Trump Control In Venezuela: प्रेसिडेंट ट्रंप कुंठा के शिकार हैं और ऐसा इसलिए क्योंकि वो पूरी दुनिया में हुकूमत करना चाहते हैं. वो दूसरे देशों को अमेरिका का उपनिवेश बनाना चाहते हैं. 21वीं सदी में गुलामी वाली प्रथा लौट रही है. उपनिवेशवाद लौट रहा है. जंग का दौर लौट रहा है और मजहबी टकराव बढ़ रहे हैं. इसीलिए आप कह सकते हैं कि दुनिया में मध्यकाल की वापसी हो रही है और इसमें ट्रंप का योगदान सबसे अधिक है. राष्ट्रपति के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करते ही उन्होंने अमेरिका के 51वें राज्य की रट लगानी शुरू कर दी थी. शुरुआत में उन्होंने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बताया. हाल के दिनों में उनका ध्यान कनाडा की जगह ग्रीनलैंड की तरफ गया है, लेकिन ग्रीनलैंड को लेकर जारी विवाद के बीच चुपके से अमेरिका ने एक स्वतंत्र देश को अपना 51वां राज्य बना भी लिया है. 

कनाडा-ग्रीनलैंड के बीच वेनेजुएला पर मारा छक्का

अमेरिका का ये 51वां राज्य कनाडा या ग्रीनलैंड नहीं बल्कि वेनेजुएला है. भले ही ट्रंप ने औपचारिक रूप से वेनेजुएला को अपना राज्य घोषित नहीं किया हो, अमेरिका के नक्शे में उसे शामिल नहीं किया हो. लेकिन वेनेज़ुएला पर जिस तरह का नियंत्रण अमेरिका ने हासिल किया है, वो बताता है कि उसकी संप्रभुता खत्म हो गई है.अब वेनेजुएला सरकार के खर्च का हिसाब-किताब अमेरिका रखेगा. वेनेजुएला सरकार हर महीने सरकार चलाने के लिए अपना खर्च अमेरिका से मांगेगी. अमेरिका से मिले पैसे के ज़रिए वेनेजुएला की सरकार चलेगी. वहां सैनिकों और दूसरे कर्मचारियों को इसी पैसे से वेतन मिलेगा, इसी फंड से विकास के काम पर खर्च होगा. एक स्वतंत्र देश का खर्च हर महीने दूसरे देश से मिले पैसे से नहीं चलता है. उसका अपना बजट होता है. लेकिन वेनेजुएला की ये आजादी ट्रंप ने छीन ली है. इसलिए वेनेजुएला को अमेरिका का 51वां राज्य बताया जा रहा है. इस योजना की जानकारी खुद अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अमेरिकी सीनेट को दी. रुबियो के मुताबिक वेनेजुएला की अंतरिम सरकार हर महीने अमेरिका को अपना खर्च बताएगी यानी उसे ये बताना होगा कि महीने भर में उसे पैसे कहां-कहां खर्च करने हैं. ट्रंप प्रशासन इसकी जांच करेगा. इसके बाद अमेरिका वेनेजुएला को पैसा जारी करेगा, लेकिन ये पैसा अमेरिका अपनी तरफ से नहीं देगा. अमेरिका, वेनेजुएला को वो पैसा देगा जो उसका तेल बेचकर अमेरिका को मिलेगा.

अपने पैसे के लिए अमेरिका के सामने हाथ फैलाएगा वेनेजुएला

अमेरिकी विदेश मंत्री के इस बयान का अर्थ है कि अपना ही पैसा हासिल करने के लिए वेनेजुएला को अमेरिका के आगे हाथ फैलाना होगा. तेल वेनेजुएला का है, लेकिन उसका व्यापार अमेरिका करेगा. फिर तेल की बिक्री से मिले पैसे का एक हिस्सा वेनेजुएला को मिलेगा. अमेरिका के जो 50 राज्य हैं, उनको भी इस तरह पैसे के लिए ट्रंप प्रशासन पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है. कैलिफोर्निया हो या टेक्सस, अमेरिका के राज्य अपना बजट खुद तय करते हैं. लेकिन वेनेजुएला के पास ये अधिकार भी नहीं है. यानी ये आर्थिक गुलामी की तरह है. भारत पर कब्जे के दौरान ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी भी यही करती थी. वो भारतीय सामानों का व्यापार करती थी और सारा मुनाफा अपने पास रख लेती थी. दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार वेनेजुएला में है. निकोलस मादुरो के तख्तापलट के बाद अमेरिका ने उस पर कब्जा कर लिया है. वेनेजुएला का तेल निर्यात अब पूरी तरह अमेरिका के नियंत्रण में है. अमेरिकी नेवी तय करती है कि कौन से टैंकर वेनेजुएला से जा सकते हैं. यानी पहले तेल के भंडार पर कब्जा किया और अब अमेरिका ने वेनेजुएला के बजट पर भी अपना अधिकार जमा लिया है. अमेरिका की इस योजना से एक खाड़ी देश भी जुड़ा हुआ है. ट्रंप प्रशासन के मुताबिक तेल की बिक्री से मिलने वाला पैसा अभी जिस खाते में रखा जाएगा, उसकी देखरेख क़तर करेगा. यानी पैसा क़तर के पास रहेगा और कतर से लेकर अमेरिका वो पैसा वेनेजुएला को देगा. अभी तक की जानकारी के मुताबिक अमेरिका ने वेनेजुएला का तेल बेचकर 50 करोड़ डॉलर यानी लगभग 4,600 करोड़ रुपये कमाए हैं और ये पैसा कतर के पास है. अमेरिका के विदेश मंत्री की दलील है कि कतर को इसमें शामिल करना इसलिए जरूरी है क्योंकि वेनेजुएला पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है. साथ ही वेनेज़ुएला में पैसा लगाने वाले अमेरिकी नागरिक उस पर कानूनी दावा कर सकते हैं. लेकिन इस योजना में कतर को शामिल करने से अमेरिका के विपक्षी सांसद नाराज हैं. डेमोक्रेटिक सांसदों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है.

