Donald Trump on Greenland: आज की तारीख में एक ही शख्सियत पूरी वर्ल्ड मीडिया की हेडलाइन्स में छाई हुई है और वो है डोनाल्ड जे ट्रंप. अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति, जिन्हें कोई सनकी सिरफिरा कह रहा है, तो कोई घमंडी. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने तो दावोस में दी गई अपनी स्पीच में तो ट्रंप दुनिया का सबसे बड़ा और खतरनाक बुली तक करार दे दिया. कोई ट्रंप के टेंपरामेंट को वर्ल्ड पीस के लिए डेंजरस बता रहा है. कोई उनके अड़ियल रवैये को खतरनाक बता रहा है. आखिर दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ऐसे जिद्दी क्यों दिख रहे हैं.

क्या कोई कोई खास कसर पूरा करने पर अमादा हैं ट्रंप’?

इसी 20 जनवरी को ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा किया. इस साल वो 80 साल के होने वाले हैं. तो क्या इस कार्यकाल में कोई खास कसर पूरा करने पर अमादा हैं ट्रंप. टैरिफ अटैक से लेकर अप्रवासियों को डिपोर्ट करन और किसी देश में घुसकर राष्ट्रपति को उठाने तक ट्रंप ने पिछले एक साल में इतना कुछ कर दिया है कि दुनिया में आज ट्रंप के नाम खलबली मची हुई है. 

Add Zee News as a Preferred Source

 ग्रीनलैंड से लेकर कनाडा को अमेरिका में मिलाने का जो दावा कर रहे हैं, वो ट्रंप के ऑफिशियल हैंडल पर साकार है. ट्रंप का ये अड़ियल रुख कितना डरावना हो चुका है, इसकी झलक मिलती है दावोस मे चल रहे वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम में. वहां पर ट्रंप अपनी धुन में जो कहना था कह गए. वो दुनिया के सामने कह गए कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए अहम है. वो भूल गए ग्रीनलैंड पर यूरोप में अमेरिकी विस्तारवाद का तीखा विरोध हो रहा है. दावोस में उन्होंने सबसे सामने कह दिया कि डेनमार्क एहसान-फरामोश है.

मतलब चाहे कुछ हो, अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ग्रीनलैंड हड़पकर रहेंगे चाहे इसकी क़ीमत यूरोप क्यों न हो. दावोस में ट्रंप ने ये तेवर तब दिखाए, जब ट्रंप के भाषण से कुछ देर पहले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच पर जो बातें ट्रंप के खिलाफ सुनाई दीं, वो बहुत देर तक गूंजेगी. 

‘आक्रामकता से निपटने के लिए होना पड़ेगा एकजुट’

दावोस में चीन ने कहा कि दुनिया में जंगल का कानून नहीं चल सकता, जहां ताकतवर अपने से कमजोर को कुचल दे. वहीं कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने कहा कि दुनिया के छोटे देशों को एकजुट होना पड़ेगा, ताकि अमेरिका जैसे आक्रामक सुपरपावर्स का मुकाबला कर सकें. 

आखिर में यूरोप का दूसरी बड़ी सुपरपावर फ्रांस और उसके राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने कहा कि हम एक ऐसे नियम विहीन दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों को पैरों तले कुचला जा रहा है. यहां सिर्फ ताकतवर का कानून चल रहा है. ये बयानों की सुर्खियां ट्रंप ने भी सुनी होंगी, लेकिन क्या इतनी सख्त आलोचना से ट्रंप क्या अपने सनक भरे फैसलों से पीछे हटेंगे.

डॉनल्ड ट्रंप और बैकफुट? ये मुमकिन नहीं. ट्रंप अपने सख्त फैसलों से ना तो पिछले कार्यकाल में पीछे हटे और ना ही इस कार्यकाल के पहले साल में ऐसे कोई संकेत दिखाई दे रहे. तो आखिर ट्रंप कैसी दुनिया की कल्पना करते हैं. 

2020 का चुनाव हारने के बाद 2025 में डॉनल्ड ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ ली. तब पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का एक तंज काफी वायरल हुआ था. ईश्वर अब अमेरिका और बाकी दुनिया को बचाए. तब भले ही बराक ओबामा के उस बयान को एक विरोधी का बयान बताकर खारिज कर दिया गया, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप अपने फैसलों से वही बात अब सच साबित कर रहे हैं.

