
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय

एक अध्ययन में दक्षिण एशियाई लोगों के आंत के माइक्रोबायोम के अनूठेपन का पता चला है, जो जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के उपचार की दृष्टि से बेहद अहम है
प्रविष्टि तिथि: 25 AUG 2026 5:45PM by PIB Delhi
सबसे बड़ी और भौगोलिक रूप से सबसे विविध अन्वेषणों में से एक में यह पाया गया है कि दक्षिण एशियाई लोगों के आंत का माइक्रोबायोम दुनिया के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले माइक्रोबायोम से अलग होते हैं और ये स्थानीय संस्कृति, खान-पान, भूगोल एवं जीवनशैली से प्रभावित होते हैं।
ये निष्कर्ष दक्षिण एशियाई आबादी के लिए, विशेषकर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के मामले में, माइक्रोबायोम-आधारित निदान (डायग्नोस्टिक्स), व्यक्तिगत पोषण और सटीक स्वास्थ्य संबंधी देखभाल विकसित करने की प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं।
दक्षिण एशिया में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। इसके साथ-साथ मोटापा, मधुमेह और हृदय व मेटाबॉलिज्म से जुड़ी दूसरी बीमारियों में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। भले ही इस बात का पता है कि आंत के माइक्रोबायोम पर शहरीकरण का प्रभाव पड़ता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि दक्षिण एशिया की अलग-अलग आबादी में ये बदलाव एक जैसे होते हैं या नहीं।
अब तक, अधिकांश माइक्रोबायोम संबंधी अनुसंधान यूरोप और उत्तरी अमेरिका की आबादी पर किए गए हैं। इससे ऐसे अनुसंधानों में दक्षिण एशिया का प्रतिनिधित्व काफी कम रहा है, जबकि यहां दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी रहती है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने शिकागो विश्वविद्यालय और भारत, श्रीलंका तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर एक अध्ययन तैयार किया, जिसका उद्देश्य विभिन्न सांस्कृतिक, आहार संबंधी और इकोलॉजिकल परिवेशों में आंत के माइक्रोबायोम पर बदलती जीवनशैली के प्रभाव को समझना और दक्षिण एशिया की विविधता को दर्शाने वाला एक व्यापक माइक्रोबायोम संसाधन सृजित करना था।

चित्र 1. भारत और श्रीलंका में नमूना संग्रह (सैंपलिंग) के स्थान
उन्होंने पाया कि हर समुदाय के आंत के माइक्रोबायोम में होने वाले बदलाव, वहां की स्थानीय संस्कृति, खान-पान, भूगोल और जीवनशैली से निर्धारित होने वाले अपने अनूठे माइक्रोबायोम संबंधी विकास-क्रम का पालन करते हैं।
शोधकर्ताओं ने दक्षिण एशियाई समुदायों के 575 स्वस्थ वयस्कों से उनके खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों के साथ-साथ मल के नमूने भी एकत्रित किए।
बीएसआईपी के वैज्ञानिकों द्वारा भारत में पहली बार लॉन्च किए गए ‘साउथ एशियन माइक्रोबायोम ऐरे (सांबर)’ का उपयोग करके, भारत और श्रीलंका के दस सांस्कृतिक एवं भौगोलिक रूप से अलग-अलग समुदायों के 575 वयस्कों के आंतों के माइक्रोबायोम का विश्लेषण किया गया।
बैक्टीरियल 16एस आरआरएनए जीन की हाई-थ्रूपुट डीएनए सीक्वेंसिंग और उसके बाद एडवांस्ड बायोइन्फॉर्मेटिक एनालिसिस का उपयोग करके आंत के माइक्रोबायोम की पहचान की गई। शोधकर्ताओं ने हर समुदाय के अंदर ग्रामीण व शहरी लोगों की तुलना की और साथ ही दक्षिण एशियाई माइक्रोबायोम की तुलना वैश्विक डेटासेट से भी की।
इस परियोजना में भारत, श्रीलंका और संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिकों के बीच एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल था, जिसका नेतृत्व लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज में प्राचीन डीएनए के ग्रुप हेड डॉ. नीरज राय ने किया। फील्ड टीमों ने भारत और श्रीलंका में स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम किया ताकि प्रतिभागियों को शामिल किया जा सके और जैविक नमूने व जीवनशैली से जुड़ी जानकारियां एकत्रित की जा सकें।
इस अध्ययन में समुदाय को शामिल करने वाला तरीका अपनाया गया और इसमें शोधकर्ताओं ने अध्ययन के निष्कर्षों को उन समुदायों के साथ साझा किए जो इसमें शामिल थे। इसके बाद, आंतों के सूक्ष्मजीवों की विविधता (गट माइक्रोबियल डाइवर्सिटी) को समझने और भूगोल, खान-पान, शहरीकरण व मेटाबोलिक स्वास्थ्य के साथ उनके संबंधों की पहचान करने हेतु प्रयोगशाला विश्लेषण, डीनए सीक्वेंसिंग और अभिकलनात्मक विधि (कंप्यूटेशनल मेथड) का उपयोग किया गया।
इस तरीके के जरिए श्रेया एल. रामचंद्रन, नागार्जुन पसुपुलेटी, रिचर्ड जे. एब्दिल, नीरज राय और मानसा राघवन की अगुवाई वाली टीम को शहरीकरण और मेटाबोलिक स्वास्थ्य से जुड़े समुदाय-विशिष्ट के सूक्ष्मजीवों से संबंधित संकेतों (कम्युनिटी-स्पेसिफिक माइक्रोबियल सिग्नेचर) और सूक्ष्मजीवों से संबंधित आम बदलावों की पहचान करने में मदद मिली।
‘गट माइक्रोब्स’ नाम के जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन, वैश्विक माइक्रोबायोम अनुसंधान में उन आबादी को शामिल करने के महत्व पर जोर देता है जिनका प्रतिनिधित्व अब तक कम रहा है। यह भारत के स्वस्थ लोगों से जुटाया गया आंतों के माइक्रोबायोम का पहला बेसलाइन डेटा है और इसके व्यापक चिकित्सीय और विकासवादी प्रभाव हैं।
अलग-अलग समुदाय द्वारा शहरीकरण पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दिए जाने के तथ्य को दर्शाने वाला, यह अध्ययन बताता है कि भविष्य में माइक्रोबायोम-आधारित उपचार के तरीके सिर्फ पश्चिमी आबादी के आधार पर विकसित करने के बजाय क्षेत्रीय आबादी के हिसाब से तैयार किए जाने चाहिए। ‘सांबर’ का संसाधन भविष्य में मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और जीवनशैली से जुड़ी अन्य बीमारियों पर शोध में भी मदद करेगा, जो पूरे दक्षिण एशिया में तेजी से बढ़ रही हैं।
प्रकाशन लिंक: DOI: 10.64898/2026.01.22.701183.
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