
उप राष्ट्रपति सचिवालय

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक विस्थापन में से एक था
विभाजन केवल सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण नहीं था, इसने हजारों वर्षों में निर्मित हमारी सांस्कृतिक विरासत को बांट दिया: उपराष्ट्रपतिसीमाओं के जल्दबाजी में किए गए बंटवारे ने ऐसे विवादों को जन्म दिया जिनके प्रभाव आज भी देखने को मिलते हैं: उपराष्ट्रपति
हमारे बच्चों को विभाजन का सच जानने का पूरा हक है: उपराष्ट्रपति
स्वतंत्रता अनमोल है, एकता अनिवार्य है, शांति को कभी भी स्थायी मानकर नहीं चला जा सकता: उपराष्ट्रपति
प्रविष्टि तिथि: 14 AUG 2026 6:08PM by PIB Delhi
उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के सहयोग से दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज‘ द्वारा ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस‘ के अवसर पर आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित किया। यह संगोष्ठी ‘भारत का विभाजन – विस्थापन, त्रासदी और पुनर्वास की एक गाथा‘ विषय पर केंद्रित थी, जिसमें 1947 के भारत विभाजन की कहानी को रेखांकित किया गया।
Vice-President Shri C. P. Radhakrishnan today addressed a National Seminar on the occasion of Partition Horrors Remembrance Day, organised by the Centre for Independence and Partition Studies, University of Delhi, in association with the Indian Council of Historical Research… pic.twitter.com/jL9imDfFpA
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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने संगोष्ठी में उपस्थित विभाजन की विभीषिका झेल चुके पीड़ितों के प्रति गहरा आदर व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि देश अपने इतिहास के ‘सबसे दुखद और अमानवीय अध्यायों‘ में से एक पर चिंतन करने के लिए एकत्र हुआ है।
उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि विभाजन को याद करने का उद्देश्य कड़वाहट के साथ पुराने जख्मों को कुरेदना नहीं, बल्कि आपसी एकता और सौहार्द को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि देश जब स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, तब हमें उन लोगों के त्याग और असीम पीड़ा को याद करने के लिए कुछ पल ठहरना ही होगा, जिन्होंने विभाजन का दंश झेला था।
श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने रेखांकित किया कि स्वतंत्रता यद्यपि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति लेकर आई, लेकिन इसके साथ ही एक अभूतपूर्व त्रासदी और मानव इतिहास का सबसे बड़ा जन-विस्थापन भी हुआ। उन्होंने कहा कि उस त्रासदी का विशाल पैमाना आज भी इस बात की गंभीर चेतावनी है कि विभाजन और नफरत के परिणाम कितने विनाशकारी हो सकते हैं।
उपराष्ट्रपति ने इस इतिहास को सहेजने और इसके अध्ययन के लिए वर्ष 2023 में ‘सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज‘ की स्थापना करने पर दिल्ली विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने उल्लेख किया कि इस केंद्र ने बेहद कम समय में विभाजन का दंश झेल चुके सौ से अधिक लोगों के मौखिक संस्मरणों (साक्षात्कारों) को दर्ज किया है और व्याख्यानों, अभिलेखागारों तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से युवा विद्यार्थियों को निरंतर इससे जोड़ रहा है।
उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने जोर देकर कहा, ‘हमारे बच्चों को विभाजन का पूरा सच जानने का अधिकार है।‘ उन्होंने रेखांकित किया कि इतनी बड़ी त्रासदी को पाठ्यपुस्तकों की महज कुछ पंक्तियों तक सीमित नहीं समेटा जा सकता। उन्होंने इस शाश्वत विचार को भी दोहराया कि जो लोग अतीत को भुला देते हैं, वे उसकी त्रासदियों को दोहराने के जोखिम में आ जाते हैं।
विभाजन के व्यापक ऐतिहासिक परिणामों का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि जल्दबाजी में सीमाएं फिर से तय करने से ऐसे विवाद पैदा हुए, जिनके दुष्प्रभाव आज भी देखने को मिलते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि विभाजन का भारत की रक्षा नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर दूरगामी और स्थायी प्रभाव पड़ा है।
विभाजन से मिले सबक और संकट के समय नेतृत्व के महत्व पर विचार व्यक्त करते हुए श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि व्यापक राष्ट्रीय हित में कठिन निर्णय लेने के लिए राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
विभाजन के दौरान घटी घटनाओं का स्मरण करते हुए उपराष्ट्रपति ने तैयारी और ज़िम्मेदाराना निर्णय प्रक्रिया के महत्व पर बल दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि लोगों की सुरक्षा और संरक्षा को प्रभावित करने वाले निर्णय पर्याप्त पूर्व सूचना के साथ लिए जाने चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर नागरिक की सुरक्षा और संरक्षा सदैव सर्वोपरि प्राथमिकता होनी चाहिए।
Vice-President Shri C. P. Radhakrishnan felicitated the Partition survivors in recognition of their courage, resilience and contribution to preserving the memories and lived experiences of Partition on the occasion of Partition Horrors Remembrance Day in University of Delhi… pic.twitter.com/N4e24iTsio
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उन्होंने आगे कहा कि विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं को फिर से तय करना नहीं था, बल्कि इसने हजारों वर्षों से आपस में जुड़ी सांस्कृतिक और सभ्यतागत धरोहर को भी बांट दिया। उन्होंने सिंधु नदी, करतारपुर साहिब, ननकाना साहिब, प्राचीन शक्तिपीठों और हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा तक्षशिला की पुरातात्विक विरासत सहित कई महत्वपूर्ण सभ्यतागत, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों तक पहुँच में आई बाधाओं का भी उल्लेख किया।
उपराष्ट्रपति ने नागरिकों का आह्वान किया कि वे संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि रखें। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कोई भी जाति, धर्म या क्षेत्र राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय को भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए और उस साझी सभ्यतागत सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीय पहचान के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए, जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरोती है।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने विभाजन का दंश झेल चुके 15 लोगों को सम्मानित किया। यह सम्मान उनके साहस, हिम्मत और विभाजन की स्मृतियों तथा जीवन-अनुभवों को सहेजने में उनके योगदान के प्रति आभार स्वरूप दिया गया।
Vice-President Shri C. P. Radhakrishnan also witnessed an exhibition organised by the ICHR and the University of Delhi on the occasion of Partition Horrors Remembrance Day. He said that the exhibits offered a powerful reminder of the enormous human cost of Partition. pic.twitter.com/wBF2Wgm0r5
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संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के अध्यक्ष प्रोफेसर राघवेंद्र तंवर, संकाय प्रमुख (डीन ऑफ कॉलेजेज) प्रोफेसर बलराम पाणि और रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता के अलावा शिक्षाविद, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और विभाजन के पीड़ित उपस्थित रहे।
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