
DNA Analysis: डॉनल्ड ट्रंप के हुक्म पर अमेरिकी वायुसेना ने सीरिया में बमबारी का एक बड़ा मिशन पूरा किया है. इस मिशन में अमेरिकी वायुसेना ने इस्लामिक स्टेट के 70 टारगेट्स पर 100 बम गिराए हैं. अमेरिका ने इस मिशन को ऑपरेशन HAWK EYE नाम दिया है और दावा किया है कि इस बमबारी में इस्लामिक स्टेट के 5 बड़े कमांडर मारे गए हैं. साथ ही साथ अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट के 18 हथियारों के भंडारों को भी नष्ट कर दिया है. इस्लामिक स्टेट के आतंकियों पर किए गए इस हमले में अरब देश जॉर्डन की एयरफोर्स भी शामिल हुई थी. यानी ये अमेरिका और जॉर्डन का साझा ऑपरेशन था.
सोशल मीडिया पर बोले ट्रंप
हालांकि इस्लामिक स्टेट ने इस हमले को लेकर कोई अधिकारिक बयान जारी नहीं किया है लेकिन ट्रंप ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि ये हमला क्यों किया गया था और इस्लामिक स्टेट के आतंक को लेकर उनका अगला रुख क्या होगा. आतंक के खिलाफ ट्रंप का ये कथित प्रण आपको भी देखना और समझना चाहिए. अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म TRUTH SOCIAL पर ट्रंप ने लिखा है. अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने वाले आतंकियों के खिलाफ इस सैन्य अभियान को अंजाम दिया गया है. हम अपने सैनिकों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देंगे. एक महान शख्सियत सीरिया में चल रहे खून-खराबे को खत्म करना चाहती है और इस शख्सियत को मेरा और अमेरिका का पूरा समर्थन हासिल है. इस्लामिक स्टेट पर बारूदी हमले की जानकारी देते हुए ट्रंप ने जिस कथित महान शख्सियत का जिक्र किया है. वो और कोई नहीं बल्कि सीरिया में आतंक की सरकार चलाने वाला अहमद-अल-शरा है जो पिछले कुछ वक्त में ट्रंप के बेहद करीब आ गया है.
शरा को ट्रंप करेंगे सुरक्षित
इसी वजह से कहा जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट पर ट्रंप के इस हमले की वजह सिर्फ अमेरिकी सैनिकों का प्रतिशोध नहीं है. बल्कि इसका सबसे बड़ा मकसद सीरिया से अहमद-अल-शारा के विरोधियों को मिटाना है ताकि सीरिया में शरा की सत्ता सुरक्षित रहे. ट्रंप के हमलों से ये थ्योरी क्यों जोड़ी जा रही है. ये समझने के लिए आपको ट्रंप से जुड़ी एक क्रोनोलॉजी बेहद गौर से देखनी चाहिए. ये क्रोनोलॉजी आपको बताएगी कि आतंकी अहमद-अल-शरा के लिए ट्रंप क्या कर रहे हैं किस हद तक कर रहे हैं. जनवरी में राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद ट्रंप ने इस्लामिक स्टेट को लेकर कोई सख्त बयान नहीं दिया था. लेकिन मई 2025 में पहली बार ट्रंप और अहमद-अल-शारा की मुलाकात हुई. जिसके बाद अमेरिकी फौज ने इस्लामिक स्टेट के एक बड़े कमांडर को ढेर कर दिया था. 10 नवंबर को ट्रंप और शारा दूसरी बार वॉशिंगटन में मिले और 12 नवंबर को ही अमेरिकी नौसेना ने इस्लामिक स्टेट पर बड़े ड्रोन अटैक कर दिए थे. 1 दिसंबर को ट्रंप के प्रतिनिधि टॉम बैरक की शारा से मुलाकात हुई. इस मुलाकात के 19 दिन के अंदर ही ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इस्लामिक स्टेट पर हमले का ऑर्डर दे दिया. जिसके नतीजे अब पूरी दुनिया के सामने हैं.
सीरिया में बरसाए बम
पिछले 10 वर्षों से अमेरिकी एयरफोर्स ने सिर्फ दो मौकों पर इस्लामिक स्टेट पर ऐसे हमले किए हैं जिनका दायरा बहुत बड़ा है. ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुए एक हवाई हमले में अमेरिकी एयरफोर्स ने इराक में एक पूरे टापू पर बम बरसा दिए थे और इस बार सीरिया के एक बड़े इलाके पर बमबारी की गई है. ये भी एक वजह है जो इस थ्योरी को पुख्ता करती है कि ट्रंप का मकसद पूरे सीरिया पर अहमद-अल-शारा का कंट्रोल स्थापित करना है. अगर सीरिया पर शारा की पकड़ मजबूत हुई तो इससे ट्रंप को क्या फायदा होगा. अब हम आपको इस मुद्दे से जुड़ी जरूरी जानकारी देने जा रहे हैं. सीरिया पर अमेरिका की कठपुतली वाली सरकार का प्रभाव स्थापित हुआ तो इससे ट्रंप को ना सिर्फ आर्थिक बल्कि सामरिक फायदे होंगे. सीरिया के तेल उद्योग में अमेरिकी कंपनियों का निवेश और प्रभाव बढ़ेगा तो दूसरी तरफ सीरिया में सामरिक संसाधनों की तैनाती के साथ ट्रंप तुर्किए से लेकर ईरान तक पर दबाव बनाकर रख सकते हैं यानी अहदम-अल-शारा को साधकर ट्रंप एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं. ट्रंप भले ही शारा पर दांव लगाकर अरब जगत में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्लान बना रहे हों लेकिन अगर वो अमेरिका का इतिहास देख लेते तो शायद वो अपना हर कदम फूंक-फूंक कर रखते.
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क्या है ब्लोबैक?
अमेरिका के इतिहास की ऐसी घटनाओं को BLOWBACK कहा जाता है. यानी ऐसे आतंकी या संगठन जिन्हें अमेरिका ने खड़ा किया और आगे चलकर वो ही अमेरिका के ही गले की फांस बन गए. इस लिस्ट में सबसे पहला नाम है ओसामा बिन लादेन का. अफगानिस्तान में रूस से लड़ने के लिए CIA ने ही लादेन को मदद दी थी लेकिन सोवियत फौज के लौटने के बाद लादेन का अल-कायदा ही अमेरिका का दुश्मन बन गया. इसी तरह 80 के दशक में ईरान को चुनौती देने के लिए अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की मदद की थी लेकिन सद्दाम ने अमेरिका को ऐसी आंखें दिखाईं कि अमेरिका को दो बार खाड़ी के युद्ध में उतरना पड़ा था. 70 के दशक में अमेरिका ने पनामा पर प्रभाव स्थापित करने के लिए मैनुअल नोरिगा को पैसा और हथियार दिए थे लेकिन मैनुअल अमेरिका के लिए ऐसा कांटा बन गया था कि उसे हटाने के लिए अमेरिका को एक सीमित दायरे का युद्ध लड़ना पड़ गया था. खुद ट्रंप ऐसे धोखे का शिकार हो चुके हैं. वर्ष 2020 में ट्रंप ने ही तालिबान के साथ डील करके अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज को वापस बुलाया था लेकिन कुछ ही सालों बाद तालिबान ने दोबारा एंटी अमेरिका रुख अपना लिया है. हो सकता है कि जिस अहमद-अल-शारा को आज ट्रंप महान शख्सियत और हैंडसम मेन कह रहे हैं आगे जाकर वही ट्रंप के लिए मुसीबत की वजह बन जाए.
