US-Iran Conflict: आज किसी भी पल अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने वाला है. इस बार जंग का आगाज ट्रंप ने नहीं, खलीफा ने किया है और ट्रंप के विनाशक भेजते ही खलीफा ने एक प्रदर्शनकारी को फांसी पर लटका दिया है. एक तरफ 8 मुस्लिम देशों समेत 20 देशों ने गाजा बोर्ड आफ पीस पर साइन किया इसके बाद ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात की और कल रात ट्रंप के दूतों ने मास्को जाकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से कई घंटों तक मीटिंग की. इसके बाद आज यूएई में अमेरिका यूक्रेन और रूस के प्रतिनिधि मीटिंग कर रहे हैं. इन सारी घटनाओं को ईरान पर हमले की अमेरिकी रणनीति से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है? अमेरिका के राष्ट्रपति खुद बता रहे हैं कि अमेरिका का बहुत बड़ा नौसैनिक बेड़ा ईरान की तरह तेजी से आगे बढ़ रहा है. ये नौसैनिक बेड़ा ईरान की तरफ किसी मैत्री युद्धाभ्यास के लिए नहीं जा रहा है. क्योंकि दुनिया में अमेरिका के सबसे कट्टर दुश्मनों की लिस्ट में ईरान का नाम सबसे ऊपर आता है. अपने बयान में ट्रंप ने अमेरिका के पास अर्माडा होने का जिक्र किया अब ये अर्माडा क्या होता है जिसका नाम लेकर ट्रंप..ईरान को डरा रहे हैं. जिस वक्त ट्रंप दुनिया को अमेरिका नौसैनिक बेड़े के ईरान के पास पहुंचने की जानकारी दे रहे थे. उस वक्त ईरान ने ऐसा क्या कर दिया. जिसके बाद अगले 24 घंटे में युद्ध छिड़ने की आशंका जाहिर की जा रही है. 

ईरानी में पहली फांसी की सजा 

ईरान में आज सुबह सत्ता विरोधी प्रदर्शनों का सबसे बड़ा केंद्र रहे मशहद से गिरफ्तार एक शख्स को फांसी दे दी गई. अली रहबर को ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उसे आज सुबह फांसी दे दी गई. अली रहबर पेशे से एक स्पोर्ट्स कोच और फिटनेस ट्रेनर थे. जिनकी उम्र सिर्फ 33 साल थी. ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के आरोप में लगभग 30 हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें पहली फांसी अली रहबर को दी गई है. ईरान की न्यायपालिका पहले ही फास्ट-ट्रैक जस्टिस का एलान कर चुकी है और रहबर को फांसी की सजा में यही मॉडल लागू किया गया. ईरान ने इसके जरिए प्रदर्शनकारियों को कड़ा संदेश दिया है कि सरकार के विरोध की सजा मौत है, जो सड़कों पर खामेनेई के खिलाफ उतरेगा. उसका यही अंजाम यही होगा. इसे लोग 2 तरह से देख रहे हैं. एक तो ये कि खामेनेई ने एक प्रदर्शनकारी को फांसी पर लटकाकर ललकारा है. हिम्मत है तो लड़कर दिखा और कुछ लोगों का मानना है कि खलीफा का ये कदम आ बैल मुझे मार जैसा है. वैसे, इस फांसी को ईरान में डर का शासन स्थापित करने की कोशिश माना जा रहा है. ईरान ने फांसी देकर ये संदेश भी दिया है कि खामेनेई अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह नहीं करते हैं और विरोध करने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को सुरक्षित ना समझे ईरान में विरोध का झंडा उठाने वाले छात्रों मजदूरों और फिटनेस ट्रेनर को भी मौत की सजा दी जाएगी. इस फांसी को नई और खतरनाक लाइन इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि ईरान पहले भी फांसी देता रहा है, लेकिन आमतौर पर ये महीनों-सालों की प्रक्रिया होती थी. या फिर सीधे आतंकी मामलों से जुड़ी रहती थी, लेकिन इस बार सिर्फ 10 दिन में फांसी दे दी गई. 

