगर ये आबादी पर गिरते तो नरसंहार तय था. लेकिन Iron Dome जिसकी सफलता दर 85 से 90% है. उसने ज्यादातर रॉकेट हमले नाकाम किया. आयरन डोम केवल रॉकेट नहीं गिराता बल्कि इज़रायल में होने वाले पैनिक, पलायन और अराजकता को भी रोका. इसीलिए इज़रायल अपने इस डिफेंस सिस्टम पर बहुत गर्व करता है.. लेकिन डॉनल्ड ट्रंप ने दावोस से दो मिनट में इजरायल के इस गर्व को चकनाचूर कर दिया. आज आपको भी जानना चाहिए…ट्रंप के दावों का सच क्या है ? और क्यों डॉनल्ड ट्रंप की बात इज़रायल को बुरी लगी है.
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आयरन डोम पर जानिए पूरी सच्चाई
- आयरन डोम इज़रायल की तकनीक है, इसे राफेल, IAI और mPrest जैसी इज़रायली कंपनियों ने डिज़ाइन और विकसित किया.
- 2006 के लेबनान युद्ध में हिजबुल्लाह ने इज़रायल पर 4000 रॉकेट दागे.. जिसके बाद इज़रायल में ऐसे रॉकेट हमलों को रोकने वाले सिस्टम को बनाने प्रेरणा मिली.
- 2007 में इसे बनाने का काम शुरू हुआ. और 2008 ये 2010 तक इसका परीक्षण किया गया
- इसमें इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्री ने राडार और डिजायन बनाने का काम किया
- इज़रायल की सॉफ्टवेयर कंपनी mPrest ने युद्ध के दौरान इस्तेमाल होने वाला कंट्रोल सिस्टम तैयार किया.
- और इज़रायल की सरकारी रक्षा कंपनी राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम ने इसको एसेंबल किया. यानी राफेल इसकी मुख्य ठेकेदार थी.
- अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें अमेरिकी की एंट्री कहां से हो गई… तो अमेरिका का आयरन डोम की तकनीक में कोई योगदान नहीं..बल्कि आयरन डोम के इंटरसेप्टर रॉकेटों की खरीद के लिए अमेरिका ने फंडिग दी थी.
- इसके बाद जब 2011 में आयरन डोम इज़रायल की सेना में शामिल हो गया तो अमेरिकी रक्षा कंपनी रैथियॉन जो अब RTX कॉर्पोरेशन कहलाती है. उसे आयरन डोम की इंटरसेप्टर मिसाइलों के उत्पादन में शामिल किया गया
- वर्ष 2014 में अमेरिकी कंपनी रैथियॉन को आयरन डोम में इस्तेमाल होने वाली तामीर मिसाइलों के निर्माण के लिए 149 मिलियन डॉलर का अनुबंध दिया गया.
अमेरिका ने केवल फंडिंग की है
यानी अमेरिका ने सिर्फ मिसाइलों के लिए फंडिंग की…लेकिन दावोस में डॉनल्ड ट्रंप ने दुनिया को बता दिया. आयरन डोम अमेरिका ने इज़रायल की रक्षा के लिए बनाया और नेतन्याहू इसका क्रेडिट ले रहे हैं. वैसे ट्रंप कभी युद्ध खत्म करवाने का क्रेडिट लेते हैं. कभी दुनिया में शांति का क्रेडिट लेते हैं. भारत और पाकिस्तान के संघर्ष के दौरान जितनी मिसाइलें नहीं चली होंगी, उससे ज्यादा बार ट्रंप इस युद्ध को खत्म करवाने का क्रेडिट ले चुके हैं. और भारत से इसलिए खफा हैं..क्योंकि भारत…पाकिस्तान की तरह उनको झूठा क्रेडिट नहीं देता. लेकिन आयरन डोम का क्रेडिट लेने वाले ट्रंप के बयान से इज़रायल बहुत खुश नहीं होगा. वैसे इज़रायल की अमेरिका से नाराजगी की एक और वजह है. डॉनल्ड ट्रंप के गाजा के लिए बनाए बोर्ड आफ पीस में पाकिस्तान ने शामिल होने के लिए हां कर दी है.