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अमेरिका की दादागिरी 

उनका सवाल है कि कतर, वेनेजुएला से हजारों मील दूर है. ऐसे में ये व्यवस्था कानूनी और पारदर्शी नहीं है. उनके कहने का मतलब ये है कि कतर के पास पैसा होने से उसमें हेराफेरी हो सकती है. डेमोक्रेटिक पार्टी को शक इसलिए भी है क्योंकि कतर के शासक को ट्रंप का क़रीबी माना जाता है. सांसदों का सवाल है कि कतर की जगह किसी ऐसे देश को क्यों नहीं चुना गया जहां मजबूत बैंकिंग कानून हो. अमेरिका के एक सांसद ने इस प्लान को लेकर अपने ही देश पर सवाल उठाए. कनेक्टिकट के सांसद क्रिस्टोफर मर्फी ने कहा कि ट्रंप प्रशासन बंदूक की नोक पर वेनेजुएला का तेल ले रहा है. 3 करोड़ लोगों के देश के पैसे का इस्तेमाल कैसे होगा, ये आप तय कर रहे हैं. ये योजना निश्चित रूप से नाकाम होगी. वेनेजुएला की तरह इराक के तेल व्यापार पर भी अमेरिका का नियंत्रण है. ये व्यवस्था 2003 से जारी है. इराक के तेल निर्यात से मिलने वाला पैसा अमेरिका के बैंक में जमा होता है. अमेरिका इस व्यवस्था का इस्तेमाल इराक पर दबाव बनाने के लिए करता है. अंतर बस इतना है कि वेनेजुएला की तरह इराक का बजट अमेरिका नहीं तय करता. कैरिबियन देश हैती की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर भी अमेरिका का गहरा प्रभाव है. हैती अपनी लगभग हर बड़ी आर्थिक ज़रूरत के लिए अमेरिका पर निर्भर है. इसे कई विशेषज्ञ अघोषित नियंत्रण के रूप में देखते हैं. इसी तरह फिलीपींस की आजादी के समय अमेरिका ने शर्तें लगाई थीं कि वहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने बने रहेंगे और अमेरिकी कंपनियों को विशेष अधिकार मिलेंगे. यानी स्वतंत्रता के बाद भी फिलीपींस के सामने अमेरिका का आदेश मानने की मजबूरी है. लेकिन वेनेजुएला के मामले में जो हुआ है, वो सबसे अलग है. वेनेजुएला सरकार को अपना खर्च चलाने के लिए अमेरिका से अपना ही पैसा मांगना होगा. 

मध्यकाल की तरफ लौट रही दुनिया? 

वेनेजुएला के संसाधनों पर अमेरिका का ये कब्जा एक और उदाहरण है कि दुनिया मध्यकाल की तरफ लौट रही है. आज विश्व में उपनिवेशवाद लौट रहा है, गुलामी लौट रही है और युद्ध लौट रहा है. मध्यकाल की तरह धार्मिक टकराव लौट रहा है. मध्यकाल में युद्ध का बोलबाला रहता था. एक देश दूसरे देश से लड़ाई के लिए तैयार रहता था. मौजूदा समय में भी दुनिया युद्ध के साए में हैं. रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध को 4 साल होने वाले हैं. मध्यकाल में कोई वैश्विक कानून नहीं था. ठीक उसी तरह आज भी UN को दरकिनार कर कुछ देश या नेता अपनी इच्छा थोप रहे हैं. वेनेजुएला पर अमेरिका का हमला इसका साक्षात उदाहरण हैं. मध्यकाल में शक्तिशाली देश या राजा अपनी इच्छा कमजोर देशों पर थोपते थे. उन्हें अपना उपनिवेश बना लेते थे. वेनेजुएला का बजट जिस तरह अमेरिका के नियंत्रण में चला गया है, वो आज के समय का उपनिवेशवाद है. मध्यकाल में गुलामी प्रथा मौजूद थी. अब अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने भी मध्यकाल की बर्बर गुलामी प्रथा को कानूनी मान्यता दे दी है. मध्यकाल की तरफ वापसी का ठीकरा अक्सर अफगानिस्तान जैसे देशों पर फोड़ा जाता है. लेकिन वेनेजुएला का उदाहरण बताता है कि इसके लिए ट्रंप भी कम जिम्मेदार नहीं हैं.