ट्रंप के लिए खलीफा का बिग चैलेंज

ये इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर की गई सख्त कार्रवाई में मरने वालों की संख्या बढ़कर 5 हजार को पार कर गई है और अब फांसी देने की शुरूआत ने अमेरिका को हमले का एक बड़ा मौका दे दिया है. जिस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति अपने बहुत बड़े नौसैनिक बेड़े के ईरान की तरफ बढ़ने की जानकारी दुनिया को दे रहे थे. उसी वक्त उन्होंने ये भी बताया कि ईरान पर हमला क्यों टाला गया था. आखिर क्यों एक प्रदर्शनकारी को दी गई फांसी. ट्रंप के लिए खलीफा का बिग चैलेंज है. ट्रंप दुनिया को बता रहे थे कि कैसे उनके दबाव की वजह से ईरान ने उन 800 से ज्यादा लोगों की फांसी की सजा रद्द कर दी थी, जिन्हें एक हफ्ते पहले फांसी दी जानी थी. ट्रंप दुनिया को उस धमकी के बारे में भी बता रहे थे. जिससे घबराकर ईरान ने प्रदर्शनकारियों को फांसी की सजा नहीं दी, लेकिन इस बयान के कुछ ही घंटे बाद अली रहबर को फांसी देने की खबर सामने आ गई यानी ईरान ने ट्रंप को चेतावनी दे दी. अब ईरान में प्रदर्शनकारियों को फांसी देने की शुरूआत हो चुकी है और अमेरिका का सबसे विध्वंसक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी ईरान पहुंचने वाला है. ऐसे में एक बार फिर से ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका कई गुना बढ़ गई है और इस बार इस जंग का आगाज ट्रंप ने नहीं, बल्कि खलीफा ने किया है. ईरान को ये फांसी कितनी महंगी पड़ सकती है. इस फांसी के बाद एक तरफ अमेरिका को ईरान पर हमला करने का बहाना मिल गया है. दूसरी तरफ ईरान में मस्जिदों में आग लगाने वाले विरोध प्रदर्शन का दौर फिर से शुरू होने वाला है. 

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जंग की तैयारी? 

एक तरफ दुनिया भर में ईरानियों का प्रदर्शन चल रहा होगा. ईरान के अंदर आग लगी होगी और अमेरिका का सबसे घातक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी ​मिडिल ईस्ट में होगा. ये वक्त ईरान के लिए कितना भारी पड़ सकता है. आज आपको अमेरिका के इस कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की ताकत को भी समझना चाहिए और उस अर्माडा के बारे में भी जानना चाहिए. अर्माडा एक साथ चलने वाले विशाल और संगठित नौसैनिक बेड़े को कहते हैं, जो युद्ध या दबाव बनाने के लिए तैनात होता है यानी अर्माडा एक तैरता हुआ वॉर बेस है, जिसे अमेरिका ने ईरान पर संभावित हमले के लिए भेजा है, जिसमें कई एयरक्राफ्ट कैरियर, युद्धपोत और सबमरीन शामिल हैं. अमेरिका के अर्माडा का जो कैरियर स्ट्राइक ग्रुप सबसे पहले ईरान पहुंच रहा है. उसका नाम यूएसएस अब्राहम लिंकन है. अमेरिका का ये कैरियर स्ट्राइक ग्रुप समुद्र में बेस की तरह काम करेगा, जो हवाई हमले, मिसाइल स्ट्राइक साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉर जैसे सारे काम एक साथ कर सकता है. इसका मतलब ये हुआ कि अमेरिका ईरान पर हमला घंटों में नहीं बल्कि मिनटों में शुरू करने में सक्षम होगा, जिससे पूरे इलाके का संतुलन बदल जाएगा. अमेरिका का ये कैरियर स्ट्राइक ग्रुप किसी देश की पूरी सेना को हराने के लिए सक्षम है और ईरान के लिए बुरी खबर ये है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कुछ और कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी पहुंच सकते हैं. इसके अलावा भी ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कुछ बड़ी तैयारियां की हैं. अमेरिका ने जार्डन में12 F-15E स्ट्राइक फाइटर जेट और C-17 ग्लोबमास्टर विमान भेजे हैं . जॉर्डन में लगभग 3,000 से 4,000 अमेरिकी सैनिक भी तैनात हैं. इसके अलावा अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में बड़ी संख्या में एयर डिफेंस सिस्टम और इंटरसेप्टर मिसाइलें भेजी हैं ताकि ईरान के संभावित जवाब को नाकाम किया जा सके. 