इजरायल को नराज करने वाला एक और कदम
अमेरिकी कूटनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर ने कहा था अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन अमेरिका का दोस्त होना घातक साबित होता है.हर दुख सुख में अमेरिका के साथ रहने वाले इजरायल के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी घातक साबित हो रहे हैं. इजरायल को नाराज करने वाली एक और तस्वीर आज दावोस से आई. इस तस्वीर को भी आज आपको बहुत ध्यान से देखना चाहिए. इस वीडियो में आपको पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के साथ बैठे दिखाई दे रहे हैं. यहां पर गाजा के लिए बनाए गए बोर्ड आफ पीस में शामिल हो रहे देश समझौते पर साइन कर रहे हैं. आज शहबाज शरीफ ने भी इन दस्तावेजों पर साइन किया. और इस तरह पाकिस्तान औपचारिक रूप से ट्रंप के बोर्ड आफ पीस में शामिल हो गया. लेकिन इससे इज़रायल खुश नहीं होगा. पाकिस्तानी मीडिया..परमाणु बम रखने वाले दुश्मन देश के सैनिकों की गाजा में मौजूदगी को पागलपन कह चुका है. लेकिन ट्रंप आज बोर्ड आफ पीस में पाकिस्तान को शामिल करवाते वक्त बहुत खुश दिखे. आज आपको भी जानना चाहिए, ये खुशी इजरायल को क्यों रास नहीं आ रही है.
क्या हैं वह वजहें?
- पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी इज़रायल के लिए सीधा सुरक्षा खतरा है, क्योंकि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है.
- पाकिस्तान के आतंकी संगठनों लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद से गाजा के आतंकी संगठन हमास से वैचारिक और ऑपरेशनल रिश्ते माने जाते हैं.
- पाकिस्तानी फौज गाजा में आई, तो हमास को ‘आतंकी’ से ‘राजनीतिक पक्ष’ बनने का मौका मिलेगा…क्योंकि अगर पाकिस्तान की फौज हमास के नियंत्रण वाले इलाके में जाती है तो दोनों मिलकर काम कर सकते हैं और यही इज़रायल किसी भी कीमत पर नहीं चाहता.
- इसके अलावा गाजा में मुस्लिम देशों की फौज आने से क्षेत्रीय ताकतों का दखल बढ़ेगा और गाजा में इज़रायल का सुरक्षा नियंत्रण कमजोर होगा.
- वहीं पाकिस्तान की छवि ऐसे फिलिस्तीन समर्थक देश की है. जिसने आज तक इज़रायल को मान्यता नहीं दी है. और इजरायल से नफरत करने वाला देश अब इजरायल के सिर पर मौजूद रहेगा.
यही वजह है कि बेंजामिन नेतन्याहू चाहते थे पाकिस्तान और तुर्किए जैसे इज़रायल विरोधी देशों को गाजा में एंट्री नहीं दी जाए. उन्होंने कहा भी था कि इन दोनों देशों को गाजा में पैर नहीं रखने देंगे. लेकिन ट्रंप..इनसे हस्ताक्षर करा रहे हैं. जिस देश का रक्षा मंत्री इज़रायल के प्रधानमंत्री को अगवा करने की योजना नेशनल टीवी पर बैठकर बना रहा है. जो देश इज़रायल को सबसे बड़ा दुश्मन मानता है. उस देश की सेना गाजा में जा रही है. इज़रायल के बॉर्डर पर तैनात होने वाली है. और ये सब कुछ अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की वजह से हो रहा है.
