वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को राजधानी कराकस से उठवाने की खबर जब भारत पहुंची तो कुछ पत्रकार नेहरू का दौर याद करने लगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर सेना के डेल्टा कमांडोज ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था. हिंदी के एक वरिष्ठ पत्रकार ने अमेरिकी ऐक्शन की भारत से तुलना कर दी. हां, वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला ने लिखा कि हम अपने आसपास की दुनिया को भूलते जा रहे हैं. हमें रूस, चीन या अमेरिका में दिलचस्पी है. ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अपने यहां उठवा लिया और हम रोने लगे पर यह नहीं पता कि नेहरू चाच ने नेपाल के राजा को उठवा लिया था. उन्होंने कहा, ‘अपहरण की यह परंपरा भारत से शुरू हुई थी और पंडित जवाहर लाल नेहरू इसके जनक रहे हैं.’ कुछ और लोगों ने सोशल मीडिया पर इसी बात को अलग तरीके से लिखा. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि नेहरू के समय में नेपाल में क्या हुआ था?
जिस समय भारत में अंग्रेजी शासन था, नेपाल के प्रधानमंत्री बरतानिया हुकूमत से अच्छे रिश्ते बनाकर रखे हुए थे. अंग्रेजों ने नेपाल के लिए रेलवे लाइन बिछाने जैसे कुछ काम भी गए. वहां राजा तो थे लेकिन नाममात्र के. रमेश पोखरियाल निशंक अपनी किताब में लिखते हैं कि विश्व युद्ध में 65 हजार गोरखा सैनिक ब्रिटिश फौज की ओर से लड़ने गए थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्र शमशेर कट्टर हिंदूवादी था. अपने पूर्व के प्रधानमंत्रियों की तरह उसने भी राजा को अधिकारविहीन ही रखा. आगे भीम शमशेर पीएम बना तो उसने पढ़े-लिखे लोगों को एक मंच पर आने नहीं दिया. उस समय भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू हो चुके थे. ऐसे में भीम शमशेर का दमन चक्र तेज हो गया. नेपाल में कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए.
नेपाल में राजा नाम के थे
पुस्तकालय खोलने पर जुर्माना लगाया गया. बापू से प्रेरित होकर चरखा कातने का प्रचार जिसने किया, उसे जेल मिली. राणा शाही का विरोध तेज हो चुका था. निशंक लिखते हैं कि बुद्धिजीवी लोग भारत चले गए और वहां से नेपाल में राणाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी. 1945 को भीम का बड़ा बेटा पद्म शमशेर प्रधानमंत्री बना. भारत से अंग्रेजों की हालत खराब हो चुकी थी. इधर नेपाल में प्रोटेस्ट बढ़ चुका था. राणा शासक के खिलाफ षड्यंत्र के आरोप में लोगों को फांसी दी जाने लगी. राजा त्रिभुवन को भी फंसाया जा रहा था. वह बड़ी मुश्किल से बचे.
भारत की आजादी से बाजी पलटी
भारत के आजाद होने पर राणा सरकार थोड़ी नरम पड़ी क्योंकि अंग्रेजों का सपोर्ट खत्म हो चुका था. पद्म शमशेऱ ने फौरन भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से संपर्क किया और नेपाल का संविधान बनाया जाने लगा. हालांकि राणा परिवार में इस पर झगड़ा हो गया. पद्म शमशेर से मार्च 1948 में जबरन इस्तीफा ले लिया गया और मोहन शमशेर प्रधानमंत्री बना. बताते हैं वह न चाहते हुए भी भारत आए और पीएम नेहरू से संधि की. उधर नेपाली नेताओं को कांग्रेस सपोर्ट कर रही थी. कलकत्ता में सम्मेलन के बाद नेपाली कांग्रेस की नींव पड़ी.
नेपाल में राणा विरोधियों पर अत्याचार जारी रही. सितंबर 1950 में एक दर्जन से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया गया और मोहन शमशेर ने राणा शासकों की हत्या का षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया. वह इन्हें फांसी दिलवाना चाह रहा था. हालांकि राजा त्रिभुवन को चाल समझने में देर नहीं लगी. उन्होंने लाल मोहर लगाने से मना कर दिया. ऐसे में माहौल गरमा गया.