पावर में आते ही ट्रंप का ‘गेम’!

मिसाल के तौर पर, शपथ लेते ही ट्रंप ने डॉज यानी डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिसिएसी नाम का विभाग बना दिया. ट्रंप ने कहा कि वो सरकार को छोटा और सस्ता बनाएंगे. इसके लिए कई विभागों का बजट काटा और हजारों कर्मचारियों की छंटनी की. इससे बड़ा झटका लगा USAID को. इससे दुनिया भर में अमेरिकी मदद से चलने वाले डेवेलपमेंट प्रोजेक्ट्स ठप पड़ गए.

‘ग्रीनलैंड की सुरक्षा हमारे सिवाय कोई नहीं कर सकता’, दावोस के वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम में ट्रंप ने फिर दिखाई जिद

ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही AEA यानी एलियन एनिमिज एक्ट बनाया और अप्रवासियों पर सख्ती शुरू कर दी. अप्रवासियों के वीजा फ्रीज करने से लेकर ICE की रेड में हजारों लोगों को पकड़ा और बेहद अपमानजनक तरीके से डिपोर्ट करना शुरू किया. डिपोर्ट करने के दौरान अप्रवासियों के हाथ में बेड़ियां पहनाई गई. 

दूसरे कार्यकाल के शुरुआत में ही ट्रंप ने अजीबोगरीब ट्रेड वार शुरू कर दिया. पहले चीन, कनाडा और मेक्सिको पर भारी टैरिफ लगाया. उसके बाद अप्रैल में करीब सभी देशों पर 10 फीसदी टैरिफ लगा दिया. भारत जैसे कई देशों पर 50 फीसदी टैरिफ और 500 फीसदी की धमकी के साथ पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया. 

पहले साल में 7 देशों पर किया हमला

ट्रंप के ये ऐसे फैसले थे, जिसका असर सबसे ज्यादा अमेरिका पर पड़ा. इसके खिलाफ लोग कोर्ट गए, ट्रंप के फैसलों को चुनौती दी गई, लेकिन ट्रंप अपने किसी फैसले से पीछे नहीं हटे. वो एक ही बात रटते रहे- अमेरिका को ग्रेट बनाने के लिए ऐसे फैसले जरूरी हैं. अब आते हैं, ट्रंप के मिलिट्री ऑपरेशन पर.

दूसरे कार्यकाल के पहले साल ट्रंप का 7 देशों पर हमला और वजह…? अमेरिका का अपना गढ़ा हुआ नैरेशन- अमेरिका फर्स्ट. पहले ट्रंप की ये हिटलिस्ट देखिए. इनमें 1.ईरान 2. इराक 3. नाइजीरिया 4.सोमालिया  5.सीरिया 6.वेनेजुएला 7.यमन के नाम शामिल हैं. 

ट्रंप का रुख कितना हमलावर रहा है, इसका नक्शा दुनिया के मानचित्र पर इन 7 देशों से साफ हो जाता है. ट्रंप ने कार्यकाल के पहले साल ही बम फर्स्ट की नीति अपनाई और 7 देशों पर 530 हवाई हमलों के ऑर्डर पर साइन किए. इसमें ईरान के 3 परमाणु ठिकाने भी शामिल रहे. 

दिलचस्प बात ये कि ईरान पर हमले का ऑर्डर ऐसे वक्त में दिया. जब वो एक तरफ हमास और इजराइल के बीच सीजफायर कराने की पहल कर रहे थे. तब दुनिया को लगा था, कि ट्रंप गाजा में इजराइली सेना के अटैक को रोक कर मिडिल ईस्ट में शांति स्थापना की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन ईरान पर हमला बताता है कि ट्रंप का मूड समझना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है. 

ग्रीनलैंड के लिए नाटो से भिड़ने को तैयार

दिलचस्प बात ये है कि इजराइल के साथ ईरान तनातनी और ट्रंप की धमकी के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने 20 जून को बयान दिया कि ईरान पर हमले का फैसला राष्ट्रपति 2 हफ्ते बाद लेंगे. लेकिन 2 दिन बाद ही ईरान के परमाणु ठिकाने पर हमला हुआ. यही हाल वेनेजुएला मिलिट्री ऑपरेशन के दौरान हुआ. वेनेजुएला के राष्ट्रपति ने 1 जनवरी को बातचीत की पेशकश की. लेकिन ट्रंप ने कुछ नहीं बोला और 3 जनवरी को हमला कर दिया.

