DNA in Hindi on BRICS International Military Exercise: ट्रंप का लक्ष्य स्पष्ट है. वो खलीफा को झुकाना चाहते हैं और ऐसा वो किसी भी कीमत पर करना चाहते हैं. लेनिन ने कहा था कि जब कूटनीतिक और आंतरिक दबाव एक साथ डाला जाता है, तो घटनाएं तेज़ी से बदलती हैं. ईरान को कमजोर करने के लिए ट्रंप लेनिन का यही दांव खलीफा के खिलाफ आजमा रहे हैं. 

एक तरफ वो इंटरनल स्ट्राइक कर रहे हैं. इसके लिए प्रदर्शनकारियों को वैचारिक ईंधन देकर विद्रोह की आग को धधका रहे हैं. दूसरी तरफ वो कूटनीतिक हथियार से एक्सटर्नल अटैक भी कर रहे हैं. इसी का नतीजा है कि ब्रिक्स के अंतरराष्ट्रीय युद्धाभ्यास से भी ईरान को अलग कर दिया गया है.

युद्धाभ्यास से बाहर कर दिए गए ईरानी वॉरशिप

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ईरान का जहाज युद्धभ्यास में शामिल था, लेकिन अचानक ही वॉरशिप को किनारे लगाने का आदेश जारी हो गया. जो हुआ है, उसका संकेत ईरान के दृष्टिकोण से बहुत ही नकारात्मक है. ट्रंप ने ईरान को अलग-थलग करने का जो प्रयास शुरू किया था, उसका पहला रुझान आ गया है. इसलिए अब हम ईरान के अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार का विश्लेषण करेंगे.

दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स देशों का नौसैनिक अभ्यास चल रहा है. नाम है “विल फॉर पीस 2026”. साइमन टाउन के पास हो रहे इस युद्धाभ्यास का नेतृत्व चीन कर रहा है. भारत और ब्राजील इस युद्धाभ्यास में शामिल नहीं हैं. 2024 में ब्रिक्स में शामिल हुए ईरान के तीन वॉरशिप इसमें शामिल हुए. फ़ॉरवर्ड बेस सपोर्ट शिप IRIS मकरान 441, कोर्वेट युद्धपोत IRIS नागदी 82 और IRIS शाहिद महदावी.  

दक्षिण अफ्रीका ने क्यों लिया ऐसा सख्त फैसला?

9 जनवरी से 16 जनवरी तक नौसेना का ये युद्धाभ्यास चलेगा. लेकिन अचानक ही ईरानी जहाज की सक्रियता कम हो गई. कारण ये है कि साउथ अफ्रीका ने ईरान से अनुरोध किया कि वो नौसैनिक अभ्यास से खुद को अलग कर ले या फिर अपनी भूमिका सीमित कर ले. अचानक दक्षिण अफ्रीका के हुए इस मन-परिवर्तन को ईरान ने भी समझ लिया. अपने जहाज को किनारे कर लिया. अब आप भी समझिए कि जिस देश ने ईरान को नौसैनिक युद्धाभ्यस में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था, उसी ने क्यों उसे युद्धाभ्यास से अलग होने के लिए कहा?

आपको याद होगा कि 12 जनवरी को ट्रंप ने खलीफा को झुकाने के लिए “टैरिफ-चाल” चली थी. ट्रंप ने कहा था कि जो देश ईरान के साथ कारोबार करेंगे, उन देशों पर अमेरिका के साथ व्यापार करने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा. ईरान की इस घेराबंदी का सबसे पहला असर दक्षिण अफ्रीका पर हुआ है. दक्षिण अफ्रीका को अमेरिका के व्यापार, निवेश और विशिष्ट ट्रेड प्रोग्राम पर भरोसा है.

ब्रिक्स पर साफ दिख रहा यूएस का प्रभाव

इसलिए अमेरिका से अपने आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों को बचाने के लिए उसने ईरान को युद्धाभ्यास में सक्रिय भूमिका से किनारा करने के लिए कह दिया. नतीजा ये हुआ कि संयुक्त ड्रिल, फायरिंग, इंटर-ऑपरेबिलिटी में ईरान शामिल नहीं हुआ. ईरानी जहाज ऑब्जर्वर के रूप में रहे, मुख्य ऑपरेशन में शामिल नहीं हुए. यह BRICS Plus के तहत पहला ऐसा बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास था. इसमें चीन और रूस जैसे देश शामिल हैं. जो वैचारिक रूप से ईरान के करीब हैं. इसी में ईरान को अलग होना पड़ा. दक्षिण अफ्रिका के अनुरोध पर जो ईरान अलग हुआ, उसको लेकर रूस और चीन ने भी अब तक कुछ नहीं कहा है. जाहिर है कि पश्चिम देश या कहिए कि अमेरिका से मुकाबला करने के लिए जो ब्रिक्स बनाया गया था, उसमें ही अमेरिका का प्रभाव दिख रहा है.

The Art of War में सुन त्ज़ु ने लिखा है कि “युद्ध की सर्वोच्च कला यह है कि दुश्मन को बिना लड़े परास्त कर दिया जाए.” अमेरिकी दबाव में ब्रिक्स में दिखी ये दरार एक तरह से ट्रंप की जीत भी कही जा सकती है. घरेलू अस्थिरता के बीच ईरान का अंतरराष्ट्रीय अलगाव भी बढ़ा है. दूसरी तरफ जो ब्रिक्स ट्रंप की आंखों में चुभता रहा है. उसके फ्रेमवर्क में दबाव की वजह से बदलाव पहली बार देखा गया. इससे ना सिर्फ ईरान पर दबाव बढ़ा है बल्कि यह घटना BRICS की एकजुटता पर भी सवाल उठाती है. अमेरिकी दबाव से सदस्य एक-दूसरे के साथ सहयोग सीमित कर रहे हैं.

क्या ब्रिक्स समिट में भाग लेंगे पेजेश्कियान?

अब सवाल है कि क्या ब्रिक्स की बैठक में ईरान को शामिल किया जाएगा या नहीं? ये प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी साल अगस्त-सितंबर में ब्रिक्स की बैठक होने वाली है. इसकी अध्यक्षता हिंदुस्तान ही करने वाला है. कल ही 18वें ब्रिक्स समिट का लोगो लॉन्च हुआ. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत ऐसे अंतर-सरकारी संगठनों की जरूरतों पर जोर देगा, जो ‘वैश्विक झटके’ झेलने में सक्षम हों.

अब तक ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के भी पहुंचने की संभावना है. लेकिन जिस तरह से नौसैनिक युद्धाभ्यास से अचानक ही ईरान को किनारा कर दिया गया. उससे परेशानी खड़ी हो सकती है. भारत के लिए अमेरिका और ईरान दोनों देश मत्वपूर्ण है. ऐसी आशंका है कि अगर 2026 में ट्रंप की नीतियां और सख्त हुईं तो इसका असर पड़ सकता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान और अधिक अलग-थलग पड़ सकता है.