India Bangladesh Tension: विदेश मंत्री एस. जयशंकर का बांग्लादेश दौरा इस वक्त चर्चा का सबसे बड़ा टॉपिक है. वो वहां बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए गए थे. उनकी ये यात्रा महज एक शोक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने दक्षिण एशियाई राजनीति में कई अहम संकेत छोड़े हैं. जैसे ही जयशंकर बांग्लादेश पहुंचे, उन्होंने सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया. उन्होंने इस यात्रा के दौरान अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस से दूरी बनाए रखी, जबकि विपक्षी दल बीएनपी नेता तारिक रहमान से मुलाकात की. अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर भारत ने यह रुख क्यों अपनाया और ढाका को इससे क्या संदेश गया है? आइए समझते हैं.

यूनुस से दूरी का संदेश क्या है?

सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर मोहम्मद यूनुस से दूरी क्यों बनाए रखी गई? इस सवाल को लेकर विदेश नीति से जुड़े जानकार मान रहे हैं कि भारत इस वक्त बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है. इसके पीछे कई वजह हैं. बांग्लादेश में मचे बवाल के बीच पिछले कुछ दिनों से यूनुस के नेतृत्व में बने सेटअप पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और भारत-विरोधी घटनाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं. हिंदू समुदायों पर हमलों और मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाओं से भारत चिंतित है. इन तमाम घटनाओं के चलते भारत ने शीर्ष स्तर की बैठक से दूरी बनाकर एक तरह से अपनी नाराजगी परोक्ष रूप से जाहिर की है.

तारिक रहमान से मुलाकात क्यों अहम है?

एस जयशंकर की बीएनपी नेता तारिक रहमान से मुलाकात क्यों हुई? इसे लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है. जयशंकर का तारिक रहमान से मिलना एक सोचा-समझा कूटनीतिक कदम माना जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि तारिक रहमान न सिर्फ खालिदा जिया के बेटे हैं, बल्कि उन्हें बांग्लादेश के अगले संभावित प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जा रहा है. पिछले दिनों तारिक ने जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी सहयोगियों से दूरी बनाई है. वो अब ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की बात करते नजर आते हैं. इस मुलाकात को लेकर ये भी कहा जा रहा है कि भारत भविष्य के राजनीतिक विकल्पों पर नजर बनाए हुए है.

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आखिर भारत ने क्या मैसेज दे दिया?

उधर नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों के प्रतिनिधियों का यूनुस से मिलना यह दिखाता है कि अंतरिम सरकार अंतरराष्ट्रीय संपर्क बनाए रखना चाहती है, लेकिन भारत ने अलग रास्ता चुना है. भारत की ये रणनीति इस ओर भी इशारा करती है कि केंद्र सरकार जल्दबाजी में किसी एक सत्ता केंद्र को समर्थन देने के बजाय हालात साफ होने का इंतजार कर रही है. यहां ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जयशंकर की यह यात्रा एक इनविजुअल मैसेज देकर गई है कि भारत न तो टकराव चाहता है और न ही आंख मूंदकर समर्थन. जबतक बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत के हितों को लेकर स्पष्टता नहीं आती, तब तक नई दिल्ली का रुख संयमित और सतर्क ही रहने वाला है.

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