किसी देश में घुसकर चुने हुए राष्ट्रपति को इस तरह उठा लाना. दुनिया के आधुनिक इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ. लेकिन ट्रंप निकोलस मादुरो को उठाने और एक कैदी की तरह सुलूक को जस्टिफाई करते रहे. ट्रंप के इस रुख की आलोचना रूस चीन समेत दबे स्वर में कुछ यूरोपीय देशों ने भी की. लेकिन ट्रंप इनकी सुनने की बजाय इन्हें ही धमकाने लगे.

खासतौर पर नाटो के सदस्य देशों को, जो ग्रीनलैंड पर ट्रंप के प्लान का विरोध कर रहे हैं. वेनेजुएला के बाद ट्रंप के अगले टारगेट पर ग्रीनलैंड था, जिसे अमेरिका की सुरक्षा के लिहाज से ट्रंप अपना कब्जा जायज बताते हैं. हद तो ये कि इसके लिए ट्रंप नाटो से ये कहते हुए भिड़ने को तैयार है कि नाटो को खड़ा रखने में सबसे ज्यादा योगदान उन्होंने ही किया है.

बेशर्मी के साथ मचाडो से लिया नोबेल प्राइज

ट्रंप हर कीमत पर दुनिया में अमेरिका का दबदबा चाहते हैं. चाहे इसके लिए किसी देश पर हमला करना पड़े या फिर भारी टैरिफ लगाकर उसकी अर्थव्यस्था चौपट करनी पड़े. आक्रामक और हमलावर तेवरों के बीच यही ट्रंप खुद को दुनिया का सबसे बड़ा शांति दूत कहते हैं. ट्रंप मानते हैं कि नार्वे की नोबल प्राइज कमेटी ने उन्हें शांति पुरस्कार न देकर बड़ी गलती की है, क्योंकि उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में 8 युद्ध रुकवाए है. 

जिस तरह डॉनल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला की शांति पुरस्कार विजेता मारिया मचाडो से नोबेल प्राइज की ट्रॉफी ली, इसे पूरी दुनिया में ट्रंप की बेशर्मी कहा गया. यहां तक कि नोबल कमेटी ने स्टेटमेंट जारी कर कह दिया कि नोबल पुरस्कार एक बार दिये जाने पर किसी को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता. लेकिन ट्रंप मारिया मचाडो को थैंक्यू कहते रहे कि नोबेल कमेटी ने ना सही, मारिया मचाडो ने तो उन्हें शांतिदूत समझा.

ट्रंप ऐसे उलूल जुलूल बयानों के लिए दुनिया भर में ट्रोल होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है किसी बात से शर्म नहीं आती. हालांकि सच यही है कि ट्रंप भले ही खुद को शांति दूत कहते रहे, लेकिन इसकी एक वाजिब मिसाल अब तक सामने नहीं आई.

शांति नहीं, ‘भ्रांति दूत’ हैं ट्रंप!

दावा- भारत पाक का युद्ध रुकवाया

सच- भारत ने ट्रंप के दावे को खारिज किया

दावा- यूक्रेन जंग रुकवाएंगे

सच- ट्रंप की बात ना पुतिन मान रहे ना जेलेंस्की

दावा- हमास- इजराइल में शांति

सच- गाजा में अब भी इजराइली हमले जारी, तनाव बररकरार है

4- दावा- ईरान पर ‘पीस बोर्ड’ बनाया

सच- ईरान पर अटैक की तैयारी कर रहे हैं ट्रंप. खामेनेई को खत्म करने की धमकी दे रहे हैं

तो भला कौन सी जंग रुकवा दी ट्रंप ने, जैसा कि वो दावा करते हैं?

खुद को शांति दूत कहने वाले ट्रंप का अंतिम सच यही है कि ये शख्स सत्ता के पहले साल दुनिया को महायुद्ध के कगार पर ले जा चुका है. अब तक ट्रंप ने WHO समेत दुनिया भर की 66 संस्थाओं से अमेरिका को बाहर कर लिया है. यानी ना किसी कायदे वाली संस्था का  सदस्य रहेंगे, ना ही वर्ल्ड ऑर्डर दुरुस्त रखने वाला नियम कानून मानेंगे.