Bangladesh Elections 2026: शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में हुए पहले आम चुनाव में तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ( BNP) ने दो तिहाई बहुमत से जीत हासिल की है और कट्टरपंथी विचारधारा वाली जमात ए इस्लामी पार्टी को इस चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है. आखिर हार के बावजूद जमात-ए-इस्लामी जैसा कट्टरपंथी संगठन कैसे जीत गया? आज आपको समझना चाहिए कि कैसे भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर यानी भारत से सटे बांग्लादेश के इलाकों में जमात का कब्जा हो गया है? इसके साथ ही भारत और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने वाले बांग्लादेशी नेताओं का इस चुनाव में क्या हुआ?
चुनाव हारने के बावजूद जमात ए इस्लामी से भारत को खतरा क्यों है?
BNP गठबंधन ने 300 में से 216 सीटों पर जीत हासिल की है. वहीं जमात ए इस्लामी सिर्फ 76 सीटों पर ही जीत पाई. BNP की जीत के बाद तारिक रहमान का पीएम बनना लगभग तय है. पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान दिसंबर 2025 में 17 साल का निर्वासन काटकर वापस बांग्लादेश लौटे थे. भारत के प्रधानमंत्री ने BNP अध्यक्ष तारिक रहमान को जीत पर बधाई दी है. इस चुनाव में शेख हसीना का तख्तापलट करने में अहम रोल निभाने वाले छात्र नेताओं की नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) को करारी हार मिली है. NCP को महज 6 सीटों पर जीत मिली है. हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा के बीच हुए इस चुनाव में नया इतिहास रचा गया है. ढाका में पहली बार एक हिंदू सांसद चुना गया है. इस चुनाव में हारने के बावजूद जमात ए इस्लामी भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा क्यों है. भले ही जमात को 300 सीटों में से महज 76 सीटों पर ही जीत मिली है, लेकिन ये 76 सीटें भारत के लिए परेशानी का कारण बन गई हैं. जमात ने जिन 76 सीटों पर जीत हासिल की हैं उनमें से ज्यादातर भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित हैं. कोलकाता, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम से लगने वाले इलाकों में जमात ए इस्लामी का कब्जा हो गया है.
भारत के बॉर्डर इलाकों पर जीता जमात ए इस्लामी
सटखीरा जिला जो पश्चिम बंगाल से सटा है यहां 4 में से 4 सीटें जमात ने जीतीं. बांग्लादेश के कुश्तिया जिले की 4 में से 3 सीटें जमात की झोली में चली गईं. बागेरहाट में भी 4 में से 3 सीटों पर जमात का कब्जा हो गया है. इसके अलावा रंगपुर, शेरपुर, नाओगांव, जॉयपुरहाट, गाइबांधा जैसे जिलों में भी जमात को जीत मिली है. पश्चिम बंगाल और असम बॉर्डर से सटे जिलों में जमात की जीत चिंता का कारण इसलिए भी है क्योंकि इन इलाकों में जमात हमेशा से घुसपैठ, कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने, हथियारों की स्मगलिंग करने में लिप्त पाया गया है. अप्रैल 2025 में पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद में दंगे हुए थे. इन दंगों को भड़काने में बांग्लादेश से आए कट्टरपंथियों का हाथ बताया गया था. 2025 में ही असम STF ने जमात के समर्थित संगठन असारुल बांगला टीम के 8 कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया था. भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर अब जीत के बाद जमात अपनी गतिविधियों को बढ़ाने की तैयारी में है, जिससे खतरा कई गुना बढ़ गया है. पहला खतरा ये है कि कहीं भारत के बॉर्डर पर कट्टरपंथी विचारधारा का कंट्रोल न हो जाए. जमात 1971 से लेकर आज तक भारत विरोधी रहा है. ऐसे में खतरा इस बात का है कि बॉर्डर इलाकों में फुल कंट्रोल के बाद जमात भारत के खिलाफ कोई साजिश न रचे. भारत से सटे इलाकों में जमात की जीत से चिंता की दूसरी वजह है हिंदुओं के पलायन का खतरा. जमात ने जिन जगहों पर जीत हासिल की है वहां हिंदुओं का जीना मुश्किल हो जाएगा. जिसकी वजह से बांग्लादेशी हिंदू पलायन कर के भारत आने की कोशिश करेंगे.जमात की ये जीत से चिंता इसलिए भी है क्योंकि ये रणनीतिक तौर पर भारत के लिए बड़ा खतरा है. सरहदी इलाकों पर जमात के कब्जे से ये डर है कि कहीं जमात भारत में कट्टरपंथियों की घुसपैठ करवाकर नॉर्थ ईस्ट और बंगाल में अस्थिरता फैलाने की साजिश न रचे.