इजरायल को लेकर ऐसा हैरान करने वाला दावा
जैसा कि हमने विश्लेषण की शुरुआत में ही आपको बताया, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं… जिसे ट्रंप टक्कर ना मार रहे हों..जिससे लड़ने की कोशिश ना कर रहे हों. ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण करवा लिया. कनाडा पर कब्जे का खुलेआम एलान कर दिया. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को धमकाया. ब्रिटेन..अमेरिका का बड़ा सहयोगी है..लेकिन ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप..ब्रिटेन को धमकाने से भी नहीं चूके….फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के चश्मे पर मजाक उड़ाया..उनको भी 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी. डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन से कहा ग्रीनलैंड छीन लेंगे और जरूर छीन लेंगे. ट्रंप ईरान पर हमले की लगातार धमकी दे ही रहे हैं. और अब तो ईरान की तरफ सेना भी भेज रहे हैं. यानी खलीफा को भी टक्कर मार रहे हैं. लेकिन जो कुछ उन्होंने नेतन्याहू के साथ किया वो सबसे ज्यादा हैरान करने वाला है. क्योंकि ट्रंप..नेतन्याहू को भी टक्कर मारेंगे…इसकी उम्मीद दुनिया में किसी को नहीं थी. ट्रंप ने पुतिन और जिनपिंग को भी धमकाया है. लेकिन वहां से उनको बराबर की टक्कर मिल रही है. इनसबके बीच दुनिया में पकिस्तान ही ऐसा मुल्क है जो ट्रंप के सामने दंडवत बैठा है. जो ट्रंप कह रहे हैं..चुपचाप मान रहा है.
पीस बोर्ड में 60 देशों को मिला निमंत्रण
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बोर्ड आफ पीस में शामिल होने के दुनिया के 60 देशों को आमंत्रित किया. आज जब दावोस में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बोर्ड आफ पीस को लॉन्च किया…तो लगभग 20 देश इसमें साइन करने के लिए मौजूद थे. भारत..रूस समेत ज्यादातर यूरोपीय देश इस समारोह में शामिल नहीं हुए…लेकिन 8 मुस्लिम देशों ने बोर्ड आफ पीस में शामिल होने के लिए हामी भरी…पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत सऊदी अरब, कतर, UAE,अजरबैजान, इंडोनेशिया और बहरीन के नेता इस समारोह में मौजूद रहे….लेकिन गाजा में अमेरिका के पीस प्लान में शामिल होने को अब मुस्लिम देशों के सरेंडर के तौर पर देखा जा रहा है. आज आपको इसकी वजह भी समझनी चाहिए.
- इन 8 मुस्लिम देशों ने फिलिस्तीनी नेतृत्व या जनता से सलाह लिए बिना योजना पर सहमति दी. यानी जिनके भविष्य का सवाल है, वही बाहर रखे गए.
- गाजा पर निर्णय लेने वाले बोर्ड के सदस्य वो विशेषज्ञ हैं..जिनको अमेरिका ने चुना है यानी फिलिस्तीनियों के पास खुद के लिए बोलने की शक्ति नहीं.
- गाजा बोर्ड ऑफ पीस योजना में इस बात का जिक्र नहीं है…कि फिलिस्तीन राज्य बनेगा या नहीं…उसकी राजधानी क्या होगी ? शरणार्थियों को यहां पर लौटने का अधिकार होगा या नहीं. इसलिए कहा जा रहा है मुस्लिम देश गाजा के राजनीतिक समाधान की बजाय प्रबंधन की योजना में शामिल हुए हैं.
- इस योजना में हमास से हथियार छीनने की तैयारी है..पाकिस्तान जैसे देशों की फौज गाजा में ये काम करेगी. लेकिन इस योजना में गाजा और वेस्ट बैंक से इजरायली कब्ज़ा हटाने की बात नहीं है. यानी दबाव एकतरफा है.
- इसके अलावा इज़रायल ही तय करेगा कौन गाजा के अंदर जाएगा कौन बाहर जाएगा. कब यहां पर लोगों को मदद दी जाएगी इसलिए कहा जा रहा है कि सत्ता नाम की बदलेगी, हकीकत में नहीं.
- गाजा में पुनर्निर्माण के लिए अरब और मुस्लिम देश अरबों डॉलर देंगे. लेकिन बॉर्डर कंट्रोल इज़रायल के पास रहेगा यानी व्यापार, आवाजाही उसी के हाथ में होगी.
कुल मिलाकर सच्चाई ये है..इस डील पर साइन करवाकर अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने मुस्लिम देशों की मजबूरी का फायदा उठाया है. सउदी, यूएई और कतर जैसे देश अमेरिका से रिश्ते की वजह से दबाव मे हैं. तुर्किए पर नेटो के सदस्य होने का दबाव है. वहीं पाकिस्तान IMF, कर्ज़ और आर्थिक संकट से घिरा हुआ है. यानी इन मुस्लिम देशों के पास हां करने के अलावा कोई चारा ही नहीं था. और इसीलिए इसे मुस्लिम देशों का अमेरिका के सामने सरेंडर कहा जा रहा है.
