DNA Analysis: ईरान जिस वक्त परमाणु बारूद के ढेर में खड़ा नजर आ रहा है. उस वक्त भारत के एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल के डिप्टी पवन कपूर तेहरान पहुंचे. यानी जिस वक्त दुनिया के सभी मुल्क अपने अपने नागरिकों को तेहरान से निकाल रहे हैं. आशंका जाहिर की जा रही है. किसी भी वक्त ईरान पर मिसाइलों की बारिश हो सकती है. भारत के डिप्टी एनएसए पवन कपूर तेहरान की यात्रा पर गए. 

डिप्टी एनएसए ने अपने ईरानी समकक्ष और ईरान की सबसे ताक़तवर सुरक्षा संस्था Supreme National Security Council of Iran के सचिव अली लारीजानी से मुलाकात की. आज आपके लिए ये जानना भी जरूरी है. भारत और ईरान के जिन दो अधिकारियों के बीच तेहरान में मुलाकात हुई. वो कौन हैं और दोनों देशों के रणनीतिक चक्रव्यूह को तैयार करने में इनका क्या योगदान है.

डिप्टी एनएसए पवन कपूर के बारे में जानिए

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भारत के डिप्टी एनएसए पवन कपूर की उन विशेषताओं के बारे में जानना चाहिए. जिसकी वजह से वो इतने महत्वपूर्ण मौके पर तेहरान में मौजूद हैं. 1990 बैच के इंडियन फॉरेन सर्विस के अधिकारी, पवन कपूर भारत के रणनीतिक हलकों में बेहद सुलझे और अनुभवी कूटनीतिक अफसर माने जाते हैं. वे रूस, इज़रायल और यूएई में भारत के राजदूत रह चुके हैं, और इन देशों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध मजबूत हैं. 

पवन कपूर की विशेषज्ञता

पवन कपूर की विशेषज्ञता में बैक-चैनल डिप्लोमेसी और गुप्त कूटनीति शामिल हैं, जो तनावपूर्ण रिश्तों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. ईरान से जुड़ी कूटनीति में उनकी भूमिका खास है, क्योंकि वो रूस और ईरान के बीच भारत का पक्ष मजबूती से रखते रहे है. इज़रायल के साथ पवन कपूर का भरोसा भी मजबूत है…और वो इज़रायल को भारत–ईरान संवाद और रिश्तों के बारे में समझा सकते हैं. यानी पवन कपूर मिडिल ईस्ट में भारत के सहयोगी देशों के बहुत करीब हैं और वहां की परिस्थितियों के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं . मित्रों आज आपको ईरान की सबसे ताक़तवर सुरक्षा संस्था के सचिव अली लारीजानी की ईरान में हैसियत के बारे में भी जानना चाहिए .

ईरान के सबसे अनुभवी रणनीतिक नेता हैं अली लारीजानी 

लारीजानी Supreme National Security Council of Iran यानी SNSC के सचिव हैं. SNSC ईरान की सबसे ताक़तवर सुरक्षा संस्था है, जहां पर परमाणु नीति. युद्ध और शांति के फ़ैसले. क्षेत्रीय रणनीति और भारत, चीन, रूस जैसे देशों के साथ रक्षा सहयोग सब कुछ तय होता है. इस काउंसिल के फैसले पर सर्वोच्च नेता खामेनेई मुहर लगाते हैं. इसके अलावा लारीजानी की कुछ विशेषताएं उनको ईरान का चाणक्य बनाती हैं.  

  • अली लारीजानी ईरान के सबसे अनुभवी और भरोसेमंद रणनीतिक नेता माने जाते हैं.

  • अली ना तो ज़्यादा सख़्त हैं और न बहुत नरम..ईरान में उनकी छवि व्यावहारिक सोच वाले नेता हैं. इसीलिए खामेनेई उनकी बात को काफी तवज्जो भी देते हैं.

  • लारीजानी कई साल तक ईरान की संसद के स्पीकर रह चुके हैं.

  • परमाणु मुद्दे पर अमेरिका से बातचीत में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

  • उनकी पहचान अमेरिका, इज़राइल और दूसरे देशों को पर्दे के पीछे संदेश देने वाले अहम व्यक्ति के तौर पर भी है .

  • सुप्रीम लीडर के क़रीबी होने के कारण ईरान के सभी बड़े फैसलों पर वो असर डालते हैं.

 मिडिल ईस्ट में खतरे के बीच भारत का कदम 

मिडिल ईस्ट में महायुद्ध के खतरे के बीच भारत के डिप्टी एनएसए ने अचानक तेहरान पहुंचकर इसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से बातचीत की है. आज आपको इस मीटिंग की इनसाइड स्टोरी के बारे में भी जानना चाहिए. आखिरकार डोवल के दूत की इस मीटिंग का एजेंडा क्या था. भारत के लिए ईरान रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच और ऊर्जा सुरक्षा भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं. इस यात्रा में भी दोनों अधिकारियों के बीच सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद विरोधी प्रयासों और मिडिल ईस्ट की मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई है. यानी ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका पर भी भारत और ईरान की बात हुई है. भारत और ईरान की मित्रता अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाती है, इसलिए दोनों पक्षों ने अमेरिका के दबाव के बीच संतुलित रुख अपनाने और संवाद के रास्ते खुले रखने की बात भी की है.