हिंदुओं के खिलाफ जमात की नफरत
बॉर्डर एरियाज में जमात की जीत से भारत की चिंताएं तो बढ़ी हैं, लेकिन बड़ी बात ये है कि बांग्लादेश की जनता ने जमात की विचारधारा को नकार दिया है और इसी के साथ साथ बांग्लादेश के चुनावी परिणाम ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया है. इस चुनाव में जमात ए इस्लामी को पाकिस्तान का पूरा सपोर्ट था. पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी ISI ने भी बैक चैनल से इस चुनाव में जमात को जितवाने के लिए पूरी कोशिश की थी. यूनुस ने भी जमात के लिए फ्रंटफुट पर बैटिंग की थी, लेकिन इन सब कोशिशों के बावजूद जमात 76 सीटों पर सिमट गई. जमात को नकार कर बांग्लादेश की जनता ने ये साबित कर दिया है कि उन्हें शरिया नहीं बल्कि स्थिरता चाहिए. पाकिस्तान समर्थित जमात की हार ने ये साबित कर दिया कि बांग्लादेश पाकिस्तान का प्रॉक्सी बनने को राजी नहीं है और BNP की जीत ने ये तय कर दिया है कि बांग्लादेश अभी भी मुख्यधारा की राजनीति पार्टी को देश की कमान सौंपना चाहता है. बांग्लादेश का 13वां संसदीय चुनाव हिंदुओं और हिंदुस्तान से नफरत की आड़ में हुआ है. जमात ए इस्लामी ने सीधे सीधे और पाकिस्तान बैकचैनल से इसे काफी बढ़ावा दिया. इस चुनाव में सबसे बड़ा कट्टरपंथी चेहरा था ममनूल हक ढाका-13 सीट से जमात ए इस्लामी के इस कट्टरपंथी नेता को करारी हार का सामना करना पड़ा है. इस शख्स के अंदर हिंदुओं और हिंदुस्तान के खिलाफ कितनी नफरत भरी पड़ी है. इसने कहा था,’ जो अल्लाह के सामने सिर नहीं झुकाता.. कभी मां सरस्वती के सामने, कभी मां काली के सामने, कभी मां दुर्गा के सामने, कभी तुलसी के सामने, पत्थर के सामने, गाय के सामने सिर झुकाता है. तुम अल्लाह के सामने सिर क्यों नहीं झुकाते, जिन लोगों को ये देश अच्छा नहीं लगता. जिन लोगों को इस्लाम अच्छा नहीं लगता. उन्हें अल्लाह हू अकबर की अवाज अच्छी नहीं लगती उन्हें बांग्लादेश की मिट्टी बर्दाश्त नहीं करेगी.’ ममनूल हक जिस तरह की बातें कर रहा है. कुछ इसी तरह की बातें जमात के हर नेता ने की. जमात के मुखिया शफीक उर रहमान ने तो हिंदुओं और हिंदुस्तान विरोधी बयान के साथ साथ इस्लामिक क्रांति तक का जिक्र किया था. जमात ए इस्लामी ने लोगों में जन्नत वाला पर्चा भी बंटवाया था, जिसमें ये लिखा गया कि जमात को वोट करने पर जन्नत नसीब होगी, लेकिन बांग्लादेश की जनता ने इस्लामिक क्रांति की जगह पर लोकतांत्रिक पार्टी को बहुमत दिया.
