Trump Putin secret deal: खलीफा खामेनेई को पूरी उम्मीद है कि अगर ट्रंप ने ईरान पर हमला किया तो इस बार पुतिन उन्हें बचाने जरूर आएंगे. लेकिन उनका यह सोचना एकदम गलत है. हमारा यह विश्लेषण पढ़कर आप समझ जाएंगे कि खलीफा अगर ऐसा सोच रहे हैं तो गलत सोच रहे हैं. 

अपने हितों को साधने के लिए कब कौन किसके पाले में चला जाए ये कोई नहीं जानता. दूसरे विश्वयुद्ध में जो अमेरिका और सोवियत यूनियन एक साथ थे. वो देखते ही देखते एक दूसरे के जानी दुश्मन बन गए थे.अब जब परिस्थितियां बदल रही हैं तो एक बार फिर ट्रंप और पुतिन साथ आ रहे हैं. वे क्यों साथ आ रहे हैं और इसका असर क्या होने वाला है. इस सीक्रेट डील की शर्तें क्या हैं. इसे विस्तार से बताने से पहले  आपके साथ शेयर करना जरूरी है.

क्या ट्रंप और पुतिन के बीच हो चुकी है सीक्रेट डील?

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अपडेट ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 23 जनवरी को मुलाकात होने वाली है. 160 दिन बाद दोनों नेताओं की ये मुलाकात कहां होगी. इसे लेकर अभी तक कोई जानकारी सामने नहीं आई है. लेकिन ये माना जा रहा है कि इस मुलाकात में संभावित सीक्रेट डील पर चर्चा हो सकती है. इस सीक्रेट डील के सेंटर हैं दो भूभाग.एक यूक्रेन.. जहां पिछले चार सालों से भीषण जंग चल रही है.. और दूसरा है ग्रीनलैंड.

माना जा रहा है कि ट्रंप ने पुतिन से ग्रीनलैंड के मुद्दे पर मदद मांगी है. बदले में पुतिन ने यूक्रेन पर अपने कब्जे वाला हिस्सा यानी पूरा का पूरा डोनबास इलाका मांगा है.

अब हम आपको आसान भाषा में इस डील के पूरे गुना-गणित को समझाते हैं. जिस वक्त पूरा यूरोप ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के खिलाफ खड़ा है. उस वक्त पुतिन ने ग्रीनलैंड पर एक ऐसा बयान दे दिया है जो सीधे सीधे ट्रंप के पक्ष में है. 

रूस को लेकर ट्रंप के सुर हुए नरम

पुतिन के इस बयान का सीधा सीधा मतलब ये निकलता है कि जिस तरह से 1917 में डेनमार्क ने वर्जिन आइलैंड अमेरिका को बेचा था. उसी तरह की डील वो ग्रीनलैंड को लेकर भी कर ले. पुतिन ने तो ग्रीनलैंड की कीमत तक तय कर दी. कुल मिलाकर पुतिन वही कह रहे हैं जो ट्रंप चाहते हैं.

पुतिन के इसी बयान की वजह से ये माना जा रहा है कि ट्रंप और उनके बीच कोई सीक्रेट डील हुई है. बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर भी इसकी खूब चर्चा चल रही है. एक तरफ पुतिन ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप का सांकेतिक समर्थन कर रहे हैं. वहीं ट्रंप भी दावोस में यूक्रेन युद्ध को लेकर ऐसा बयान दे रहे हैं. जो पुतिन के नैरेटिव को सूट करता है.

ट्रंप ने कहा, ‘राष्ट्रपति जेलेंस्की और राष्ट्रपति पुतिन के बीच बहुत ज्यादा नफरत है, असामान्य रूप से नफरत, फिर भी हम एक डील के काफी करीब हैं. रूस और यूक्रेन दोनों एक डील चाहते हैं और हम यही करने की कोशिश में जुटे हैं. हम डील करवाने के काफी नजदीक हैं. कई बार ऐसा हुआ है कि रूस डील के लिए मान गया.. लेकिन राष्ट्रपति जेलेंस्की नहीं माने. जब वो ओवल ऑफिस(व्हाइट हाउस) में थे तब आपने देखा भी था.’

यूएस को ग्रीनलैंड और रूस को मिलेगा डोनबास?

