यमन के मुकल्ला बंदरगाह शहर पर सऊदी अरब ने हवाई हमला किया है. सऊदी अरब का कहना है कि वहां संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से अलगाववादी गुटों के लिए हथियारों की खेप पहुंची थी, जिसे रोकने के लिए यह हमला किया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दो सुन्नी मुस्लिम देश आपस में क्यों लड़ रहे हैं, वो भी किसी तीसरे मुल्क की जमीन पर? चलिए समझे हैं इस पूरे विवाद को. 

सबसे पहले यमन के बारे में जान लेते हैं. यमन अरब देशों में एख बेहद गरीब मुल्क है, हालांकि यह रणनीतिक तौर पर बहुत है. यहां से एक समुद्री रास्ता गुजरता है, जहां से दुनिया का बड़ा कारोबार होता है. साथ ही यमन दो हिस्सों में बंटा हुआ है. राजधानी सना समेत उत्तर यमन में हूतियों का कब्जा है. यहां हूती इतने मजबूत हैं कि यमन की सरकार को भी इस क्षेत्र से अलग कर दिया है. हूती सऊदी अरब के खिलाफ हैं और इन्हें ईरान का समर्थन हासिल है और यही बात सऊदी अरब को सबसे ज्यादा खलती है. ऐसे में सऊदी अरब का सोचना है कि अगर यमन के अंदर हूती मजबूत होते हैं तो ईरान उसकी सरहदों तक पहुंच जाएगा. ऐसे में 2015 में सऊदी अरब ने यमन में यह कहते हुए जंग शुरू कर दी कि हम असली सरकार को वापस लाएंगे. 

यमन में कैसे अलग-अलग हो गए दो मित्र

वहीं अगर UAE की बात करें तो वो भी सऊदी अरब के साथ यमन में असली सरकार की वापसी के लिए आया था. यानी पहले सऊदी अरब और यूएई मिलकर हूतियों के खिलाफ जंग लड़ रहे थे. हालांकि जब यह जंग लंबी चली तो UAE ने इस जंग को अलग नजरिये से देखना शुरू कर दिया. UAE ने देखा कि पूरे यमन को संभालना मुश्किल है लेकिन दक्षिण यमन पर पकड़ मजबूत की जा सकती है और दक्षिण यमन में ही बंदरगाह, तेल और समुद्री रास्तों पर कंट्रोल है. दक्षिण यमन के अंदर STC यानी सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल को UAE सपोर्ट करता है. UAE ने STC को हथियार और ट्रेनिंग में मदद की. STC की मांग है कि यमन को दो हिस्सों में बांटा जाए और एक हिस्सा उनको दिया जाए. हालांकि सऊदी अरब ऐसा नहीं चाहता, वो चाहता है कि यमन के एक ही देश बना रहे, उसकी सरहदें महफूज रहें, कोई नया और अलग देश ना बने. इसी विवाद को दो सुन्नी देश (सऊदी अरब-UAE) अलग-अलग हो गए. ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि दोनों का दुश्मन एक था लेकिन लड़ते-लड़ते मंजिल अलग-अलग हो गई. 

Add Zee News as a Preferred Source

दोस्ती में टकराव की अलग वजह

दरअसल सऊदी अरब को लगता है कि UAE जिन लोगों को मजबूत कर रहा था, वही उसकी योजना को बिगाड़ रहे हैं. सऊदी को लगा कि UAE अपने फायदे के लिए पीछे से अलग खेल खेल रहा है. हाल ही में मुकल्ला शहर में हुई बमबारी के बाद यह विवाद खुलकर सामने आ गया. हालांकि UAE का कहना है कि उसने हथियार नहीं भेजे थे, बल्कि सिर्फ गाड़ियां भेज रहे थे. विवाद बढ़ने के बाद अब UAE ने कहा कि हम अपनी फोर्सेस वापस बुला रहे हैं.

सऊदी अरब और ईरान की लड़ाई

अब बात करते हैं ईरान की. यह तो जगजाहिर है कि ईरान और सऊदी अरब दो दुश्मन देश हैं. कहने को तो दोनों इस्लामी देश हैं लेकिन सऊदी अरब कट्टर सुन्नी देश है, जबकि ईरान पूरी दुनिया के शियाओं का केंद्र है. धार्मिक वजह के अलावा राजनीतिक और क्षेत्रीय ताकत को लेकर टकराव है. सऊदी चाहता है कि ईरान उसके आसपास ना फैले. जबकि ईरान यह चाहता है कि मिडिल ईस्ट में उसकी वर्चस्व रहे.

चालाकी से गम खेलता है ईरान

ईरान की खास बात है कि वो खुद सीधे जंग के मैदान में नहीं उतरता. बल्कि स्थानीय समूहों को सपोर्ट करता है. जैसे, लेबनान में → हिजबुल्लाह, इराक में → शिया मिलिशिया और यमन में → हूतियों को समर्थन करता है. इसी प्रक्रिया को प्रॉक्सी वॉर भी कहा जाता है. यानी यह भी कहा जा सकता है कि दूसरे के कंधों पर बंदूक रखकर अपने हितों को साधना. यमन के अंदर हूती ऐसी जगह पर कब्जा किए हुए हैं, जहां से सऊदी अरब दबाव में रहेगा. ऐसे में सऊदी अरब को डर है कि ईरान धीरे-धीरे उसे चारों तरफ से घेर रहा है. उत्तर में ईरान समर्क ईराक, पश्चिम में लेबनान से हिजबुल्लाह और दक्षिण में यमन में हूती. इसलिए सऊदी अरब यमन में जंग लड़ रहा है.