एक दिन राजा ने महल छोड़ दिया
जयंत कुमार रे अपनी किताब इंडियाज फॉरेन रिलेशंस (1947-2007) में लिखते हैं कि अप्रैल 1950 में नेपाली कांग्रेस की स्थापना होने से नेपाल में बड़ा बदलाव दिखा. राणा विरोधी और डेमोक्रेसी समर्थक एक हो गए. उस समय यह आम धारणा बन चुकी थी कि नेपाल के नाममात्र के शासक राजा त्रिभुवन का नेपाली कांग्रेस के साथ गुप्त संपर्क था. इधर, नेपाल को राणा के शासन से आजाद कराने का कैंपेन तेज हो गया. इधर त्रिभुवन और उनके परिवार ने 6 नवंबर 1950 को महल छोड़ दिया.
अचानक भारतीय दूतावास में चले गए राजा
बताया जाता है कि राजा त्रिभुवन शाह ने कहीं घूमने जाने की बात कही थी और सपरिवार राजमहल से निकले थे. बेटे महेंद्र और बड़े पोते वीरेंद्र भी थे. उनका काफिला नेपाल में भारतीय दूतावास के ठीक सामने पहुंचा ही था कि अचानक गेट खुले और वह अंदर चले गए. दरवाजे बंद कर लिए गए.
जयंत कुमार लिखते हैं कि काठमांडू में राजा और उनका परिवार भारतीय दूतावास में पनाह ले चुका था. जैसे ही खबर फैली नेपाली कांग्रेस ने अपना आंदोलन तेज कर दिया. बीरगंज में गवर्नर और दूसरे अधिकारी पकड़ लिए गए. नेपाली कांग्रेस से जुड़ी मुक्ति सेना ने बीरगंज में एक समानांतर सरकार बना ली. इसी महीने नवंबर 1950 में पश्चिमी तराई के छोटे से शहर परासी पर के. आई. सिंह की लीडरशिप में राणा विरोधी आंदोलनकारियों ने कब्जा कर लिया.
दिल्ली से काठमांडू के लिए उड़ा प्लेन
10 नवंबर 1950 को नई दिल्ली से काठमांडू के लिए एक स्पेशल एयरक्राफ्ट उड़ता है. त्रिभुवन और उनके परिवार को भारत ले आया जाता है. उधर, प्रधानमंत्री मोहन शमशेर राणा ने भी चाल चली. उन्होंने ऐलान किया कि त्रिभुवन का तीन साल का पोता ज्ञानेंद्र नेपाल का महाराजाधिराज (देश का मुखिया) है. भारत इससे सहमत नहीं था और त्रिभुवन को नेपाल का मुखिया मानने पर अड़ा रहा. नई दिल्ली ने 8 दिसंबर 1950 को काठमांडू को एक मेमोरेंडम भेजा, जिसमें यह प्रस्ताव था कि नेपाल सरकार को सिर्फ चुने हुए सदस्यों की एक संविधान सभा बुलानी चाहिए. इसमें आगे एक अंतरिम लोकप्रिय सरकार बनाने का प्रस्ताव था, जिसमें मौजूदा प्रधानमंत्री और राणा परिवार के कुछ सदस्य भी शामिल होते. मोहन शमशेर राणा मान गए.
उन्होंने त्रिभुवन को नेपाल के राजा के तौर पर मान्यता दी और 50 प्रतिशत लोगों को रिप्रेजेंट करने वाली एक अंतरिम कैबिनेट बनाने का फैसला किया. साथ ही चुनाव कराने का भी फैसला किया. 15 फरवरी 1951 को राजा त्रिभुवन काठमांडू लौटते हैं. 18 फरवरी को एक शाही घोषणा से मंत्रियों की नई परिषद बनाई गई और एक लोकतांत्रिक संविधान का वादा किया गया. यह एक सदी तक चली राणा तानाशाही के खत्म होने का संकेत था. इस तरह भारत ने नेपाल के लोकतांत्रिक विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाई.
बाद में नेपाल के विदेश मंत्री बने ऋषिकेश शाह ने कहा था कि नेपाली स्वतंत्रता आंदोलन की असल शुरुआत भारत की धरती पर हुई थी.