गाजा को लेकर क्या है ट्रंप का प्लान?
हम आपको इससे पहले विस्तार से बता चुके हैं. किस तरह डॉनल्ड ट्रंप गाजा को एक रिवेरा यानी समुद्र के किनारे फैला हुआ खूबसूरत, विकसित और टूरिज्म वाला इलाका बनाना चाहते हैं. और मुस्लिम देशों की मदद और डॉलर्स से ट्रंप ऐसा कर भी लेंगे.. लेकिन ये मुस्लिम देश जिस फिलिस्तीन की लड़ाई 70 साल से लड़ने की बात कर रहे हैं… उसका क्या होगा… गाजा में रह रहे फिलिस्तीनियों का क्या होगा. इस सवाल से अमेरिकी दबाव में समझौता कर लिया गया है. लेकिन इसका जवाब इन मुस्लिम देशों को अपने लोगों को देना होगा. सबसे बुरी हालत तो पाकिस्तान की होगी. जिसके नेता खुद इस डील में साइन करने के लिए उपस्थित थे. वैसे ये भी बहुत बड़ा मजाक है. दुनिया में आतंक के एक्सपोर्टर मुल्क पाकिस्तान को अमेरिका ने शांति लाने वाले बोर्ड में शामिल किया है.
पाकिस्तानी पीएम के हेड हैं मुनीर?
इस समझौते पर साइन करने के लिए शहबाज शरीफ अपने बॉस यानी पाकिस्तान की आतंकी सेना के चीफ आसिम मुनीर के साथ दावोस पहुंचे. एक मुल्क के प्रधानमंत्री का बॉस उसकी सेना का प्रमुख है. और शहबाज शरीफ आजकल मुनीर से बिना पूछे कोई काम नहीं करते. और दुनिया के सामने इस बात को स्वीकार करने में भी उनको कोई परेशानी नहीं. आज बोर्ड आफ पीस लॉन्चिंग के समारोह में भी एक शर्मनाक तस्वीर दिखाई दी. शहबाज से बोर्ड आफ पीस डील पर साइन करवाते वक्त ट्रंप और शहबाज के बीच बातचीत भी हो रही थी. तभी शहबाज शरीफ सामने कुर्सी की तरफ इशारा करके दिखाई दिए… ट्रंप भी सामने देखकर मुस्कुराने लगे. सामने की कुर्सी पर मुनीर बैठा था. यानी शहबाज शरीफ… अमेरिका के राष्ट्रपति को अपने बॉस की जानकारी दे रहे थे. सोचिए इससे शर्मनाक कुछ हो सकता है. लेकिन पाकिस्तान को ऐसी बेइज्जती से कोई फर्क नहीं पड़ता. इस वक्त किसी भी कीमत पर पाकिस्तान की सरकार… डॉनल्ड ट्रंप का आशीर्वाद पाना चाहती है. वैसे बोर्ड आफ पीस पर शहबाज के साइन से ट्रंप तो खुश हो गए. लेकिन पाकिस्तान में शहबाज और मुनीर दोनों को लेने के देने पड़ सकते हैं. क्योंकि पाकिस्तान में इसका विरोध शुरू हो गया है. आज आपको भी पाकिस्तान की आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति को समझना चाहिए.
