Indian Politics: नेताओं के पास कितना समय है इसका सबसे नया उदाहरण प्रस्तुत किया है असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने. सवा तीन करोड़ की आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के पास कितना समय है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि उन्होंने एक रील बनाई और उस रील में क्या था? उस रील में हिंसा और घृणा से सनी राजनीति थी. उसमें गोली थी, बंदूक थी और एक विशेष समुदाय उसके टारगेट पर था. अगर हिमंता बिस्व सरमा को मुसलमानों को लेकर ही रील बनानी थी तो कई ऐसे मुद्दे थे, जिसपर वो बना सकते थे. धार्मिक कट्टरवाद, इस्लाम में महिलाओं के अधिकार, अशिक्षा , पिछड़ापन, घुसपैठ जैसे कई मुद्दे हैं जिसको खत्म करने की जरूरत है. इससे एक सामाजिक संदेश जाता, लेकिन नहीं जिस मुख्यमंत्री के पास एक राज्य के हजार मुद्दे होते हैं वो इंसानों पर गोली चलाने वाली रील बना रहा है.
हिमंता की रील पर विवाद
हिमंता ने रील बनाई,असल मुद्दों से ध्यान भटकाया और फिर वीडियो को डिलिट कर दिया. उनका काम हो गया, लेकिन उसके बाद देश के तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने उसी 12 सेकंड्स के वीडियो को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया. सोशल मीडिया पर, कैमरों के सामने, जहां देखिए उसी एक रील पर चर्चा हो रही है. इस तरह से चर्चा की जा रही है, जैसे देश की गरीबी और बेरोजगारी इसी रील विमर्श से खत्म हो जाएगी. नेताओं को लग रहा है कि रील पर बहस से शिक्षा, भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों का समाधान हो जाएगा. हिमंता बिस्व सरमा की गन वाली तस्वीर पर केस दर्ज करवाने वाले असदुद्दीन ओवैसी इसे लैला-मजनूं तक लेकर चले गए. ओवैसी ऐसे बात कर रहे हैं, जैसे हिमंता का वीडियो संविधान का हिस्सा हो गया हो. वो इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे हिमंता ने रील बनाई और फिर देश के मुसलमानों पर आफत आ गई. वो इस तरह से इसका जिक्र कर रहे हैं जैसे हिंदुस्तान के मुसलमानों के लिए यही सबसे बड़ा मुद्दा हो गया हो. एक खाली नेता जिसके पास कोई काम नहीं है, उसने ऐसा कुकृत्य किया और फिर देश के सारे नेता उसी मुद्दे के ईर्द-गिर्द बहस करने लगे. ये सिर्फ बहस नहीं कर रहे हैं, इनके पास कितना समय है. हिमंता बिस्व सरमा ने जो रील बनाई है, वो गलत है. इसके लिए उनके खिलाफ 12 लोगों ने PIL दायर किया है, लेकिन उसके बाद जो बाकी नेता कर रहे हैं, वो भी देश के लिए कम नुकसान दायक नहीं है. असल मुद्दों को छोड़कर सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं. जिस समय का उपयोग देश की आधारभूत समस्याओं के समाधान के लिए करना चाहिए, उस समय में वो ऐसे विषय पर बहस कर रहे हैं.
असली मुद्दे से भटक रहे भारतीय नेता
हिमंत बिस्व सरमा हों, ओवैसी हों या इमरान प्रतापगढ़ी जैसे नेता हों, वो देश के मुसलमानों की ऐसी समस्याओं को उठा सकते हैं, जिसके समाधान से जीवन-परिवर्तन हों, लेकिन वे ऐसे मुद्दों पर बहस कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य सिर्फ भावनात्मक उबाल लाना है. जानते हैं कि हमारे देश के नेता का सिंगल प्वॉइंट एजेंडा कैसे सिर्फ बयानबाजी है. 2022-23 में देश का जो बजट बना, उसका 8 प्रतिशत खर्च ही नहीं हो पाया. औसतन देश का एक सांसद अपने 5 करोड़ रूपये के फंड में से सिर्फ करीब डेढ से पौने दो करोड़ ही खर्च कर पाता है. उत्तर प्रदेश में 48, महाराष्ट्र में 41 और बिहार में 22 ऐसे सांसद हैं जो अपने फंड का 60 प्रतिशत पैसा ही खर्च कर पाए. करीब 6 माननीय तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने फंड का एक रूपया भी खर्च नहीं किया. काम करने के लिए पैसा मिलता है, वो भी हमारे देश के नेता खर्च नहीं कर पाते हैं, जबकि ब्राजील जैसे देशों में बजट से ज्यादा खर्च हो जाता है. 17वीं लोकसभा में एक साल में औसतन सिर्फ 55 दिन काम हुआ, जबकि उसी दौरान अमेरिका में औसतन 166 दिन और ब्रिटेन में औसतन 150 दिन काम हुआ. भारत में हर साल औसतन 20 से 30 कानून बनते हैं जबकि जर्मनी में एक सौ, ब्रिटेन में 50 से 60 और ब्राजील में 280 कानून बनते हैं यानी भारत की संसद के मुकाबले अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और ब्राजील में ज्यादा काम हो रहा है और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारे नेताओं की तरह वो संसद में बे-मतलब के मुद्दों पर हंगामा नहीं करते. बात-बात पर संसद स्थगित नहीं करते, ना करवाते.
देश के मुद्दे पर विदेश को चिट्ठी
जून 2019 से फरवरी 2024 के बीच 5 साल में भारतीय लोकसभा में सिर्फ 274 दिन काम हुए. इस दौरान भी हंगामा इतना ज्यादा हुआ कि 206 बार सांसदों को निलंबित करना पड़ा. प्रश्नकाल में निर्धारित समय के सिर्फ 60 प्रतिशत समय ही चर्चा हो पाई. 80 प्रतिशत बजट प्रस्ताव बिना वोट चर्चा के ही पास हो गया, लेकिन एक रील पर देखिए लीजिए किस तरह बहस हो रही है. नेताओं के पास कितना वक्त है उसे ऐसे भी समझिए कि ये बहस सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर नहीं हो रही है, इसे वैश्विक स्तर पर विस्तार देने का प्रयास भी हो रहा है. कांग्रेस की प्रवक्ता रागिनी नायक ने इसे मलेशिया से जोड़ दिया. तो टीएमसी की सांसद महुआ मोईत्रा ने मलेशिया के प्रधानमंत्री को सोशल मीडिया पर शिकायती चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को भी टैग किया है. टीएमसी सांसद की शिकायत उन अलगाववादी नेताओं की याद दिलाती है, जो कश्मीर के छोटे-छोटे मुद्दे पर भी संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को चिट्ठी लिख देते थे, हालांकि महुआ ने सिर्फ मलेशियाई प्रधानमंत्री से ही शिकायत की है. हमारे देश के नेता, जितना समय एक रील पर खर्च कर रहे हैं, उतना समय अगर दूसरे जरूरी मुद्दों पर चर्चा करेंगे तो इससे उनलोगों को भी फायदा होगा, जिनके नाम पर रील वाली सियासत हो रही है.