ईरान के लिए कितना जरूरी ईरान? 

कहा जाता है जो समझदार व्यक्ति होता है. वो आग लगने से पहले कुआं खोद लेता है और मिडिल ईस्ट में जो आग लगने वाली है उससे पूरी दुनिया के साथ साथ भारत पर भी असर पड़ना तय है और ऐसे में भारत के लिए ईरान का सहयोग बहुत जरूरी है. आज आपको भी समझना चाहिए. युद्ध छिड़ने की स्थिति में भारत को ईरान की क्या जरूरत होगी और डोवल के डिप्टी की मीटिंग कैसे भारत के काम आएगी.  मिडिल ईस्ट के देशों में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं. 

युद्ध की स्थिति में नागरिकों की सुरक्षा के लिए भारत को ईरान से सीधा सहयोग चाहिए, ताकि ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षित निकासी और ट्रांज़िट संभव हो. Strait of Hormuz खुला रखने या आंशिक रूप से चालू रखने में ईरान की भूमिका निर्णायक होगी, जिससे भारत की तेल-गैस सप्लाई बची रह सके. चाबहार पोर्ट भारत के लिए वैकल्पिक रणनीतिक रास्ता है, जो संकट में पाकिस्तान को बाइपास करता है—यह ईरान की सहमति से ही संभव है. तेल और गैस पर बैक-चैनल समझ सिर्फ ईरान के साथ भरोसे के रिश्ते से ही हो सकती है. ईरान क्षेत्रीय ताक़त है-उससे संवाद रखकर भारत युद्ध के फैलाव से अपने जहाज़ों और व्यापार को बचा सकता है. यानी हॉर्मुज से गुजरने वाले भारतीय जहाजों को ईरान और उसके प्रॉक्सी के हमलों से बचाया जा सकता है

मानवाधिकार के मामलों ईरान के साथ खड़ा हुआ था भारत

इसके अलावा भारत ईरान के लिए मैसेंजर चैनल बन सकता है, जो अमेरिका और इज़राइल तक ईरान के संदेश को पहुंचाएगा. कुल मिलाकर, ईरान के बिना भारत ऊर्जा, नागरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता तीनों मोर्चों पर गंभीर जोखिम में आ जाएगा. इसीलिए युद्ध की आग लगने से पहले भारतीय हितों की सुरक्षा बहुत जरूरी है. इसलिए तेहरान में भारत के डिप्टी एनएसए की इस वक्त मौजूदगी युद्ध के दौरान भारत के बहुत काम आएगी. हमने आपको डीएनए में दिखाया था. किस तरह पूरी दुनिया को चौंकाते हुए भारत यूएन में मानवाधिकार के मामलों पर ईरान के साथ खड़ा हुआ था. इस मुलाकात के जरिए भी भारत ने अमेरिका और दुनिया को संदेश दिया है. भले ही हम अमेरिका और इज़राइल के दोस्त हैं, लेकिन ईरान से भी बात बंद नहीं करेंगे. यानी भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर चलता रहेगा.

हो सकता है ईरान में भारत के एनएसए की मौजूदगी, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को थोड़ी कम पसंद आए. वैसे आजकल डॉनल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन भारत से थोड़ा चिढ़ा हुआ भी है. इसकी वजह है भारत और यूरोप की ट्रेड डील. अमेरिका यूरोपीय देशों पर जो दबाव बना रहा है, भारत की वजह से यूरोप उस दबाव से बाहर निकल गया है. यही बात आप भारत के लिए भी कह सकते हैं. और इसी बात का दर्द ट्रंप और उनके मंत्रियों के अंदर दिखाई दे रहा है. 

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अमेरिका को चुभ रही भारत- EU की डील 

अमेरिका के ट्रेजरी सचिव को भारत यूरोप की डील इतनी बुरी लग रही है. कि अब वो यूरोप पर अपने खिलाफ ही वॉर लड़ने का आरोप लगा रहे हैं . यूक्रेन की हालत का जिम्मेदार यूरोप को बता रहे हैं. वो पश्चिमी मीडिया से कह रहे हैं हम रूस से तेल ना खरीदने के लिए भारत पर दबाव बना रहे थे, लेकिन यूरोप ने भारत के साथ डील कर ली. ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप ने यूरोप पर टैरिफ वाला दबाव बनाया था. लेकिन यूरोप ने भारत के साथ ट्रेड डील करके अमेरिका के टैरिफ का बैकअप प्लान तैयार लिया. और ये ही बात ट्रंप को रास नहीं आ रही. वैसे भारत से ट्रंप की चिढ़ अभी और बढ़ने वाली है क्योंकि मार्च में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी भी भारत आ रहे हैं. भारत और कनाडा के बीच भी बड़ी ट्रेड डील होने वाली है.

कनाडा दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम सप्लाई करने वाले देशों में शामिल है और इस दौरे में भारत और कनाडा के बीच 2.8 बिलियन डॉलर की यूरेनियम सप्लाई की डील होने जा रही है. इसके अलावा भारत और कनाडा के बीच क्रिटिकल मिनिरल की डील भी होगी. जो  सेमीकंडक्टर, डिफेंस और ग्रीन टेक के लिए जरूरी है. इससे भारत और कनाडा दोनों का फायदा होगा, लेकिन अमेरिका को इस डील से भी सदमा लगेगा.

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