गाजा में पाकिस्तानी फौज भेजने से देश के भीतर इस्लामी पार्टियों ने नाराजगी जाहिर करनी शुरू कर दी है. इसे फिलिस्तीन से गद्दारी के रूप में पेश किया जा रहा है इमरान खान की पार्टी PTI को इससे नया आंदोलन मिल जाएगा. अब इमरान खान के समर्थक नरेटिव बनाएंगे..आसिम मुनीर..अमेरिका और इज़रायल के लिए काम कर रहा है. इससे सड़कों पर आंदोलन और मजबूत होगा अमेरिका और ट्रंप का दबाव भी मुनीर पर काम कर रहा है..अमेरिका चाहता है कि मुस्लिम सेनाएं गाजा में जाएं ताकि मिशन को “इस्लामी वैधता” मिले. अगर आगे मुनीर ना कहता है. तो IMF, फंडिंग और खाड़ी सपोर्ट खतरे में पड़ जाएगा. इसके अलावा इज़रायल भी पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता..पाकिस्तान को तुर्किए जैसा खतरा मानता है. इसलिए फौज भेजने पर भी पाकिस्तान को सिर्फ़ सीमित रोल मिलेगा…लेकिन घर में गुस्सा भरपूर रहेगा वहीं असीम मुनीर का फैसला गलत साबित हुआ तो पाकिस्तान पर उसका कब्जा कमजोर हो जाएगा…उसने अपनी सेना की जो रक्षक-ए-इस्लाम वाली छवि बनाई है. वो टूट जाएगी.
गाजा के लिए ट्रंप का प्लान
गाजा के लिए प्लान डॉनल्ड ट्रंप ने तैयार कर लिया है. तो दूसरी तरफ गाजा के टेरर वायरस हमास के लिए एक प्लान ट्रंप के दामाद जी..यानी जेरेड कुशनर ने भी तैयार किया है. ट्रंप के दामाद का हमास प्लान क्या है, अब हम इस सवाल को आपके लिए डिकोड करेंगे. ट्रंप के दामाद का जो गाजा प्लान है..उसमें 3 मुख्य चरण हैं. और ये चारों चरण..हमास फ्रेंडली लग रहे हैं.
न्यू गाज़ा विज़न नाम के इस प्लान में सबसे पहले हमास से रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन जैसे बड़े हथियार लिए जाएंगे. हालांकि हमास के उन आतंकियों को छोटे हथियार रखने की अनुमति दी जाएगी जो भावी फिलिस्तीनी पुलिस का हिस्सा बनने पर सहमति जताएंगे. इस प्लान का दूसरा चरण हमास के उन आतंकियों पर केंद्रित होगा जो सीधे सरेंडर कर देंगे. इन आतंकियों को दो विकल्प दिए जाएंगे. पहला विकल्प ये है कि आतंकियों को गाजा छोड़ने के लिए सुरक्षित रास्ता दिया जाएगा और जो गाजा में रहना चाहेंगे उन्हें दोबारा आतंकी गतिविधियों में ना शामिल होने के बॉन्ड पर दस्तखत करने होंगे. तीसरे चरण में हमास के सरेंडर कर चुके आतंकियों को रोजगार के अवसर दिए जाएंगे. गाजा में बनाए जाने वाले फ्री ट्रेड जोंस यानी मुक्त व्यापार वाले बाजारों में इन्हें जगह दी जाएगी.
अगर आसान भाषा में इस प्लान को समझा जाए तो ये हमास के लिए सजा कम और सुविधा ज्यादा नजर आती है. हमास के आतंकियों के पास छोटे हथियार मौजूद रहेंगे. हमास के आतंकियों को रोजगार तक मिलेगा. गाजा का इतिहास बताता है कि हमास ने कभी किसी सीजफायर या समझौते का सम्मान नहीं किया है. हमास की इसी फरेबी फितरत को लेकर जब ट्रंप के दामाद जी से सवाल पूछा गया तो उनकी जुबान से भी यही निकला…हमारे पास कोई प्लान B नहीं है. ट्रंप के दामाद के इस मजबूरी भरे बयान को आपको भी सुनना और समझना चाहिए.
जब गाजा का युद्ध शुरु हुआ था तो अमेरिकी थिंक टैंक हडसन इंस्टिट्यूट ने एक रिपोर्ट छापी थी जिसका सार था कि धोखा ही हमास का सबसे बड़ा हथियार है. यहां आपको जानना चाहिए कि डॉनल्ड ट्रंप ने पिछले साल सितंबर के महीने में गाजा के सीजफायर का प्लान पेश करना शुरु किया था. तब से लेकर अब तक हमास ने 8 बार ऐसे हमले किए हैं जिनकी वजह से युद्धविराम पर संकट के बादल मंडरा चुके हैं. इसी वजह से कहा जा रहा है कि ट्रंप के दामाद जी के लिए भी हमास को पिंजरे में बंद करना आसान नहीं साबित होगा.