बीते कुछ वक्त में अगर ट्रंप के बयानों पर गौर करेंगे तो ये पाएंगे कि रूस को लेकर ट्रंप के तेवर काफी नरम पड़ गए हैं. जब भी पुतिन पर सवाल किया जाता है तो ट्रंप उनके लिए सम्मानजनक संबोधन का ही इस्तेमाल करते हैं.  यही वजह है कि अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या दोनों के बीच सीक्रेट डील हो गई है. ऐसी किसी डील को लेकर तीन संभावनाएं सामने आ रही हैं.

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संभावना नंबर एक- ट्रंप, पुतिन को यूक्रेन में फ्री हैंड देते हैं. मतलब, रूस यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर कब्जा रखे  और बदले में पुतिन ट्रंप को ग्रीनलैंड पर दबाव बनाने में मदद करें.

दूसरी संभावना ये है कि इधर ट्रंप सीजफायर के नाम पर यूक्रेन को अमेरिकी सैन्य मदद कम करें. उधर रूस आर्कटिक में अपनी मिलिट्री एक्टिविटी बढ़ाकर डेनमार्क को डराए, ताकि वो ग्रीनलैंड बेचने को मजबूर हो.

संभावना नंबर 3 ये हो सकती है कि एक तरफ ट्रंप रूस से सैंक्शन यानी प्रतिबंध हटा दें. यूक्रेन को NATO की सदस्यता से दूर रखें और बदले में पुतिन,जिनपिंग को ग्रीनलैंड के मुद्दे से दूर रखें.

लौट सकता है 80 साल पुराने वाला दौर!

ट्रंप-पुतिन की सीक्रेट डील की संभावना के प्रबल होने की वजह एक और है. इसी महीने ट्रंप के खास दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद मॉस्को में पुतिन से मुलाकात करने वाले हैं. कहने को तो ये मीटिंग रूस-यूक्रेन युद्ध को रुकवाने के लिए है. लेकिन माना ये भी जा रहा है कि कहीं ये दोनों नेताओं के बीच डील के लिए तो नहीं.फिलहाल तो ग्लोबल पॉलिटिक्स को समझने वाले विद्वान इसे सिर्फ एक संभावना मान रहे हैं. लेकिन अगर ये संभव हो गया तो दुनिया के लिए कितना खतरनाक साबित होगा. आपको ये भी समझने की जरूरत है.

अगर अमेरिका और रूस, छोटे देशों पर प्रभाव बनाकर विस्तारवाद की नीति अपनाने लग गए तो दुनिया में 80 साल पुराना दौर फिर से शुरू हो जाएगा. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मजबूत देशों ने एक नीति अपनाई SPHERE OF INFLUENCE. यानी हर देश को दुनिया के एक हिस्से पर प्रभाव प्राप्त हुआ.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद वर्ष 1945 में क्रीमिया के याल्टा शहर में एक कॉन्फ्रेंस हुई. जिसमें उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और सोवियत संघ के प्रधानमंत्री जोसेफ स्टालिन ने मिलकर विश्व युद्ध के बाद की दुनिया का मैप बनाया.

इसके तहत सोवियत संघ को पूर्वी यूरोप में प्रभुत्व मिला. अमेरिका का कंट्रोल पश्चिमी यूरोप और पैसिफिक पर बना. जबकि यूरोप के बचे हुए हिस्से पर ब्रिटेन और फ्रांस का प्रभाव रहा. ये विस्तारवाद की सबसे बड़ी मिसाल थी.

अगर ऐसा हुआ तो दुनिया पर पड़ेगा क्या असर?

ट्रंप और पुतिन की जिस संभावित सीक्रेट डील की चर्चा इस वक्त पूरी दुनिया में हो रही है, उससे एक बार फिर विस्तारवाद का वही दौर लौट सकता है.अगर आज की तारीख में ऐसा हुआ और बड़े देशों ने अपने छोटे पड़ोसी देशों पर कब्जा करना शुरू कर दिया तो दुनिया का नया मैप कैसा होगा उसे आपको जानना चाहिए. 

अगर ऐसा हुआ तो सबसे पहले चीन ताइवान पर हमला कर के उसपर कब्जा कर लेगा. अमेरिका ग्रीनलैंड के बाद मेक्सिको और क्यूबा का रुख करेगा. इजरायल वेस्ट बैंक को अपना हिस्सा बना लेगा. तुर्किये, साइप्रस पर कब्जा कर लेगा. ट्रंप गाजा पीस प्लान की तैयारी कर रहे हैं. पुतिन इस शांति वाले प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन दोनों के बीच जो संभावित डील की बातें हो रही हैं. वो दुनिया को अशांति की तरफ धकेल सकती है.