मिडिल ईस्ट ने किया ट्रंप के सामने सरेंडर 

अमेरिका ने सिर्फ ईरान की घर के अंदर और बाहर से घेराबंदी नहीं की है. कूटनीतिक तौर पर भी ईरान को मिडिल ईस्ट और सहयोगियों से अलग करने के लिए गहरी चाल चली है. मिडिल ईस्ट में इतनी बड़ी सेना भेजकर अमेरिका ने साफ कर दिया है. इस बार एक मुस्लिम देश यानी ईरान जंग का मैदान बनने वाला है और इस जंग से पहले अमेरिका ने ईरान तक इस बात का संदेश भी पहुंचा दिया कि मिडिल ईस्ट में कोई भी प्रभावशाली मुल्क उसके साथ नहीं है. ट्रंप के गाजा बोर्ड ऑफ पीस समझौते पर मिडिल ईस्ट के प्रभावशाली मुस्लिम देशों ने सिग्नेचर कर दिए हैं. आप ये भी कह सकते हैं कि ट्रंप ने बंदूक की नोक पर मुस्लिम देशों से साइन करवा लिये. साइन करने वालों में सउदी अरब, तुर्किए, कतर, यूएई, बहरीन के साथ साथ पाकिस्तान भी शामिल है. यानी ईरान के अलावा खुद को बड़ा खलीफा समझने वाले सभी मुस्लिम देश अमेरिका के सामने सरेंडर कर चुके हैं. इसका मतलब ये हुआ कि अब ईरान पर अमेरिका के संभावित हमले के खिलाफ मिडिल ईस्ट और मुस्लिम देशों से कोई आवाज नहीं उठेगी. इसके अलावा ईरान के सबसे बड़े रणनीतिक सहयोगी रूस से भी अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप डील कर रहे हैं. कल रात में ही ट्रंप के 3 विशेष दूतों ने मास्को जाकर रूस के राष्ट्रपति पुतिन से लंबी चर्चा की है. इसमें स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के साथ जोश ग्रुएनबाम भी शामिल थे.पश्चिमी मीडिया के मुताबिक पुतिन से ट्रंप के दूतों ने​ सिर्फ यूक्रेन वॉर की नहीं ईरान की चर्चा भी की है क्योंकि अमेरिका के संभावित हमले पर पुतिन न्यूट्रल भी रहे तो ईरान का लंबे वक्त तक टिकना नामुमकिन होगा. इससे ईरान की जवाबी क्षमता 40 प्रतिशत तक कम हो जाएगी. क्योंकि ईरान रूस के एयर डिफेंस सिस्टम एस 300 का इस्तेमाल करता है. रूसी इंटेलिजेंस और ट्रेनिंग सपोर्ट के बिना, ईरान का कमांड-कंट्रोल और युद्ध समन्वय बिखर जाएगा. नतीजा यह होगा कि ईरान सिर्फ मिसाइलों पर निर्भर रहेगा, इससे अमेरिकी स्ट्राइक रोकने की क्षमता बहुत कम रह जाएगी. अब ईरान को सिर्फ चीन से उम्मीद है, जिसके 16 कार्गो विमान पिछले कुछ दिनों के अंदर तेहरान में लैंड हुए हैं. इसके अलावा ईरान के प्रॉक्सी हूती ने भी ईरान पर हमले की स्थिति में पलटवार की धमकी दी है. ईरान ने भी डिफेंस और अटैक की तैयारियां की हैं, लेकिन अमेरिका के सामने बिना किसी बड़े सपोर्ट के उसका टिकना बहुत मुश्किल है.